इस दौरान हमारी Parliament ने वो सब देखा जो शर्मनाक था। बिल फाड़े गए, Speaker से कागज़ छीने गए, धक्का-मुक्की हुई और सांसदों को Marshal बुलाकर बाहर फिंकवाना पड़ा। ये कहानी है ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ की।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि जो बिल आज Revolution लगता है, उसे लाने में इतनी देर क्यों हुई? क्या पहले की सरकारें सिर्फ सो रही थीं? और सबसे चौंकाने वाली बात, क्या आप जानते हैं कि 1947 में जब पहली बार महिला आरक्षण की बात उठी, तो इसे रोकने वाली खुद कुछ महिलाएँ ही थीं?
आज इतिहास के उन पन्नों को पलटेंगे, जहाँ Willpower और Politics के बीच महिलाओं का हक दशकों तक दबा रहा। शुरुआत करते हैं Constituent Assembly की उस बहस से, जहाँ 15 महिलाओं ने इस बिल की दिशा ही बदल दी थी।
Constituent Assembly (1947)
इस कहानी की शुरुआत 1947 से होती है। Constituent Assembly में सिर्फ 15 Female Members थीं। ताज्जुब की बात यह है कि उस समय इन महिलाओं ने खुद Reservation का विरोध किया था।
West Bengal की प्रखर नेता रेणुका रे ने 18 July 1947 को साफ कहा था कि:
‘महिलाओं के लिए सीटें Reserve करना उनकी Self Respect को ठेस पहुँचाना है। अगर हम Reservation लेकर आएँगे, तो समाज सोचेगा कि हम General Seats पर लड़ने के लायक नहीं हैं।’
दूसरी महिला थीं हंसा मेहता। उन्होंने Equality पर जोर दिया। उनका मानना था कि Reservation ‘कमजोर’ लोगों के लिए होता है और भारत की महिलाएँ कमजोर नहीं हैं।
तीसरी महिला थीं दूर्गाबाई देशमुख। उन्होंने तर्क दिया कि स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी है, तो आजाद भारत में वे ‘Special Privilege’ क्यों लें?
रेणुका रे, हंसा मेहता और दूर्गाबाई देशमुख के साथ बेगम ऐजाज रसूल ने भी मुस्लिम महिलाओं और किसी भी Social Class के लिए Special Reservation का विरोध किया। उन्होंने कहा कि Reservation Minorities को Majorities से अलग रखने वाला ‘Suicide Weapon’ है।
शायद इन महिलाओं के आत्मविश्वास की वजह से शुरुआत में Reservation नहीं आया। लेकिन 1952 के पहले चुनाव में सिर्फ 4.5% महिलाएँ ही संसद पहुँचीं। यह साफ हो गया कि बिना कानून लाए यह रास्ता बहुत मुश्किल है।
1996 से 2010 तक: विरोध, हंगामा और राजनीति
1996 में देवगौड़ा सरकार ने पहली बार यह बिल पेश किया। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कोशिश की, लेकिन संसद के अंदर जो हुआ, वह लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज हो गया।
शरद यादव और ‘परकटी’ विवाद
JDU के शरद यादव ने इस बिल को ‘परकटी महिलाओं’ का बिल कहा था। उन्होंने राज्यसभा में कहा:
‘परकटी महिलाएँ हमारी महिलाओं के बारे में क्या जानेंगी?’
उनका Logic था कि इस बिल से सिर्फ वही महिलाएँ आएँगी जिनके ‘बाल कटे’ हैं और जो शहरों में रहती हैं। उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि अगर यह बिल बिना OBC Quota के पास हुआ, तो वे ‘जहर’ खा लेंगे।
इसके साथ मुलायम सिंह यादव ने भी इसका विरोध किया। उन्होंने इसे ‘शहरी महिलाओं का क्लब’ कहा। उनका डर था कि इससे ग्रामीण और गरीब महिलाएँ कभी चुनाव नहीं जीत पाएँगी।
मुलायम सिंह ने तो विरोध करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि:
‘ग्रामीण महिलाएँ चुनाव जीतने के लिए उतनी Attractive नहीं होतीं।’
यह बयान बाद में बड़े Backlash का कारण बना।
महिलाओं का जवाब: वोट से राजनीति बदलना
2017 के उत्तर प्रदेश चुनाव में महिलाओं ने SP को करारा जवाब दिया। SP 224 सीटों से गिरकर सिर्फ 47 पर सिमट गई। महिलाओं का Voter Turnout पुरुषों से ज्यादा रहा और उन्होंने BJP को भारी बहुमत दिलाया। SP आज तक महिलाओं का वह समर्थन दोबारा हासिल नहीं कर पाई है।
बिहार में भी यही हुआ। लालू प्रसाद यादव ने महिला आरक्षण की तुलना ‘प्याज छीलने के आँसुओं’ से की थी। महिलाओं ने इसका जवाब वोट से दिया।
आज बिहार में NDA की जीत में महिला वोट सबसे बड़ा Factor है। 2020 के चुनावों में NDA ने जिन 125 सीटों पर जीत हासिल की, उनमें से 99 सीटों पर महिलाओं का Turnout पुरुषों से कहीं ज्यादा था।
2010 का राज्यसभा ड्रामा
2010 में मनमोहन सिंह की सरकार ने इसे राज्यसभा में पास तो करा लिया, लेकिन RJD और SP के सांसदों ने Speaker के हाथ से बिल छीनकर फाड़ दिया। Marshals बुलाने पड़े और सांसदों को जबरन बाहर निकाला गया।
उनकी Demand थी कि इसमें OBC और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से Quota हो, वरना वे समर्थन नहीं करेंगे।
यहीं कांग्रेस की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। कांग्रेस ने राज्यसभा में ताकत दिखाई, लेकिन लोकसभा में अपने लालू-मुलायम जैसे सहयोगियों के खिलाफ ज्यादा Interest नहीं दिखाया। कई सालों तक कांग्रेस ने SP और RJD जैसे Partners के पीछे छिपकर इस बिल को लटकाए रखा।
और Facts इस बात के सबूत हैं कि कांग्रेस ने अपनी इस राजनीति की भारी कीमत चुकाई।
2009 के चुनावों में कांग्रेस के पास 29% महिला वोट थे, जिसकी बदौलत वह दोबारा सत्ता में आई।
फिर 2014 का Downfall देखिए। वादों का नतीजा यह हुआ कि महिला Vote Share 29% से गिरकर सीधे 19% पर आ गया। 10 अंकों की यह गिरावट ऐतिहासिक थी।
2019 के चुनाव में BJP का महिला Vote Share 2009 के 18% से बढ़कर 36% हो गया, यानी लगभग दोगुना। जबकि कांग्रेस आज भी 19% पर ही अटकी हुई है।
यानी कांग्रेस आज उसी रास्ते पर खड़ी है जहाँ SP और RJD खड़े हैं। अगर कांग्रेस ने अब भी इस ऐतिहासिक सुधार का विरोध जारी रखा, तो वह पूरी तरह Irrelevant हो जाएगी।
और इस सबके बीच कुछ दिन पहले सोनिया गांधी ने एक लेख में मोदी सरकार की नीयत पर सवाल उठाए कि इसे ‘Census और Delimitation’ की शर्त के साथ क्यों लटकाया गया है। जबकि मोदी सरकार उसका भी समाधान लेकर आई है और इसे ही Political Will कहते हैं। मोदी सरकार Census और Delimitation के Conflict को सुलझाकर 2029 से इसे लागू करने जा रही है।
मोदी सरकार, गुजरात मॉडल और Credit की लड़ाई
साल 2023 में जब देश की नई संसद में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पास हुआ, तो दुनिया को लगा कि यह मोदी सरकार का कोई नया कारनामा है। लेकिन सच यह है कि इस बदलाव की बुनियाद दिल्ली में नहीं, बल्कि दो दशक पहले गुजरात में रखी जा चुकी थी।
जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने पंचायत और नगरपालिका चुनावों में 50% Reservation देकर यह साबित किया था कि महिलाएँ ‘Decision Maker’ बन सकती हैं और Equal हिस्सेदारी का हक रखती हैं।
यानी सत्ता की आधी चाभी सीधे महिलाओं के हाथ में।
आज जब मोदी सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को कानून बनाया है, तो यह किसी राजनीतिक मजबूरी का नतीजा नहीं, बल्कि उस भरोसे की जीत है जिसकी शुरुआत गुजरात से हुई थी।
सोनिया गांधी और अखिलेश यादव की आपत्तियाँ
सोनिया गांधी ने तर्क दिया कि यह बिल उनकी सरकार यानी UPA का था, जिसे BJP अब अपना बता रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर नीयत साफ है, तो इसे ‘जनगणना’ और ‘परिसीमन’ की शर्त के साथ 2029 तक क्यों लटकाया गया?
लेकिन मोदी सरकार ने इसके लिए अलग प्लान तैयार किया।
समाजवादी पार्टी नेता और मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव ने Demand की थी कि 2027 Census का इंतजार न किया जाए। उन्होंने इसे ‘Caste Census’ से जोड़ते हुए कहा कि बिना पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के हक के यह बिल Incomplete है।
यानी अड़ेंगे भी और अड़ंगा भी लगाएंगे।
बिल फाड़ने वाले SP-RJD सांसदों को खुश रखने के लिए कांग्रेस Silent हो गई थी और बिल Lapse हो गया। आज वही सोनिया गांधी 13 अप्रैल 2026 को ‘The Hindu’ में लेख लिखकर कह रही हैं कि:
‘महिला आरक्षण मुद्दा नहीं, असली मुद्दा परिसीमन है। यह संविधान पर हमला है।’
जबकि मोदी सरकार ठीक उसी शर्त को हटाकर 2029 से Reservation लागू करने जा रही है, जिसे कांग्रेस 2010 में अपने सहयोगियों के कारण लागू नहीं कर पाई थी।
यानी नीयत पर सवाल दूसरों पर और अपनी नाकामी पर चुप्पी।
Delimitation की नई बहस
अब आते हैं उस बहस पर जो North-South Seats को लेकर चल रही है।
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पास हो चुका है, लेकिन इसे लागू करने के लिए दो शर्तें हैं: Census और Delimitation।
मोदी सरकार इसे 2029 के चुनाव से लागू करने के लिए दो संशोधन लाने की तैयारी कर रही है।
पहला संशोधन यह कहेगा कि नई जनगणना और परिसीमन का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। 2011 की जनगणना के आधार पर ही सीटों का बँटवारा किया जाएगा।
दूसरा संशोधन नया ‘Delimitation Commission’ बनाएगा, जिसके बाद लोकसभा की सीटों का Number 543 से बढ़कर लगभग 816 या 850 तक हो सकता है।
इनमें लगभग एक-तिहाई यानी करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए Reserved होंगी। SC/ST महिलाओं को भी Sub-Quota मिलेगा।
सरकार का कहना है कि इससे महिलाओं को जल्दी मौका मिलेगा, हर राज्य को अपनी आबादी के अनुसार सीटें मिलेंगी, दक्षिणी राज्यों को भी फायदा होगा और ‘Population Control Punishment’ वाली शिकायत खत्म हो जाएगी।
आज लोकसभा में महिलाओं की संख्या सिर्फ 14% है, जबकि पंचायती राज संस्थाओं में यह 46% से ज्यादा है। यानी जड़ों में ताकत पहले से मौजूद है, अब उस ताकत को ऊपर तक पहुँचाने की बारी है।
असली परीक्षा 2029 में होगी
सवाल यह है कि क्या 2029 में भारत की राजनीति का चेहरा बदल जाएगा?
चुनौतियाँ आज भी वही हैं। क्या महिला Candidates वाकई अपनी मर्जी से फैसले लेंगी या वे ‘प्रधान-पति’ की तरह ‘सांसद-पति’ के Rubber Stamp बनकर रह जाएँगी?
सच्चाई यह है कि यह बिल सिर्फ Reservation नहीं, बल्कि उन लाखों लड़कियों के लिए एक ‘Space’ है जिन्हें राजनीति से दूर रखा गया।
चाहे वह रेणुका रे का Vision हो या प्रधानमंत्री मोदी का ‘वंदन’, असली परीक्षा तब होगी जब 2029 में संसद के गलियारों में हर तीसरी आवाज महिला की होगी। तभी इस Act की असली ताकत पता चलेगी।





