Brigadier Rudra Pratap Singh

ब्रिगेडियर रुद्र प्रताप सिंह: नायक या खलनायक?

Summary
फिल्म में ब्रिगेडियर प्रताप को खलनायक के रूप में दिखाया गया है, जबकि जनता का एक बड़ा हिस्सा आज उस किरदार को अपना नायक मानता है और साथ ही ये भी मानता है कि वे कितने सही थे।

जब भी कोई आतंकवादी घटना होती है, तो सोशल मीडिया पर हमें शौर्य फिल्म के कोर्ट रूम सीन से जुड़े संवाद देखने को मिलते हैं। पिछले कुछ वर्षों में ब्रिगेडियर रुद्र प्रताप सिंह के उस किरदार का जिस तरह से लोगों ने महिमामंडन किया है, उसको लेकर कई प्रकार के विचार हमें देखने को मिलते हैं।

उस फिल्म में ब्रिगेडियर प्रताप को खलनायक के रूप में दिखाया गया है, जबकि जनता का एक बड़ा हिस्सा आज उस किरदार को अपना नायक मानता है और साथ ही ये भी मानता है कि वे कितने सही थे। इसलिए एक पूरा ईकोसिस्टम इस बात को प्रचारित कर रहा है, कि ब्रिगेडियर प्रताप के महिमामंडन से कहीं न कहीं समाज में बुराई और नफ़रत की स्वीकार्यता बढ़ रही है।

इस वीडियो में हम उन्ही पहलुओं पर प्रकाश डालेंगे, कि क्या सच में समाज अब खलनायकों को ग्लोरीफ़ाई करने लग गया है? हम यह भी देखेंगे कि जो लोग ब्रिगेडियर प्रताप का महिमामंडन कर रहे हैं, क्या सच में उन लोगों को बुराई और नफ़रत पसंद है? या फिर सच्चाई इससे कहीं अलग है?

हम ब्रिगेडियर प्रताप के संवादों के माध्यम से ही यह समझने का प्रयास करेंगे, कि आखिर क्यों आजकल उनकी चर्चा ज्यादा हो रही है?

पहले यह डायलॉग सुनिए जिसमें वे कहते हैं कि “दुश्मन सिर्फ बॉर्डर के उस पार नहीं होता, घर के अंदर भी होता है।” एक प्रश्न हर एक भारतीय से, क्या आपको नहीं लगता कि भारत घर के दुश्मनों से भी परेशान है?

क्या देश यह जानता नहीं है, कि 1962 के युद्ध में Communist party of India ने खुलकर चीन को सपोर्ट किया था। क्या हमने सेना पर पत्थरबाज़ी करते लोगों को नहीं देखा है? जो लोग आए दिन हमारी सेनाओं का मनोबल गिराने का प्रयास करते हैं, क्या वह किसी दुश्मन से कम हैं? स्वर्गीय CDS बिपिन रावत जी ने जब 2.5 फ्रंट की बात की थी, तो ऐसा उन्होंने घर के दुश्मनो के बारे में ही तो कहा था।

इसलिए ब्रिगेडियर प्रताप ने यदि कहा कि दुश्मन घर के अंदर भी है, तो इसमें किसी बुराई का महिमामंडन कैसे हो गया?

आइये उनका दूसरा संवाद सुनते हैं- “वफ़ादारी सिर्फ इनके कौम के प्रति है”

यह बात बड़ी संवेदनशील है क्योंकि ये लाइन ऐसा संदेश देती है कि एक पूरे समुदाय को ही विलेन बनाया जा रहा है। स्वाभाविक सी बात है कि एक पूरी कम्यूनिटी को इस बात से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। लेकिन कुछ ऐसी घटनाएँ भी इस देश में लगातार घटती आई हैं, जिनको देखकर मुँह मोड़ लेना भी उचित नहीं है।

ऐसा क्यों होता है, कि मुस्लिम समुदाय के एक बड़े तबके को फिलिस्तीन, इराक और सीरिया में मरते हुए लोग दिखाई देते हैं, लेकिन भारत में विस्थापित कश्मीरी पंडितों का दर्द उन्हें नहीं दिखता। आखिर ऐसा क्यों होता है कि राफ़ा पर इजरायल जब हमला करता है, तो भारत में कई ‘एक्स’ अकाउंट, ‘All eyes on Rafah’ का ट्रेंड चलाते हैं, लेकिन पहलगाम जैसे आतंकवादी कृत्य की निंदा हमें उन अकाउंट पर देखने को नहीं मिलती।

और ये आज से नहीं चल रहा। बल्कि इन घटनाओं का इतिहास बहुत पुराना है। 1919 में तुर्की के खलीफा का जब अपमान हुआ, तो भारत में दंगे होने लगे। खिलाफत आंदोलन तक शुरू हो गया? यह बात तो सोचने वाली है, क्योंकि इस्लाम के अलावा तुर्की के साथ भारतीय मुसलमानों का और कोई संबंध तो है ही नहीं। इसके अलावा भी आए दिन, हमें भारत में संविधान से ऊपर शरिया की बात सुनने को मिलती है।

इसलिए अगर ब्रिगेडियर प्रताप यह कह रहे हैं, कि इनकी वफ़ादारी सिर्फ इनके कौम के प्रति है, तो अगर वह पूरी तरह से सही नहीं हैं, तो वह पूरी तरह से गलत भी नहीं हैं। क्योंकि भारत में ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, और लोगों के सामने हो रही हैं।

दरअसल ब्रिगेडियर प्रताप ने उस वीडियो में जो कुछ भी कहा, वह कोई खोखली कल्पना नहीं, बल्कि एक रियलिटी है। दर्शकों का अनुभव ,उस फ़िल्म की स्क्रिप्ट पर भारी पड़ गया, और वहाँ एक सिनेमैटिक मिसफायर हुआ। यानी फ़िल्म दिखाना कुछ और चाहती थी, लेकिन दर्शकों ने देखा कुछ और। जाहिर सी बात है, जब लोग धरातल पर ब्रिगेडियर प्रताप की कही बातों को चरितार्थ होते हुए देखेंगे, तो लोग उन्हें ‘फ़ासीवादी’ नहीं, बल्कि ‘Pragmatic’ (यथार्थवादी) ही मानेंगे।

ब्रिगेडियर रुद्र प्रताप सिंह के संवाद अगर आज इतने प्रासंगिक लगते हैं, तो यह किसी फ़िल्मी सनक का, या फिर बुराई को महिमामंडन करने का नतीजा नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है, कि आज का समाज जिन संकटों से जूझ रहा है, उसे लोग महसूस कर रहे हैं। जब वे कहते हैं कि “दुश्मन घर के अंदर भी होता है”, तो यह कोई जातीय या धार्मिक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक व्यापक चेतावनी है—उन विचारों, उन मानसिकताओं और उन लोगों के खिलाफ, जो राष्ट्र को भीतर से खोखला कर रहे हैं।

इसलिए जब सच से आंखें चुराना मुश्किल हो जाय, तो संवाद ज़रूरी हो जाता है। इस देश के मुस्लिमों से एक संवाद करना होगा। मुस्लिमों को यह समझना होगा कि भारतीयता, भारत की अस्मिता और भारत की पीड़ा में उनकी साझेदारी जितनी मुखर और स्पष्ट होगी, समाज का भरोसा उतना ही मजबूत होगा। अगर किसी घटना की आलोचना सिर्फ इस आधार पर की जाती है कि वह किसी ‘इस्लामिक देश’ से जुड़ी है, और भारत की आंतरिक घटनाओं पर चुप्पी साध ली जाती है, तो यह सिलेक्टिव आउटरेज संदेह पैदा करता है। और यही संदेह धीरे-धीरे घाव बन जाता है।

ब्रिगेडियर प्रताप को अगर लोग नायक मानते हैं, तो वह इसलिए नहीं कि वे मुसलमानों से नफरत करते हैं, बल्कि इसलिए कि वे उस कड़वी सच्चाई को बोलते हैं, जिसे आम जनता रोज़ देख रही है।

इसलिए वक्त की मांग है कि इस देश का मुस्लिम समुदाय भारत की मुख्यधारा में सिर्फ अधिकारों की मांग न करें, बल्कि कर्तव्यों को भी निभाएं। जब कश्मीर से हिन्दुओं का पलायन हो, तो मुसलमान भी उस पीड़ा को अपनी पीड़ा मानें। जब कोई हिन्दू बच्चा इस्लामी आतंकवाद का शिकार होता है, तो उसके लिए भी उतने ही आँसू बहें, जितने किसी गाजा के बच्चे के लिए बहते हैं।

आज का भारत, मुसलमानों से नफरत नहीं करता। देश में एकता रहे, ऐसा सभी चाहते हैं। लेकिन आज का भारत, सवाल जरूर पूछना चाहता है — और वह सवाल है: कि आप किसके साथ खड़े हैं? भारत के साथ, या किसी कट्टरपंथी क़ौमी सोच के साथ?

यदि इस प्रश्न का उत्तर भारत के पक्ष में है, तो यकीन मानिए — ब्रिगेडियर प्रताप की बातें भी, महज़ एक फिल्मी डायलॉग बनकर रह जाएँगी।

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