देवव्रत महेश रेखे को क्यों गाली दे रहे हैं सनातन-विरोधी?

Summary
इन सनातन द्रोहियों द्वारा महेश और सनातन का मजाक उड़ाते हुए कहा जा रहा है कि विज्ञान के इस दौर में इन मंत्रों को याद करके क्या हासिल होने जा रहा है?

सैकड़ों वर्ष पहले केरल के कलाड़ी नामक गांव से शंकर नाम का एक 13 वर्ष का बालक अपना घर त्यागकर निकलता है। स्वाध्याय और मेधा का प्रयोग करते हुए इस बालक द्वारा अल्पायु में ही सनातन धर्म के अति महत्वपूर्ण ग्रंथों का ना केवल अध्ययन किया गया बल्कि उन्हें कंठस्थ भी कर लिया गया था। इन्हीं कंठस्थ श्लोकों और मंत्रों के दिव्य ज्ञान के बल पर शंकर ने संपूर्ण भारत के विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया और आदिगुरु शंकराचार्य बनकर पूरे भारत को आध्यात्मिक एकता के सूत्र में बांध दिया था। हमारे वेद, शास्त्र, पुराण और उपनिषदों में लिखे हुए मंत्र और श्लोक ही वे सूत्र बने जिन्होंने संपूर्ण भारत में बिखरे हुए सनातन के मोतियों को एक माला में पिरोया था और भारत के एक आध्यात्मिक नक्शे को उकेरा था।

जब आदिगुरु शंकराचार्य इन मंत्रों और श्लोकों का उच्चारण करते हुए एक आध्यात्मिक भारत की रूपरेखा तय कर रहे थे उस समय भी इस देश में कई लोग थे जो उन्हें गालियां बक रहे थे और उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे थे। यद्यपि आदिगुरु शंकराचार्य जी आज से सैकड़ों वर्ष पहले थे लेकिन आज भी भारत में यह सनातन विरोधी मानसिकता बदली नहीं है। सनातन द्रोही आज भी सनातन को बदनाम करने का कोई भी मौका नहीं चूकते हैं।

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में जन्मे देवव्रत महेश रेखे धर्मनगरी काशी में रहकर सनातन धर्म का अध्ययन कर रहे हैं । 19 वर्षीय रेखे अत्यंत ही मेधावी छात्र हैं। उनकी स्मरण शक्ति और मेधा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिना किसी ग्रन्थ को सामने रखते हुए उन्होंने लगातार 50 दिन तक शुक्ल यजुर्वेद के लगभग दो हजार से भी अधिक मंत्रों का उच्चारण किया है। 

दरअसल काशी में श्रृंगेरी मठ द्वारा दंडकर्म पारायण नाम की एक परीक्षा का आयोजन किया गया था। इस परीक्षा में भाग लेने वाले विद्यार्थियों को लगातार बिना किसी पुस्तक की सहायता से शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखा में वर्णित मंत्रों का पारायण करना पड़ता है। इन मंत्रों के उच्चारण को बेहद ही जटिल माना जाता है इसके अलावा हर एक मंत्र के उच्चारण के लिए एक विशिष्ट प्रकार की हस्तमुद्रा भी निर्धारित होती है जिसका पालन भी आवश्यक होता है। इस बेहद ही जटिल परीक्षा को सफलतापूर्वक उत्तीर्ण करने की वजह से ही देवव्रत को वेदमूर्ति की उपाधि दी गई और उन्हें दंडकर्म विक्रमादित्य चिन्ह प्रदान किया गया।

देवव्रत की इस उपलब्धि के बाद एक तरफ जहां सनातनियों द्वारा उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की जा रही है वहीं कुछ सनातन विरोधी कीड़े फिर से बिलबिलाने लगे है। सनातन का विरोध यदि होगा तो उसमें ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत न हो यह कैसे संभव है? तमाम लिबरल और जिहादी गिरोहों द्वारा लगातार महेश रेखे के बहाने सनातन और ब्राह्मणों के खिलाफ जहर उगला जा रहा है। 

इन सनातन द्रोहियों द्वारा महेश और सनातन का मजाक उड़ाते हुए कहा जा रहा है कि विज्ञान के इस दौर में इन मंत्रों को याद करके क्या हासिल होने जा रहा है? महेश द्वारा मंत्रों के पारायण को एक रटंत विद्या और पोंगापंथी बढ़ाने वाला बताया जा रहा है। कई सनातन द्रोही तो इसी बहाने ब्राह्मणों के बारे में अपनी कुंठा का जमकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

और इसमें धरती को चपटी मानने वाले मुसलमान भी शामिल हैं। करिश्मा अ ज़ीज़ जो कि एक मुस्लिम है और तीन पाक शब्द बोलकर फटने वाले आतंकियों के समर्थन से भी नहीं चूकती है वो भी अपना ज्ञान झाड़ रही है। दुनिया के सर्वाधिक रूढ़िवादी और कट्टरपंथी मज़हब से संबंध रखने वाली करिश्मा अज़ीज़ ज्ञान दे रही है कि इस देश की 99 प्रतिशत आबादी संस्कृत नहीं जानती है इसलिए इन मंत्रों का क्या फ़ायदा?

इस जिहादन को यह बताना चाहिए कि पूरी दुनिया में भय और आतंक का पर्याय बनी एक आसमानी किताब जोकि अरबी में लिखी गई है उसे क्यों नहीं त्याग देती है? कितने मुसलमान आख़िर यहाँ अरबी और फ़ारसी जानते हैं?

दारेब फ़ारूख़ी और कांग्रेस आईटी सेल का हिस्सा अमोक जैसे लोग ताना मार रहे हैं कि एक तरफ़ चीन तकनीक में आगे बढ़ रहा है और भारत में ये सब चल रहा है। डॉक्टर महेश कुमार नामक यह हिंदू विरोधी भी मैदान में कूद पड़ा और एक 19 साल के अबोध बालक की आड़ लेकर ब्राह्मणवाद, मनुवाद का चीर परिचित विधवा विलाप दोहराने लगा। 

अशोक मेघवाल नामक एक और कथित विज्ञानवादी ने तो हद ही पार कर डाली। ब्राह्मणों के प्रति अपनी नफ़रत और कुंठा का प्रदर्शन करते हुए यह मूर्ख व्यक्ति इतना आगे बढ़ गया कि 2000 श्लोकों के पारायण को 25 लाख श्लोक बताकर झूठ फैलाने लगा।

फेमिनिस्ट मीना कोटवाल भी इस मामले में कूद पड़ती है और सवाल पूछती है कि क्या महिलाओं और दलितों को भी यह दंडकर्म पारायण की इजाज़त है? इस फेमिनिस्ट को शायद ज्ञान नहीं है लेकिन सनातन धर्म में प्राचीन काल से ही महिलाओं औ र दलितों को भी शास्त्र पढ़ने और लिखने का अधिकार है। 

गार्गी और अपाला जैसी विदुषियाँ भी यहीं हुई हैं और वाल्मीकि जी की लिखी हुई रामायण आज भी हर घर में पूजी जाती है। 

डॉक्टर प्रिंस वर्मा की इस कुंठा को जरा और देख लीजिए। इस व्यक्ति द्वारा किसी अमरीकी आदमी के 12 हज़ार किताबें याद करने से लेकर किसी जापानी द्वारा पाई की वैल्यू को दशमलव के एक लाख स्थान तक याद करने को लेकर बताया जा रहा है कि महेश रेखे द्वारा 2000 श्लोक याद करना कौन सी बड़ी उपलब्धि है। 

लिब्रांडुओं की सनातन के लिए इस कुंठा का कोई अंत नहीं है। इन सनातन द्रोहियों को समझना चाहिए कि अध्यात्म और विज्ञान दोनों अलग विषय हैं। वेदमूर्ति महेश रेखे अध्यात्म चुनते हैं या विज्ञान यह उनका नितांत निजी मामला है। उन्होंने जिन मंत्रों को कंठस्थ करके पारायण किया है उनसे किसी को कोई नुकसान नहीं हो रहा है। आज जिन लिबरलों द्वारा केवल मंत्रों के पारायण पर इतना विधवा विलाप मचाया जा रहा है वही उस समय फेविकोल पीकर बैठ जाते हैं जब कोई अब्दुल तीन आसमानी शब्द बोलकर भीड़ में फट जाता है। 

रेखे द्वारा अपनी मेधा और विद्वता का जो परिचय दिया गया वह उन्होंने अपनी मेहनत और स्वाध्याय के बल पर दिया। चाहे विज्ञान और AI कितना ही आगे क्यों ना बढ़ जाए लेकिन मनुष्य का दिमाग़ सदैव सर्वोच्च ही रहेगा। 

इस विज्ञान और AI को आगे बढ़ाने वाला भी कोई मानव बुद्धि ही है। बिना स्मरण शक्ति के ना तो कोई बेहतर वैज्ञानिक बन सकता है और ना ही कोई वेदमूर्ति। महेश रेखे द्वारा जो किया गया है वह विशुद्ध रूप से उनकी स्मरण शक्ति का परिचय दिया गया है। अपनी इस स्मरण शक्ति का प्रयोग वे किस प्रकार से करते हैं यह उनका व्यक्तिगत मामला है अतः लिब्रांडुओं का इस बारे में बोलना उनके निजी जीवन में दखलंदाजी तो है ही साथ में सनातन धर्म के लिए उनकी नफरत और कुंठाओं का बेशर्म प्रदर्शन है।

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