आज से करीब 3 साल पहले, मैंने दिल्ली मेट्रो में एक पोस्टर देखा था। पोस्टर किसी लचित बोरफुकन के नाम का था, जिनके जन्म को 400 वर्ष हो गए थे, और हेमंत विश्व शर्मा की असम सरकार उनकी जन्म जयंती को सेलिब्रेट कर रही थी।
पोस्टर देखकर मुझे यह लगा कि लचित बोरफुकन कौन हैं? मैंने पहले तो कभी इनका नाम नहीं सुना था। मैंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बिहार में पूरी की, और करीब 12वीं कक्षा तक मुझे इतिहास की किताबों में यह नाम पढ़ने या सुनने को कभी नहीं मिला था।उस दिन जब मैंने लचित बोरफुकन के बारे में गूगल किया तो मुझे बैटल ऑफ सरायघाट के बारे में पढ़ने को मिला। सरायघाट का युद्ध लचित बोरफुकन और मुगलों के बीच लड़ा गया था जिसमें लचित ने मुगलों को हराया था। जब मैं उस युद्ध की स्टोरी पढ़ रहा था, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
सरायघाट का वह युद्ध किसी भी मायने में छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में लड़ा गया सिंहगढ़ के युद्ध से कम नहीं था। उस दिन के बाद से सरायघाट मेरे लिए, हल्दीघाटी की तरह पवित्र और लचित बोरफुकन, छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह वीरों वाली श्रेणी में आ गए।हालांकि इस वीडियो में हम न तो लचित बोरफुकन के बारे में, और न ही सरायघाट के युद्ध के बारे में बात करेंगे।
हम बात करेंगे उस विचार की, कि भले हमें इतिहास में पढ़ाया नहीं गया लेकिन असम ने मुगलों से लेकर आज तक, हमेशा से कट्टर इस्लामी सोच वाले लोगों का न सिर्फ सामना किया है, बल्कि मजबूती से उनका प्रतिरोध भी किया है। दरअसल आप जब असम को देखेंगे, तो बांग्लादेश से सटा हुआ, तथा म्यांमार और चीन से बेहद करीब यह क्षेत्र सदियों से बाहरी शक्तियों के लिए भारत में प्रवेश करने का गेटवे रहा है। इसीलिए आप इतिहास में देखिए, कि जब-जब इस्लामी साम्राज्य विस्तार की ओर बढ़ा, असम उसके रडार पर आया। इसे मैं थोड़ा और कहानी के रूप में आपको बताता हूँ।
जब भारत पर मुगलों का शासन था, खासकर औरंगजेब का शासन था, तो उस समय भारत का अधिकांश हिस्सा औरंगजेब के नियंत्रण में था। कई इतिहासकारों के अनुसार भारत का 30 लाख वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा का हिस्सा औरंगजेब के नियंत्रण में था लेकिन इतने बड़े साम्राज्य को नियंत्रित करने के बावजूद भी, असम उसके कंट्रोल में नहीं था।बहरहाल, औरंगजेब की तो पूरी जिंदगी छत्रपति शिवाजी महाराज से लड़ते हुए चली गई। लेकिन आप लोगों को यह इंटरेस्टिंग लगेगा कि शिवाजी का असम से भी एक कनेक्शन है। डायरेक्ट नहीं है, लेकिन इनडायरेक्ट तो जरूर है
1666 ईस्वी की बात है। छत्रपति शिवाजी महाराज, औरंगजेब से मिलने आगरा गए थे। वहाँ पर औरंगजेब ने धोखे से उन्हें नजरबंद कर लिया। औरंगजेब ने मिर्जा राजा जय सिंह के बेटे राम सिंह को छत्रपति के ऊपर निगरानी रखने का आदेश दिया था, कि ध्यान रखना शिवाजी कहीं भाग न पाएँ। लेकिन छत्रपति ने बेहद चतुराई दिखाते हुए, खुद को उस कैद से मुक्त कर लिया।जब औरंगजेब को पता चला कि छत्रपति शिवाजी, राम सिंह की कैद से आजाद हो गए हैं। तो औरंगजेब तिलमिला सा गया।औरंगजेब को कहीं न कहीं शक हुआ कि हो न हो राम सिंह हिंदू हैं, और दूसरी तरफ छत्रपति एक हिंदू सम्राट हैं।
तो शायद राम सिंह के अंदर का हिंदू जाग गया, और उन्होंने शिवाजी को औरंगजेब की कैद से जाने दिया। औरंगजेब को एक तरह से राम सिंह की लॉयल्टी पर संदेह हुआ।और यहीं पर शिवाजी का असम कनेक्शन आता है। हिंदू राम सिंह की कैद से हिंदू सम्राट शिवाजी के छूट जाने का परिणाम यह हुआ कि औरंगजेब ने हिंदू राम सिंह को उनकी लॉयल्टी प्रूव करने के लिए असम जीत कर लाने को कहा। कि राम सिंह, यदि तुम मुगलों के इतने ही वफादार हो, तो असम हमारी झोली में डाल दो।
राम सिंह मुगलों की सेना लेकर असम पर आक्रमण करने निकल पड़े। असम में उस समय अहोम वंश का शासन था। और उनके सेनापति थे लचित बोरफुकन। युद्ध हुआ। सरायघाट का युद्ध हुआ। लचित बोरफुकन की सेना ने मुगलों को ऐसा जवाब दिया, कि सिर्फ कुछ हजार मुगल ही, वहाँ से जान बचाकर भाग पाए। सरायघाट के युद्ध में मुगलों को इतनी तगड़ी हार मिली थी कि 10 सालों तक मुगल सेना इस हार से उबर नहीं पाई। 10 साल बाद मुगल एक बार फिर असम पर आक्रमण करने आए। इस बार बैटल ऑफ इटाखुली हुआ। इस युद्ध को याद रखिए, मैं एक बार फिर दोहरा रहा हूँ।
सरायघाट के युद्ध के 10 साल बाद औरंगजेब ने फिर से असम पर आक्रमण किया था। मुगलों की सेना एक बार फिर असम पर आक्रमण करने आई थी। इटाखुली में हुए इस युद्ध में एक बार फिर से मुगलों को हार का सामना करना पड़ा। और मुगलिया सेना हमेशा के लिए असम से दूर हो गई।कहने का अर्थ यह है, कि इस्लामी मानसिकता के लिए असम हमेशा से एक लिटमस टेस्ट जैसा रहा है।
इस्लाम ने कभी एकदम सामने से असम पर आक्रमण किया है, कभी छुपकर असम पर आक्रमण किया, कभी किसी हिंदू को ही आगे करके असम पर आक्रमण करने के लिए भेजा। लेकिन असम हर बार कट्टर इस्लामी सोच के प्रति एक दीवार बनकर खड़ा हुआ।2016 का असम चुनाव आप में से कई लोगों को याद होगा। बंग्लादेशी घुसपैठियों, और डेमोग्राफी चेंज की समस्या से जूझ रहा असम, अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था। उसे चुनाव के दौरान असम के आम लोगों ने उसे चुनाव को बैटल ऑफ सरायघाट की तरह देखा।
असम के लोगों ने अपने इतिहास को याद किया कि अगर सरायघाट का युद्ध लचित बोरफुकन हार जाते, तो हमेशा के लिए असम पर मुगलों का शासन स्थापित हो जाता।2016 के चुनाव को इस युद्ध की तरह देखते हुए असम ने उसे चुनाव में मुगलिया सोच को, इस्लामिक विचारधारा को असम से उखाड़ फेंका।
हालांकि उसके बाद भी कट्टरपंथियों द्वारा असम को एक लैब की तरह इस्तेमाल करने का काम बंद नहीं हुआ। आज भी कभी बांग्लादेश से आवाज उठती है कि नॉर्थ ईस्ट को डेस्टेबलाइज कर दो। कभी कोई शरजील इमाम उठकर चिकन नेक काटने की बात करता है। कभी पाकिस्तान और चीन जैसे देशों द्वारा फंडेड ऑर्गनाइजेशन असम में अलगाववाद को बढ़ावा देते हैं। तो कभी असम में 40% मुस्लिम आबादी होने के कारण असम को एक अलग देश बनाने की मांग की जाती है।
इस तमाम प्रयोग आज भी असम के साथ हो रहे हैं। लेकिन असम पहले से भी कहीं ज्यादा विश्वास के साथ उन चुनौतियों का सामना कर रहा है। आपको याद होगा बैटल ऑफ सरायघाट के 10 साल बाद मुगलों की सेना एक बार फिर असम पर आक्रमण करने आई थी, उस समय इटाखुली में मुगलों को एक बार फिर से असम ने जवाब दिया था।
असम अपना इतिहास दोहरा रहा है। 2016 में जिस चुनाव को लास्ट बैटल ऑफ सरायघाट समझा गया था, उसके ठीक 10 साल बाद, वही कट्टर इस्लामी सोच एक बार फिर असम को खा जाने के लिए आई है, देखना यह है, कि क्या असम इटाखुली के उस बैटल की तरह एक बार फिर वह रेसिस्टेंस दिखा पाएगा?
क्या इटाखुली के बाद जिस तरह से मुगलों को हमेशा के लिए असम से समाप्त कर दिया गया था, क्या 2026 के इटाखुली में एक बार फिर से असम कट्टरपंथी सोच को हमेशा के लिए दफना पाएगा?ऐसे कई सवाल हैं, लेकिन इसका जवाब सिर्फ असम के लोगों के पास है। असम जो जवाब देगा, वह देश के बाकी हिंदुओं में एक आत्मविश्वास भरेगा, कि 40% से भी ज्यादा मुस्लिम जनसंख्या होने के बावजूद भी गजवा-ए-हिंद को रोका जा सकता है।





