“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले…” मिर्ज़ा ग़ालिब ने यह शेर शायद भारतीय चुनाव आयोग की भविष्य की वेबसाइट देखकर ही लिखा होगा।
भारत दुनिया का शायद इकलौता लोकतंत्र है जहाँ “मंत्री हटाओ पार्टी”, “मुहब्बत पार्टी”, “INDIAN LOVERS PARTY”, “पिरामिड पार्टी” और अब “इश्क़ करो पार्टी” एक ही चुनाव आयोग में बाकायदा पंजीकृत हो सकती हैं।
यही हमारी लोकतांत्रिक विविधता भी है। और इसी विविधता को आजकल कुछ लोग भुना भी रहे हैं।
इस बार मैदान में उतरे हैं ‘UP’ फ़िल्म वाले मिस्टर फ़्रेडरिकसन नहीं, बल्कि भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू। दोनों की आशिक़मिज़ाजी में कोई ख़ास फ़र्क दिखता भी नहीं है।
एक ज़माना था जब राजनीतिक दल समाजवाद, राष्ट्रवाद, उदारवाद, पूँजीवाद या क्रांति की बातें करते थे। आज देखिए… कोई “जागते रहो पार्टी” बना रहा है, कोई “भारतीय मुहब्बत पार्टी”, कोई “INDIAN LOVERS PARTY”, कोई “LIFE PEACEFUL PARTY”, और अब पूर्व मुख्य न्यायाधीश साहब “इश्क़ करो पार्टी” लेकर मैदान में उतर आए हैं।
मुझे डर है कि इसी रफ़्तार से अगले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में निम्नलिखित दल भी अवतरित हो सकते हैं:
- दिल टूटा मोर्चा
- फ्रेंडज़ोन मुक्ति दल
- सीनज़ोन संघर्ष समिति
- घोस्टेड यूथ फ्रंट
- REELS क्रांतिकारी पार्टी
- लेट रिप्लाई जनता दल
- यू डिज़र्व बेटर मोर्चा
अब सवाल यह है कि इनका घोषणापत्र क्या होगा? हर युवा को संदेश में डबल टिक का मौलिक अधिकार। टूटे दिल वालों को फ्रेंडज़ोन से मुक्ति का संवैधानिक संरक्षण। नवविवाहित पुरुषों को नीले ड्रम से सुरक्षा की गारंटी। रात दो बजे ENTER मार-मारकर कविता लिखने वालों से जनता की रक्षा। UPSC में एक नंबर से रह जाने वालों को एक नंबर से पास होने का पुनर्वास पैकेज। बिस्तर के पास मोबाइल चार्जर के लिए एक्सटेंशन बोर्ड का कानूनी अधिकार। INSTAGRAM पर वायरल न होने वालों के लिए डिजिटल वैक्सीन योजना। और पड़ोसी की तरक्की से जलने वालों को जुगनू बनने का मौलिक अधिकार।
जहाँ तक काटजू साहब द्वारा आमंत्रित की गईं महुआ मोइत्रा का सवाल है, मुझे पूरा विश्वास है कि वे जल्द ही “हेनरी राइट्स पार्टी” की स्थापना करेंगी। और बदले में हेनरी साहब लेकर आएँगे, “चुराए हुए कुत्तों के सहमति अधिकार आंदोलन”।


