what happened after partition

मुर्शिदाबाद, मालदा और नदिया कैसे बने थे पाकिस्तान?

Summary
15 अगस्त 1947 के बाद तीन दिनों तक बंगाल के कई जिले तकनीकी रूप से पाकिस्तान का हिस्सा थे। जानिए Radcliffe Line, मुर्शिदाबाद, मालदा, नदिया और ‘भारत भुक्ति दिवस’ की अनकही कहानी।

आप बंगाल में हैं। अब ज़रा imagine करिए कि भारत आज़ाद हो चुका है। दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फहराया जा रहा है, लेकिन देश के ही एक हिस्से में लोग खौफ में हैं क्योंकि उनके घर के बाहर ‘चांद-तारे’ वाला हरा झंडा फहरा रहा है। क्या आप सोच सकते हैं कि देश के विभाजन के तीन दिनों बाद तक बंगाल के कई जिले भारत का हिस्सा थे ही नहीं, बल्कि उन्हें ‘पूर्वी पाकिस्तान’ घोषित कर दिया गया था?

आज के इस वीडियो में हम बात करेंगे इतिहास के उस पुराने ‘जख्म’ की, जिसे अक्सर सेकुलर इतिहासकारों ने किताबों के पन्नों के नीचे दबा दिया। हम बात करेंगे उस ‘Radcliffe Line’ की, जिसने रातों-रात लाखों हिंदुओं और सिखों को उनके ही घर में पराया बना दिया। और हम बात करेंगे उन तीन दिनों की, 15 अगस्त से 17 अगस्त 1947 तक, जब बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे जिलों में आज़ादी का सूरज नहीं, बल्कि मजहबी कट्टरता का अंधेरा छाया हुआ था।

एक लापरवाह बैरिस्टर और भारत का बंटवारा

ब्रिटिश हुकूमत ने भारत को लूटने में तो 200 साल लगाए, लेकिन जब इसे छोड़ने की बारी आई, तो उन्होंने इसे इतनी बेरहमी से काटा कि उसकी टीस आज भी महसूस होती है। इस बंटवारे का मुख्य किरदार था सर सिरिल रेडक्लिफ।

लंदन का एक बैरिस्टर, जिसे भारत की Geography, Culture, Religion या Sensitivity के बारे में ‘अ’ भी नहीं पता था। कहा जाता है कि उसने पेरिस के पूर्व में कभी यात्रा ही नहीं की थी। लेकिन उसे काम सौंपा गया भारत के सीने पर विभाजन की लकीर खींचने का। और समय कितना दिया गया? मात्र पाँच हफ्ते।

ज़रा सोचिए, एक ऐसा व्यक्ति जिसे यह नहीं पता कि नदिया जिले की महत्ता क्या है या मालदा के हिंदुओं का संघर्ष क्या है, वह एक बंद कमरे में मैप पर पेन चलाकर करोड़ों लोगों का भाग्य लिख रहा था। यह अंग्रेजों की भारत के प्रति ‘गंभीरता’ का सबसे बड़ा प्रमाण था। रेडक्लिफ ने जो रेखा खींची, उसने न केवल ज़मीन को बांटा, बल्कि मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी को जन्म दिया।

बंगाल का वो ‘काला सवेरा’

विभाजन के दौरान बंगाल की स्थिति सबसे भयावह थी। रेडक्लिफ ने बंगाल को दो हिस्सों में बांट दिया। एक बना पश्चिम बंगाल, यानी भारत, और दूसरा बना East Pakistan, यानी आज का बांग्लादेश। लेकिन इस सीमा निर्धारण में जो गलतियां हुईं, वो सिर्फ ‘भूल’ नहीं थीं, वो एक ‘Blunder’ था।

9 अगस्त को ही रेडक्लिफ ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी, लेकिन माउंटबेटन ने इसे सार्वजनिक नहीं किया। क्यों? क्योंकि अंग्रेज चाहते थे कि दंगों की जिम्मेदारी उन पर न आए। नतीजा यह हुआ कि 15 अगस्त की सुबह बंगाल के कई हिंदू-बहुल क्षेत्रों को पता चला कि वे ‘पाकिस्तान’ का हिस्सा बन गए हैं।

All India Radio पर खबर आई कि मालदा, नदिया, मुर्शिदाबाद और उत्तर 24 परगना के कुछ हिस्से पूर्वी पाकिस्तान को दे दिए गए हैं। यह खबर बिजली की तरह गिरी। जिस आज़ादी का लोग इंतज़ार कर रहे थे, वही उनके लिए एक डरावना सपना बन गई।

जब मुर्शिदाबाद और मालदा में लहराया पाकिस्तानी झंडा

15 अगस्त 1947। जब नेहरू जी दिल्ली में ‘Tryst with Destiny’ वाला भाषण दे रहे थे, तब बंगाल के इन जिलों में क्या हो रहा था?

Muslim League के समर्थक सड़कों पर उतरकर जश्न मना रहे थे। ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारों के साथ पाकिस्तानी झंडे लहराए जा रहे थे। मालदा के कलेक्ट्रेट ऑफिस पर पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया गया।

नदिया के कृष्णानगर स्थित टाउन हॉल और जिला पुस्तकालय पर भी ‘चांद-तारे’ वाला झंडा लगा दिया गया।

वहां के हिंदुओं की हालत क्या थी? लेख में एक रिटायर शिक्षक तुषार कांति घोष का ज़िक्र है, जो बताते हैं कि वह उनके जीवन का ‘सबसे काला सवेरा’ था। लोगों में इस कदर खौफ था कि हिंदुओं को सलाह दी गई थी कि वे अपने घरों में बड़े बर्तनों में खौलता हुआ पानी तैयार रखें, ताकि अगर मुस्लिम भीड़ हमला करे, तो वे अपना बचाव कर सकें।

महिलाओं ने डर के मारे दो दिनों तक चूल्हा नहीं जलाया। पूरे इलाके में ‘Blackout’ जैसी स्थिति थी।

यह वो दौर था जब सेकुलरिज्म की बातें करने वाले नेता सुरक्षित कमरों में थे, और ज़मीन पर आम आदमी अपनी जान और अस्मत बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था।

नदिया के राजपरिवार का विद्रोह

इस अन्याय के खिलाफ सबसे प्रखर आवाज़ उठी नदिया के राजपरिवार की ओर से। जब उन्हें पता चला कि उनकी राजधानी कृष्णानगर को पूर्वी पाकिस्तान में डाल दिया गया है, तो राजपरिवार ने इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

नदिया, जो अपनी हिंदू विरासत और संस्कृति के लिए जाना जाता था, उसे मजहब के आधार पर पाकिस्तान को सौंपना किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं था। विरोध इतना बढ़ा कि लोग सड़कों पर उतर आए। बड़े-बड़े नेताओं और हस्तियों ने माउंटबेटन को टेलीग्राम भेजे।

आशु चौधरी और बलदेवानंद गिरी जैसे लोग रातों-रात कोलकाता पहुंचे और Boundary Commission से अपील की कि इस ऐतिहासिक गलती को सुधारा जाए।

17 अगस्त की रात और 18 अगस्त का सूरज

जनता का भारी दबाव और ज़मीनी हकीकत को देखते हुए माउंटबेटन को एहसास हुआ कि अगर यह गलती नहीं सुधारी गई, तो बंगाल में खून की नदियां बहेंगी। रेडक्लिफ को आदेश दिया गया कि वह सीमा में बदलाव करे।

14, 15 और 16 अगस्त—इन तीन दिनों तक मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया के लोग तकनीकी रूप से पाकिस्तान के नागरिक थे। लेकिन 17 अगस्त की रात को कमीशन ने औपचारिक घोषणा की। संशोधित मैप में मुर्शिदाबाद को भारत को वापस दिया गया और नदिया के हिंदू-बहुल हिस्सों को भी भारत में शामिल किया गया। बदले में कुछ मुस्लिम-बहुल इलाके पाकिस्तान को दिए गए।

18 अगस्त 1947 को मालदा के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट अशोक सेन ने प्रशासनिक भवन पर पहली बार भारतीय तिरंगा फहराया। यही वो दिन था जब बंगाल के इन जिलों ने चैन की सांस ली। इसीलिए आज भी वहां के लोग 15 अगस्त के साथ-साथ 18 अगस्त को ‘भारत भुक्ति दिवस’, यानी ‘India Inclusion Day’ के रूप में मनाते हैं।

क्या सब कुछ ठीक हो गया? चटगांव की त्रासदी

हालांकि कुछ इलाकों को बचा लिया गया, लेकिन रेडक्लिफ की कलम ने एक और बड़ा पाप किया था—Chittagong Hill Tracts।

यह इलाका 98% Non-Muslim था। वहां ज़्यादातर Buddhists रहते थे और ये लोग भारत के साथ आना चाहते थे। उन्होंने तिरंगा भी फहरा दिया था। लेकिन रेडक्लिफ ने तर्क दिया कि Chittagong Port की Economic Survival के लिए यह इलाका पाकिस्तान को देना ज़रूरी है।

Humanity और Population को ‘आर्थिक हितों’ की बलि चढ़ा दिया गया। आज वहां के बौद्धों और अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति है, यह किसी से छिपा नहीं है।

नेहरू, कांग्रेस और इतिहास की चुप्पी

यहां सवाल पूछना ज़रूरी है। जब यह सब हो रहा था, तब कांग्रेस का नेतृत्व क्या कर रहा था?

रिपोर्ट बताती है कि कांग्रेस ने पूरे Undivided Bengal का 59% हिस्सा भारत के लिए मांगा था, लेकिन रेडक्लिफ ने भारत को केवल 36% हिस्सा दिया।

इतना ही नहीं, आज़ादी के बाद भी इन घटनाओं को इतिहास की मुख्यधारा से गायब कर दिया गया। जब स्थानीय इतिहासकार अंजन सुकुल ने पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सरकार, यानी ज्योति बसु सरकार, से संपर्क किया कि 18 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाने की अनुमति दी जाए, तो उन्हें मना कर दिया गया।

सोचिए, अपनी ही भूमि के भारत में विलय का उत्सव मनाने के लिए भी इन लोगों को दशकों तक संघर्ष करना पड़ा। आखिरकार पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान Ministry of Information and Broadcasting ने इसे मंजूरी दी।

आज जब हम आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तो हमें उन तीन दिनों के संघर्ष को नहीं भूलना चाहिए। बंगाल का विभाजन केवल नक्शे पर खींची गई एक लकीर नहीं था, बल्कि यह लाखों परिवारों के टूटने, हजारों हत्याओं और गहरी मजहबी नफरत की कहानी थी।

रेडक्लिफ की वो ‘गलती’ आज भी हमें याद दिलाती है कि जब फैसले ज़मीनी हकीकत से दूर एसी कमरों में लिए जाते हैं, तो उसका खामियाजा आम आदमी को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।

18 अगस्त का ‘भारत भुक्ति दिवस’ हमें उन पूर्वजों की याद दिलाता है, जिन्होंने पाकिस्तान का झंडा उतारकर तिरंगा फहराने के लिए लड़ाई लड़ी। यह दिन जीत का भी है और उस दर्द का भी, जो विभाजन की वजह से बंगाल ने सहा।

Editorial team:
Production team:

More videos with Ritika Chandola as Anchor/Reporter