कथा मंजरी में आज हम जानेंगे एक ऐसे सम्राट के बारे में, जो एक किसान परिवार में जन्मा था, लेकिन इसके बावजूद जब उससे धर्म और राज्य की बदहाल स्थिति नहीं देखी गई, तो उसने खुद ही एक सेना तैयार की, और उस समय दुनिया के सबसे ताकतवर सम्राट का वध करके सनातन को पुनर्जीवित किया, और एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की।
यह कहानी है, देश के पहले ब्राह्मण राजा, पुष्यमित्र शुंग की। एक ऐसा राजा, जिसका मार्गदर्शन स्वयं महर्षि पतंजलि ने किया था। एक ऐसा ब्राह्मण राजा, जिसे इस देश के इतिहासकारों ने भुला दिया।
पुष्यमित्र की कहानी से पहले, उनके उदय के समय जो अराजक पृष्ठभूमि थी, उसकी कहानी जाननी जरूरी है। क्योंकि कमल कीचड़ में ही खिलता है, हीरा कोयले में ही पाया जाता है।
कहानी शुरू होती है मगध साम्राज्य से। आज से लगभग 2100 वर्ष पहले की बात है। चाणक्य की प्रेरणा से चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की, फिर उनके पुत्र बिंदुसार ने शासन संभाला, और उनके बाद, उनके बेटे अशोक राजा बने। अशोक को तो हम भारतीय के सबसे महानतम सम्राटों में गिनते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अशोक के राज्य की सीमाएं आज के ईरान से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक और कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक, इतने बड़े क्षेत्र में फैली हुई थी।
इस बात में कोई संदेह नहीं, कि अशोक एक महान सम्राट थे। उनके राज्य में, भारत की सीमाएं जहां तक फैली, उतना बड़ा साम्राज्य हासिल कर पाना, दुनिया के कई चक्रवर्ती सम्राटों के लिए भी एक स्वप्न बन कर रह गया। लेकिन अपने शासन के अंतिम कुछ वर्षो में अशोक ने अहिंसक नीति अपना ली। अशोक की अहिंसक नीति को कुछ इस तरह से देखने की जरूरत है, कि उसके पास अब पाने को कुछ रह नहीं गया था। उसका साम्राज्य चारो ओर से सुरक्षित था, इसलिए युद्ध से तंग आकर अहिंसक हुआ था।
और जब तक अशोक जीवित रहे, तब तक तो उनका साम्राज्य ठीक रहा, लेकिन अशोक की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी उनकी तरह दूरदर्शी नहीं हो पाए। उन्होंने as it is अहिंसा को और बौद्ध धर्म को अपना लिया, और वहीं से मौर्य साम्राज्य कॉलेप्स होता गया। राज्य के कोष से बौद्ध मठों को दान दिए जाने लगे। जिस राज्य का खजाना सैनिकों का वेतन देने में और प्रजा के कल्याण में इस्तेमाल होता था उसी राज्य का खजाना बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में खर्च होने लगा। वह राज्य, जिसकी सीमाओं के सामने हिमालय और हिन्द महासागर बौने लगते थे, वही राज्य अपनी अहिंसक निति के कारण टूटने लगा।
सेना कमजोर हो गई थी, तो कोई टैक्स भी नहीं देता था। सैनिकों को वेतन भी नहीं मिलता था, राज्य की प्रजा बेहाल थी, और राज्य का सारा खजाना बौद्ध मठों के विस्तार में इस्तेमाल किया जा रहा था।
अब साम्राज्य कमजोर हुआ तो साम्राज्य पर आक्रमण भी शुरू होने लगे। जिस मगध साम्राज्य ने सिकंदर और सेल्यूकस जैसे लोगों को भी पराजित किया था, वही साम्राज्य अब विदेशी आक्रमण के डर में जीने लगा। अशोक के बाद मौर्य सम्राट को कई निर्बल शासक मिले। अशोक जब तक जीवित थे उन्होंने इतने बड़े साम्राज्य को संभाल रखा। लेकिन अशोक के बाद के सम्राटों में ना तो शक्ति थी और नहीं वह क्षमता थी कि वह मौर्य साम्राज्य को संभाल पाए।
अशोक की तीन पीढ़ी बाद जब वृहद्रथा मौर्य सम्राट बना, तो उस समय तक मौर्य साम्राज्य की स्थिति बिल्कुल दयनीय हो चुकी थी। अशोक के रहते जिन यवनों की हिम्मत नहीं होती थी, कि वो भारत की ओर आँख उठाकर भी देखें, वही यवन मगध के कई भाग पर अधिकार कर चुके थे। और मगध सम्राट वृहदरथ का सारा ध्यान विलासिता पूर्ण जीवन तथा बौद्ध मठों को दान देने में लगा हुआ था।
पुष्यमित्र उस समय युवा थे और कई स्रोत यह बताते हैं कि पुष्यमित्र शुंग, में सेनापति थे। उन्होंने देखा कि मगध के पास सेना तो है नहीं, अब यदि यवन आक्रमण करेंगे तो मगध हार जाएगा और यहां की प्रजा पर अत्याचार भी होगा।
क्योंकि भारत की प्रजा बहुत समृद्ध थी। उपजाऊ भूमि होने के कारण अनाज की कोई कमी नहीं थी देश के कृषकों की स्त्रियां भी स्वर्ण और रजत के आभूषणों से लदी रहती थी। कोई विदेशी व्यापारी कभी भारत के गांव से होकर गुजरता था तो निशुल्क भोजन और आतिथ्य पाकर देश की समृद्धि पर चकित रह जाता था। विदेशियों के मन में ईर्ष्या उत्पन्न होने लगती थी, और यही ईर्ष्या भारत पर विदेशी आक्रमणों का बीज बन जाती थीं। लेकिन इस देश के राजाओं ने अपनी लंबी सुदृढ़ भुजाओं में चमचमाते खडग हमेशा तैयार रखे, ताकि कोई विदेशी हमारी स्त्रियों के ऊपर अत्याचार न कर सके। यही कारण था कि भारत अखंड था।
किन्तु वृहदारथ ऐसे राजा नहीं था। इसलिए पुष्यमित्र ने यह सोचा कि उसे खुद ही प्रजा के बीच जाकर, राष्ट्र के प्रति भक्ति का भाव जगाना होगा, और प्रजा से यह निवेदन किया जाए, कि राष्ट्र इस समय संकट में है, इसलिए किसी वेतन की उम्मीद किये बिना, प्रजा अपनी इच्छा से सैन्य प्रशिक्षण ले।
आप सोचिए एक गरीब ब्राह्मण युवा, जिसके पास कोई धन संपत्ति नहीं थी, कोई राजपद नहीं था, उसके बावजूद उसने हर व्यक्ति के पास जाकर राष्ट्र की रक्षा के लिए निवेदन किया और राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा के लिए एक सेना तैयार की।
अब यहां पर कहानी में एक और एंगल आता है। कोई भी क्रांति जब धरातल पर उतरती है तो उस क्रांति के पीछे एक विचार होता है, और वह विचार जो व्यक्ति देता है वह व्यक्ति ही उस क्रांति का जनक होता है। जब चंद्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई थी, तो साम्राज्य की स्थापना को विचार दिया था चाणक्य ने। इसलिए आज भी चन्द्रगुप्त से ज्यादा चाणक्य की विद्वता को महत्त्व दिया जाता है।
ठीक वही पुष्यमित्र शुंग के साथ भी हुआ। पुष्यमित्र शुंग ने बिना किसी संसाधन के यदि इतनी बड़ी सेना खड़ी की तो उसके पीछे जो विचार था, वह महर्षि पतंजलि का था। जी हाँ, महर्षि पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के गुरु थे। महर्षि पतंजलि को भारत के सबसे बड़े व्याकरण शास्त्रियों और योगाचार्य में गिना जाता है। उनके मार्गदर्शन में ही एक गरीब किसान का बेटा पुष्यमित्र शुंग, 2 लाख की सेना खड़ी कर पाया।
अब यहाँ पर एक नजरिया राजद्रोह का भी आता है।
आज के जमाने में भी यदि आप अपनी सेना बनाएंगे तो इसका मतलब तो यही हुआ, कि आप देश के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं। तो उस जमाने में जब पुष्यमित्र शुंग अपनी सेना बना रहे थे, तो उनके मन में भी यह दुविधा थी, कि कहीं वह राजद्रोह तो नहीं कर रहे।
उस दुविधा को महर्षि पतंजलि ने दूर किया था। पतंजलि ने पुष्यमित्र से कहा था, कि राजा किसी राज्य का प्रतीक नहीं होता, बल्कि राज्य का प्रतीक वहां की जनता होती है। और एक व्यर्थ के मुकुट धारी तथा अपने को सम्राट कहने वाले अहिंसक मूर्ख को राज्य का प्रतीक तो बिल्कुल नहीं मानना चाहिए। जो राजा अपनी सीमाओं की रक्षा न कर सके, जो राजा अपने राज्य की रक्षा न कर सके, उस राजा को यह बिल्कुल अधिकार नहीं है कि वह देश की जनता को राजद्रोही बताए। पुष्यमित्र, जनता अपनी इच्छा से बिना किसी धन की लालसा के तुम्हारी सेना में आ रही है, तुम्हारा जन्म ही राज्य के कल्याण के लिए हुआ है। पुष्यमित्र तुम अपनी निडरता मे ब्राह्मण हो। तुम शौर्यता मे क्षत्रिय हो । तुम धन एकत्र करने में वैश्य और प्रजा की सेवा करने मे शूद्र के समान हो। तुम्हारे अंदर सम्पूर्ण सनातन है, पुष्यमित्र। तुम भारतवर्ष के सम्राट बनने के योग्य हो। इसलिए अपने मन से इन शंकाओं को निकाल फेंको और जाकर मगध तथा सनातन का उद्धार करो।
अपनी ओजस्वी शैली से महर्षि पतंजलि ने पुष्यमित्र शुंग का हर समय मार्गदर्शन किया। बहरहाल, महर्षि के मार्गदर्शन में मगध को बचाने के लिए सेना तैयार हुई।
जब सम्राट वृहदरथ को यह पता चला, कि किसी युवक ने राज्य में एक सेना तैयार कर ली है। तो बौद्ध धर्म तथा अहिंसा के प्रभाव में जकडे हुए सम्राट वृहदर्थ ने आदेश देकर पुष्यमित्र को अपने पास बुलाया।
अब राजा का आदेश था, तो पुष्यमित्र को जाना भी पड़ा। पुष्यमित्र वैसे भी राज्य के विरुद्ध विद्रोह नहीं करना चाहते थे। उनकी यही इच्छा थी कि मगध साम्राज्य में सेना फिर से पुनर्जीवित हो और यवनों के आक्रमण से मगध को मुक्ति मिले। कि वह अपनी पूरी सेना, महाराज के चरणों में समर्पित कर देंगे, और महाराज के नेतृत्व में यवनों को मगध से भगा देंगे।
लेकिन महाराज़ वृहदरथ तो बौद्ध मठों के प्रभाव में अहिंसा के मूल्यों से जकडे हुए थे। उन्होंने पुष्यमित्र को अहिंसा और युद्ध न करने का उपदेश दिया। उन्होंने पुष्यमित्र को आदेश दिया, कि मैं तुम्हारी सेना का निरीक्षण करना चाहता हूँ।
पुष्यमित्र ने आदेश का पालन किया। पुष्यमित्र अपनी सेना के साथ राजमहल के सामने पहुंचे। और सम्राट वृहदरथ अपने अंगरक्षकों के साथ उस सेना का निरीक्षण करने लगे। यहीं पर एक Miscommunication हुआ।
पुष्यमित्र ने अपनी सेना को यह आदेश दे रखा था, कि जैसे ही सम्राट वृहदरथ आएंगे, पूरी सेना सम्राट वृहदरथ का जय जयकार करेगी। लेकिन सेना तो पुष्यमित्र के लिए समर्पित थी, इसलिए सेना ने वृहदरथ के बजाय, पुष्यमित्र की जय जयकार करनी शुरू कर दी। वृहदरथ ने गुस्से में आकर अपने अंगरक्षकों को यह आदेश दिया, कि वो पुष्यमित्र का वध कर दें। अब गीदड़ों का झुंड भला शेर को कहाँ मार पाता है। पुष्यमित्र ने महाराज वृहदरथ के अंगरक्षकों को मार गिराया।
वृहदरथ ने पुष्यमित्र से चीखते हुए पूछा, कि किसकी अनुमति से तुमने यह सेना लिए तैयार की है? मैं एक राजा होने के नाते इस सेना को भंग करने का आदेश देता हूँ।
पुष्यमित्र ने वृहदरथ की गर्दन पर अपनी तलवार रखते हुए कहा, कि अपने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए मुझे किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है। मगध की अधिकांश भूमि पर यवनों का कब्ज़ा हो चुका है, मेरी मातृभूमि विदेशी आक्रांताओं के कब्जे में है, और तुम्हारे जैसे दुर्बल राजा अपनी माता का उद्धार करने की बजाय, अहिंसा की बात कर रहे हैं।
यह कहते हुए पुष्यमित्र ने एक झटके में वृहदरथ का सिर धड़ से अलग कर दिया और अपनी सेना की तरफ मुड़कर गरजते हुए कहा, कि
ना बृहद्रथ महत्वपूर्ण था, ना पुष्यमित्र महत्वपूर्ण है. महत्वपूर्ण है मगध! महत्वपूर्ण है हमारी मातृभूमि! महत्वपूर्ण है मगध की प्रजा!
क्या तुमलोग राष्ट्र की रक्षा के लिए रक्त बहाने को तैयार हो?”
सैनिको ने पूरे उत्साह के साथ एकस्वर में आवाज़ दी, “हाँ, हम अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए दुश्मनों का रक्त बहाएंगे।
पुष्यमित्र ने फिर कहा, कि राष्ट्र के प्रति तुम सभी के त्याग को प्रणाम करते हुए, मैं यह घोषणा करता हूँ, कि मैं भी अपना सम्पूर्ण जीवन मगध सम्राज्य के सैनिक के रूप में बिताऊंगा। मुझे राजा बनने की कोई अभिलाषा नहीं है। मैं आजीवन मगध का सेनापति बनकर अपना काम करूंगा.. और हुआ भी यही, पुष्यमित्र के कभी खुद को राजा घोषित नहीं किया। यहाँ तक कि उनके गुरु महर्षि पतंजलि ने उनके राज्यभिषेक का उत्सव भी नहीं मनवाने दिया। पतंजलि ने कहा, कि जब तक मगध की इस धरती की अंगुल भर भूमि पर भी विधर्मियों का अधिकार है, तब तक किसी को भी उत्सव मनाने का कोई अधिकार नहीं है।
पुष्यमित्र शुंग ने मगध का शासन अपने हाथ में लेते ही सबसे पहले सैन्य शक्ति को मजबूत किया। सैनिकों को अच्छे वेतन पर रखा। आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए, बौद्ध मठों और संघों को दिए जा रहे, बिना मतलब के दान पुष्यमित्र ने बंद करा दिए। बिना मतलब के बौद्ध मठों का राजनिति में जो हस्तक्षेप हुआ करता था, वह भी पुष्यमित्र खत्म कर दिया। मन्दिरों में जबरदस्ती रखवाये गये बुद्ध प्रतिमा के स्थान पर, पुनः देवी देवताओं की स्थापना हुई। यज्ञ और मन्दिरों में पूजा फिर से शुरू करवाई गई।
हालाँकि यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है, पुष्यमित्र ने बौद्ध धर्म को मानने वाली प्रजा पर कोई अत्याचार नहीं किया। उसके राज्य में हर पंथ के लोग सुख से रहते थे। पुष्यमित्र ने जिन बौद्ध मठों को नष्ट किया, उसके पीछे की कहानी इतिहासकार छुपा ले जाते हैं।
हुआ यह था, कि जब पुष्यमित्र ने बौद्ध मठों को राज्य का संरक्षण देना बंद किया, उनको राज्य के खजाने से पैसे देना बंद किया, तो मुफ्त की मलाई खाने की आदत पड़ जाने वाले बौद्ध मठ, राजनीति के अखाड़े बन गए। और जब यवन शासक डिमेट्रियस, मगध पर आक्रमण की योजना बना रहा था, तो कई स्रोत तो यह भी बताते हैं, कि बौद्ध मठों ने मगध और पुष्यमित्र के खिलाफ़ उन विदेशी आक्रांताओं की मदद की। उन्होंने अपने मठों में विदेशी सैनिको को छुपाया था।
पुष्यमित्र शुंग को जब बौद्ध मठों के इस षड्यंत्र का पता चला, तो उसने बौद्ध मठों की तलाशी करवाई। जिन-जिन बौद्ध मठों में यवन सैनिक छिपे हुए मिले, वहां यवनों के साथ-साथ उन गद्दार बौद्धों का भी सिर काट दिया, उन बौद्ध मठों को जमींदोज कर दिया।
2.5 फ्रंट वॉर की बात जनरल बिपिन रावत ने की थी। कि भारत को अपनी सीमाओं पर दो तरफ से, यानी पाकिस्तान और चीन से तो खतरा है ही, साथ ही एक तीसरा front देश के अंदर भी है। यह 2.5 फ्रंट उस जमाने में भी था। और पुष्यमित्र ने हमें बताया, कि जब 2.5 फ्रंट वॉर होता है, जब राष्ट्र को बाहरी आक्रमणकारियों के साथ-साथ अंदर से भी खतरा होता है, तो उस अंदर वाले खतरे को सबसे पहले कुचलना चाहिए। पुष्यमित्र ने वही किया। चुन चुनकर उन राष्ट्रद्रोहियों का संहार किया गया, जिन्होंने मगध की प्रजा के साथ छल किया था, जिन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों के साथ मिलकर साजिश रची थी।
और ये सब करने के बाद पुष्यमित्र ने यवनो पर आक्रमण किया। फिर करीब एक वर्ष के संघर्ष में ही पुष्यमित्र शुंग ने यवनों को मगध की सीमा से पीछे धकेल दिया। उसके बाद जब तक पुष्यमित्र जीवित रहे, यवन सिन्धु नदी को पार करने की हिम्मत नहीं दिखा सके।
महर्षि पतंजलि के आशीर्वाद से, पुष्यमित्र ने एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की और लगभग 35 वर्षों तक शासन किया। पुष्यमित्र ने दो-दो अश्वमेध यज्ञ भी किए, जिनमें से एक यज्ञ में तो उनके पुरोहित स्वयं महर्षि पतंजलि थे। अशोक के बाद बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण भारत में वैदिक मंत्रोच्चारण m और यज्ञों का होना बंद करा दिया गया था, उसी भारत में अश्वमेध यज्ञ की शुरुआत करके पुष्यमित्र ने सनातन के पुनर्जीवित होने की घोषणा की। पुष्यमित्र का राज्याभिषेक भारत में वैदिक धर्म की पुनरस्थापना का दिन था।
लेकिन आप इस देश के मक्कार इतिहासकारों की मक्कारी देखिए, कि जिस पुष्यमित्र शुंग ने सनातन धर्म को पुनर्जीवित किया, उसका उल्लेख भी इतिहास में बहुत कम देखने को मिलता है। इस देश के इतिहासकारों ने पुष्यमित्र को हमेशा negative चरित्र के रूप में गढ़ा। इस देश के इतिहासकारों ने यह narrative बनाया, कि पुष्यमित्र ने बौद्धों पर अत्याचार किया, लेकिन वही इतिहासकार ये नहीं बताते कि, उन बौद्ध मठों ने विदेशी आक्रमणकारियों को कैसे संरक्षण दिया था।
जैसा कि मैं हर बार कहता हूं, कि इस देश के युवाओं को, विशेषकर देश के हिंदू युवाओं को, और अधिक पढ़ने की, और अधिक शोध करने की जरूरत है, ताकि कल को कोई आकर हमारे पूर्वजों के बारे में गलत भ्रांतियां हमारे सामने न फैला पाए। याद रखिये, जब तक शेर अपना इतिहास नहीं जानेंगे, इतिहास हमेशा शिकारीयों को ग्लोरिफाई करता रहेगा। इसलिए अपने इतिहास को जानिए, गर्व करिये उसपर। वृहदरथ मत बनिये, पुष्यमित्र बनिये।





