नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने विभिन्न मुद्दों को लेकर जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शन के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिनमें प्रदर्शनकारी ‘हम क्या चाहते? आज़ादी’ और ‘हम फिर भी कहेंगे, आज़ादी’ जैसे नारे लगाते दिखाई दे रहे हैं।
वायरल वीडियो के अनुसार प्रदर्शनकारी लगातार आज़ादी के नारे लगा रहे थे। नारेबाजी के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर पेपर लीक के मुद्दे का भी उल्लेख किया और ‘मेरे पेपर लीक से आज़ादी’ जैसे नारे लगाए। ढपली बजाते हुए प्रदर्शनकारियों ने मोदी से आजादी, बीजेपी से आजादी, पेपर लीक से आजादी के भी नारे लगाए।
नारेबाजी के बीच पुलिस की अपील
प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस और सुरक्षा कर्मियों की ओर से लाउडस्पीकर पर बार-बार घोषणा की गई। पुलिस ने लोगों से सड़क पर चलने के बजाय फुटपाथ का उपयोग करने की अपील की और कहा कि सड़क पर चलने से दुर्घटना की आशंका हो सकती है। इसके साथ ही प्रदर्शन समाप्त होने के बाद लोगों से शांतिपूर्वक परिसर खाली करने का अनुरोध भी किया गया।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को लेकर विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे लोकतांत्रिक विरोध का हिस्सा बता रहे हैं, जबकि कुछ लोगों ने नारों की प्रकृति और उनके राजनीतिक संदेशों पर सवाल उठाए हैं।
क्यों विवादित रहे हैं ‘आज़ादी’ के नारे?
‘आज़ादी’ के नारे पिछले एक दशक में कई विश्वविद्यालयों और राजनीतिक आंदोलनों के दौरान विवाद का विषय रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि ऐसे नारे सामाजिक, आर्थिक या प्रशासनिक समस्याओं के खिलाफ विरोध का प्रतीक होते हैं। वहीं आलोचकों का आरोप रहा है कि कुछ आयोजनों में इन नारों का इस्तेमाल ऐसे संदर्भों में भी हुआ, जिन्हें उन्होंने राष्ट्र-विरोधी या विभाजनकारी बताया।
विशेष रूप से कुछ छात्र आंदोलनों और राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान लगे नारों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस और राजनीतिक विवाद देखने को मिले हैं। इसी वजह से ‘आज़ादी’ के नारे आज भी सार्वजनिक विमर्श में एक संवेदनशील और विवादित विषय बने हुए हैं।


