सबसे पहले आप इस बयान को सुनिए, जिसमें एक लड़की दुआएं करती दिख रही है कि जिस तरह से नेपाल और बांग्लादेश में नेताओं को हेलीकॉप्टर से उठाया गया था। वैसे ही इन्हें जब उठाया जाए तो मौसम इतना खराब रहे कि इन्हें जिन्दा जलाया जाए। सरकार हिन्दू धर्म के नाम पर हमें बेवकूफ बना रही है और इन नेताओं को भगवा झंडे में लपेटकर के भेजा जाए जैसे शहीदों को तिरंगे में लपेटकर भेजा जाता है तब इन्हें औकात पता चलेगी। गांव में भगवा घुसने ही न दिया जाए।
इस तरह की बात सुनकर किसी राहुल गांधी जैसे नेता को तो सुकून मिल सकता है लेकिन हमें ये जरूर सोचना चाहिए कि देवभूमि के युवाओं में ऐसा आक्रोश कौन भड़का रहा है? ये किसी सिस्टम से नाराज आक्रोशित बच्चे के मुंह से कही बात कहकर इग्नोर भी नहीं किया जा सकता है क्योंकि ये एक पैटर्न बनकर उभरने लगा है जिससे पता चलता है कि ये अब सिर्फ कोई मॉमेंट्री एंगर नहीं है , कि जब गुस्से में कोई बात मुंह से निकल जाए। और मैं ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जब हर बार हमें ये पैटर्न दिखे तो हमें उसके अलावा भी बाकी की चीजों को देखना होगा।
इस पैटर्न का एक उदहारण देखिए- ‘प्रदेश युवा संगठन उत्तराखंड क्रांति दल’ नाम का एक व्हाट्सएप ग्रुप है जहाँ खुलेआम एक मैसेज लिखा गया है कि ‘सभी लोग मिलकर मारते हैं धामी को और नेपाल वाला इतिहास दोहराया जाएगा।’ किसी ने तुरंत जवाब दिया, ‘हाँ भाईजी हम तैयार हैं।’ तीसरा लिखता है कि, ‘चलो फिर सभी लोग।’ इस ग्रुप में ऐसे कई कमेंट हैं जो हिंसा की बातें दोहरा रहे हैं और साथ ही ये भी देखा जा रहा है कि कुछ संदेश डिलीट भी किए जा रहे हैं। साथ में 25 सितंबर को सभी लोगों से एकजुट होने की अपील भी हो रही है। ये सारी क्लिपें और मैसेजेस अगर एक साथ पढ़ लें तो तस्वीर साफ़ दिखती है- उकसावे की भाषा और मौके पर धूमिल होती वास्तविक मांगें। तो वो जायज मांगें क्या हैं, और प्रदेश की धामी सरकार का इस पर क्या एक्शन है, एक नजर हम देख लेते हैं –
ये सारा बवाल उठा है एक पेपर लीक के मुद्दे से।छात्रों की सरकार से ये जायज़ सी माँग लग सकती है कि जो नक़ल माफिया हैं उन माफियाओं को इन अवैध तरीकों से फ़ायदा न हो,
उत्तराखंड में भी चल रही रैलियों और बयानबाजी का बैकग्राउंड एक पेपरलीक का मामला है, जिसने इन सभी बाकी के किस्सों को हवा दी। 21 सितंबर को हुए UKSSSC की एक परीक्षा का पेपर लीक हुआ। यह परीक्षा 416 पदों के लिए आयोजित की गई थी। पेपर के तीन पन्नों की फोटो हरिद्वार के इंटर कॉलेज से निकालकर सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं और लोगों ने सड़कों पर प्रदर्शन शुरू कर दिया। कुछ लोग मांग कर रहे हैं कि यह परीक्षा रद्द हो और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। देहरादून में तीन दिनों से छात्र परेड ग्राउंड में धरने पर बैठे हैं।
अब इस पेपरलीक के जांच की कहानी कुछ ऐसी है – हरिद्वार से गिरफ्तार किए गए आरोपित ख़ालिद मलिक ने परीक्षा सेंटर से अपनी बहन साबिया को पेपर की तस्वीरें भेजीं। साबिया ने ये तस्वीरें ख़ालिद की दोस्त, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर सुमन को भेजीं ताकि वे सवाल हल करवा सकें। सुमन इस वक्त टिहरी के एक कॉलेज में कार्यरत हैं और पहले नगर निगम में अधिकारी रही हैं, उन्होंने जब फोटो में OMR शीट देखी तो उन्हें शक हुआ और उन्होंने यह मामला युवा नेता बॉबी पंवार को भेज दिया। जो उत्तराखंड में परीक्षाओं में नकल के ख़िलाफ़ आवाज उठाने के चलते चर्चा में आए थे।
बॉबी पंवार ने ये फोटो इंटरनेट पर पोस्ट करवा कर वायरल कर दीं। सुमन ने ख़ालिद को उत्तर तो नहीं भेजे, पर तस्वीरों का वायरल होना पूरे घटनाक्रम को सार्वजनिक कर गया।
उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने मामला गंभीरता से लिया। हरिद्वार पुलिस ने साबिया को गिरफ्तार किया; खालिद को पकड़ा और पुलिस उससे लगातार पूछताछ कर रही है। बताया जा रहा है कि खालिद उसी कॉलेज में था जहाँ उसने एग्जाम दिया, उसके जुराब में मोबाइल छिपाकर बैठने की बात कही जा रही है, वहाँ जैमर भी नहीं थे और वह दो दिन में प्रशासन की पकड़ में भी आ गया। इसके बाद राज्य सरकार ने SIT गठित की है, जिसका नेतृत्व एसपी (ग्रामीण) कर रहे हैं, ताकि मुक़म्मल जांच हो सके। शासन ने भी बड़ी कार्यवाही करते हुए सेक्टर मजिस्ट्रेट केएन तिवारी को निलंबित कर दिया है।
इन सब पर प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कठोर रुख दिखाया और कहा कि देवभूमि उत्तराखंड में ‘नकल जिहाद’ कभी कामयाब नहीं होने दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि परीक्षा में गड़बड़ी करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। सीएम ने यह भी कहा है कि बेरोज़गार अभ्यर्थियों के हित सर्वोपरि हैं और उनके हितों को सुरक्षित रखते हुए ही जरूरी फैसला लिया जाएगा।
धामी सरकार का रिकॉर्ड देखें तो प्रदेश में परीक्षाओं में नकल के सिलसिले को रोकने के लिए उन्होंने नकल माफियाओं पर रोक के लिए देश का सबसे सख्त कानून लागू किया है और पिछले चार सालों में 25,000 से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियाँ दी गई हैं। साथ ही सरकार का दावा है कि पिछले चार वर्षों में 100 से अधिक नकल माफियाओं को जेल भेजा गया है। नया कानून दोषियों को आजीवन सज़ा और दस करोड़ तक के भारी जुर्माने तथा माफियाओं की अवैध संपत्ति जब्त करने के प्रावधान देता है और यही सरकार का तर्क है कि वही कार्रवाई भविष्य में ऐसी हरकतों को रोकने का सबब बनेगी।
किसने इस पूरी पटकथा को लिखा? और क्या यही वही भाषा है जो अब उत्तराखंड में नेपाल, बांग्लादेश और लद्दाख जैसी घटनाओं की नक़ल करते हुए भय और उन्माद भड़काने का जरिया बन रही है?
अब एक और वीडियो क्लिप देखिए, जिसमें एक महिला आजादी के नारे लगा रही है और कह रही है कि ‘छीनकर लेंगे आजादी।” ये नारे सुनकर उसी पुराने दृश्य की याद ताज़ा हो जाती है जब कुछ साल पहले तत्कालीन कॉमरेड कन्हैया कुमार और उनके मुस्लिम साथी उमर ख़ालिद JNU में ‘आज़ादी’ के नारे लगाते दिखे थे। आज उमर ख़ालिद दिल्ली में ‘हिंदू विरोधी दंगों की साजिश’ के आरोपों में जेल में है, और कन्हैया कुमार लोकसभा चुनाव में हारने के बाद कांग्रेस में शामिल हो गए हैं।
तो सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि ये भाषा, ये उकसावे, आखिर कहाँ से आए हैं। हाल ही के महीनों में दक्षिण एशिया के पड़ोसी देशों में जो घटनाएँ हुईं उन्हें कुछ लोग ‘Gen Z क्रांतियाँ’ कह रहे हैं। नेपाल में नई पीढ़ी की सड़कों पर हिंसात्मक प्रतिक्रिया आई और सरकार पर संकट छा गया; कुछ लोग उसे ‘नेपाली क्रांति’ कहने लगे। उससे पहले बांग्लादेश में कथित छात्र-आंदोलन के नाम पर शेख़ हसीना की सरकार को इस्लामी कट्टरपंथियों ने अपदस्थ कर दिया और उसके बाद पूरी दुनिया ने देखा कि अमेरिका का प्यादा मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश की सत्ता में बिठा दिया गया। इन घटनाओं के कुछ ही दिनों बाद अब लद्दाख में भी प्रदर्शन हुए और कुछ इसे भी ‘Gen Z क्रांति’ वाला नाम दे रहे हैं।
सरकार क्या समाधान निकालेगी वो तो अपनी जगह है – लेकिन इन दोनों के बीच कोई और मामला अपनी जगह न बना ले, युवाओं को इसके लिए भी सावधान रहना ही होगा। परीक्षा रद्द करने की माँग करने वालों को अपनी मांगों से उन लोगों को दूर करना होगा जो फ्रीलांस एक्टिविज्म के नाम पर ऐसे मौकों का इन्तजार ही करते हैं। और इसके कई उदाहरण हैं जहाँ पर जायज मांगों को कुछ लोगों ने हाइजैक कर लिया और उसके भयंकर परिणाम हुए। उत्तरखंड में भी जिस किस्म की बयानबाजी आने लगी हैं उन्हें देखकर भी यही लगता है कि इन बयानों से छात्रों की ही माँग को घाटा होगा।
जरुरत ये है कि सरकार से Gen Z के उन छात्रों की भी बात करें जिनकी माँग उनसे अलग हैं। लेकिन क्या वो लोग भी सड़क पर आ जाएं जो इसका विरोध कर रहे हैं? क्या सारे फ़ैसले सड़कों पर ही होंगे? ये तो फिर खतरनाक ट्रेंड हैं। और हमने देखा है कि देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी ऐसे लोग बैठे हैं जो युवाओं के इस आक्रोश को भुनाने का इन्तजार करते रहे हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जब युवाओं के आक्रोश को भुनाने के लिए लोग प्रोटेस्ट को हाईजैक करने के लिए घुसते हैं और इसके कोई परिणाम ही नहीं आए। बांग्लादेश को ही देख लीजिये, जहाँ पर स्टूडेंट आज भी प्रोटेस्ट ही कर रहे हैं। सत्ता शेख हसीना से मोहम्मद यूनुस के पास चली गई लेकिन वहां स्टूडेंट की मांगें तो आज तक भी खड़ी ही हैं। यहाँ तक कि इस बार वे आपस में भी लड़ रहे हैं, लेकिन नतीजे तो नहीं आए। यानी वो वहाँ पर जिहादी मानसिकता को सत्ता तक पहुँचाने का सिर्फ़ जरिया बनकर रह गए।
फिर स्टूडेंट्स के उस आक्रोश का क्या हुआ? आज जो लीडर्स को ज़िंदा जलाने की बात कह रहे हैं, तो क्या वो नेपाल और बांग्लादेश में ये भी देख पा रहे हैं कि लाशों पर सत्ता तो बदली लेकिन स्टूडेंट्स अपनी मांगों के साथ वहीं के वहीं खड़े हैं।
यहाँ असल में दो चीजें सामने हैं। एक तरफ़ छात्र आंदोलनों का गुस्सा और उनकी जायज़ मांगें: पारदर्शिता, जाँच और कार्रवाई। दूसरे तरफ़ उसी गुस्से और असंतोष की आड़ में जो उकसावे और हिंसा की भाषा घुस रही है, वह छात्रों के असली मुद्दों को पीछे धकेल देती है।
कुछ लोग, कुछ नेटवर्क, सोशल मीडिया ग्रुप्स और बाहरी दख़ल से इन आंदोलनों की टूलकिट वही बना देते हैं जो दिल्ली दंगों के वक्त दिखी थी, यानी आज़ादी के उकसावे वाले नारे, व्हाट्सऐप ग्रुप्स में शहरों को जलाने की बातें, और हिंसा के लिए उकसावा।
उत्तराखंड की खासियत यह भी रही है कि देहरादून जैसे शहरों में कई NGO और एक्टिविस्ट लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। कभी पर्यावरण के नाम पर तो कभी अधिकार के नाम पर युवाओं को जोड़ने का काम होता आया है। कुछ की राय है कि यही एनजीओ और कुछ बाहरी लोग पहाड़ी राज्य को ‘सेफ़ हैवन’ समझकर युवाओं की ताक़त को भड़काते हैं। –
पर यह भी ध्यान रखना होगा कि छात्र वास्तव में शहर जलाने नहीं, बल्कि जाँच और जवाबदेही की माँग कर रहे हैं। लेकिन फिर वो लोग कौन हैं जो इन छात्रों के बीच मुख्यमंत्री को मारने और भगवा से आजादी की माँग कर रहे हैं?
छात्रों में परीक्षा जैसे संवेदनशील मामलों को लेकर आक्रोश भी रहता है लेकिन इनके कुछ समाधान क्या इस तरह से निकाले जा सकते हैं कि परीक्षाओं में पारदर्शिता के लिए हरिद्वार या देहरादून की जगह सरकार सिर्फ़ पहाड़ों सेंटर्स पर ही प्रतियोगी परीक्षाओं को आयोजित करे? हरिद्वार के प्राइवेट स्कूल अक्सर इस किस्म की अनियमितताओं के लिए बहुत बदनाम रहे हैं। हरिद्वार से गिरफ्तार हुआ आरोपित ख़ालिद के बारे में बताया जा रहा है कि वो दीवार कूदकर और चेकिंग से बचकर के एग्जाम सेंटर में बैठा था। जिस रूम में वो बैठा था वहाँ जैमर भी नहीं था। सिर्फ़ 2 दिन लगे ख़ालिद को पकड़ने में और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना है कि इसे ऐसी सजा दी जाएगी कि भविष्य में कोई ऐसी हिम्मत नहीं कर सकेगा।
लेकिन इस सबके बाद की इस क्रोनोलॉजी को आप ध्यान से पढ़ें/देखें – पहले पेपर लीक होता है, फिर वायरल क्लिप्स और व्हाट्सऐप पर उकसावे वाली भाषा लिखी जाती है, साथ में 25 सितंबर जैसी तारीखों पर एकजुट होने की अपील हो रही है। यह सब मिलकर एक खतरनाक नेक्सस तैयार कर रहा है जो छात्र आंदोलन होना चाहिए, वह उकसावे और दंगाइयों की भाषा में बदल रहा है। और यहीं पर छात्रों के मौलिक मुद्दों का खो जाना और हालात का हिंसक मोड़ देने का असली खतरा है।





