Indian Sailor Aditya Sharma Killed by US Missile in Oman

अमेरिकी हमले में मारे गए नाविक आदित्य शर्मा: शिपिंग कंपनी ने खतरे में डाली 3 भारतीयों की जान?

Summary
ओमान के पास हुए US Attack में भारतीय नाविक आदित्य शर्मा की मौत के बाद शिपिंग कंपनी पर सवाल उठ रहे हैं। परिवार का कहना है कि आदित्य शोषण के चलते जहाज़ छोड़ना चाहते थे।

10 जून की आधी रात को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर राजेश शर्मा नाम के व्यक्ति की एक भावुक अपील दिखी थी। उन्होंने शिकायत की थी कि जिस शिपिंग कंपनी के लिए उनका बेटा आदित्य काम कर रहा है, वह खतरे को जानते हुए भी नाविकों की सुरक्षा को गंभीरता से नहीं ले रही। उस समय शायद बहुत कम लोगों ने उस पोस्ट पर ध्यान दिया होगा।

यही आदित्य शर्मा, सेटेबेलो टैंकर पर काम कर रहे थे। टैंकर पर US अटैक के बाद से तीन भारतीय क्रू मिसिंग थे। आदित्य के पिता राजेश शर्मा ने शिपिंग कंपनी का मैसेज भी शेयर किया और बताया कि उनका बेटा अप्रैल में सीनियर द्वारा एक्सप्लॉइटेशन की शिकायत करके शिप छोड़ना चाहता था। आदित्य शर्मा की उम्र 23 साल थी और वो हिमाचल प्रदेश के रहने वाले थे। 

अब खबर आई है कि ओमान के तट के पास हुए हमले में भारतीय नाविक आदित्य शर्मा की मौत हो गई। जिस जहाज़ पर वह सवार थे, उसका नाम सेटेबेलो (Settebello) बताया जा रहा है।  

समुद्री रिकॉर्ड बताते हैं कि यही जहाज़ पहले मैरीवेक्स (Marivex) और उससे भी पहले Arihant नाम से जाना जाता था। जहाज़ का IMO नंबर 9464156 हर नाम के साथ वही रहा। यह कोई भारतीय जहाज़ नहीं था। इस पर भारत का नहीं, बल्कि पलाऊ का झंडा लगा हुआ था। वहीं, जिस कंपनी से यह जहाज़ जुड़ा हुआ था, Arihant Shipping Incorporation., वह पनामा में रजिस्टर्ड थी। 2 बातें यहाँ पर स्पष्ट हो जाती हैं कि ना तो इस पर भारत का झंडा था और ना ही यह भारत सरकार का जहाज़ था। यह एक निजी अंतरराष्ट्रीय शिपिंग नेटवर्क का हिस्सा था, जिस पर भारतीय नाविक नौकरी कर रहे थे।

दिसंबर 2025 में अमेरिकी ट्रेजरी ने इसी Panama-registered Arihant Shipping Inc. और उसके जहाज़ Arihant पर प्रतिबंध लगाए थे। अमेरिकी आरोप था कि उसका जहाज़ ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों के परिवहन में शामिल था और ईरान पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार कर रहा था। यानी जहाज़ पहले से अमेरिकी निगरानी और प्रतिबंधों के दायरे में था।

इसके बाद जहाज़ का नाम बदल गया, लेकिन IMO नंबर वही रहा। और वह उसी पश्चिम एशियाई समुद्री क्षेत्र में काम करता रहा जिसे दुनिया के सबसे संवेदनशील और हाई-रिस्क क्षेत्रों में गिना जाता है। और यहीं एक बड़ा सवाल खड़ा होता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ दिन पहले इसी जहाज़ के इंजन रूम में विस्फोट और आग लगने की घटना भी सामने आई थी। अगर जहाज़ पहले से जोखिम में था, अगर कंपनी पर अमेरिकी प्रतिबंध थे, अगर पूरा इलाका सैन्य तनाव के बीच था, तो क्या कंपनी ने अपने नाविकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठाए?

यही सवाल आज आदित्य शर्मा के पिता भी पूछ रहे हैं। अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई ईरानी तेल से जुड़े प्रतिबंधों और समुद्री अवरोध को लागू करने के लिए की गई। वहीं भारत सरकार ने इस घटना पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। भारत ने अमेरिकी Charge d’Affaires Jason Meeks को तलब किया है, हमले पर चिंता जताई है और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर ओमान के साथ कॉर्डिनेशन शुरू किया है।

लेकिन इस पूरी घटना का सबसे दुखद पहलू शायद कुछ और है। पश्चिम एशिया के युद्ध और भू-राजनीतिक संघर्षों में मरने वाले अक्सर वे लोग नहीं होते जो फैसले लेते हैं। मरते हैं मजदूर, कामगार और नाविक।

खाड़ी देशों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार में लाखों भारतीय काम करते हैं। जहाज़ किसी और का होता है, झंडा किसी तीसरे देश का होता है, कंपनी चौथे देश में रजिस्टर्ड होती है, लेकिन जब मिसाइल गिरती है तो मरने वालों में अक्सर भारतीय भी शामिल होते हैं। इसलिए इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ अमेरिका या ईरान नहीं है।

सवाल ये है कि क्या युद्ध और प्रतिबंधों के खतरे के बावजूद एक शिपिंग कंपनी ने अपने कर्मचारियों को ऐसे जोखिम भरे रास्ते पर भेजकर उनकी जान दांव पर लगा दी? और अगर ऐसा है, तो जिम्मेदारी सिर्फ हथियार चलाने वालों की नहीं, बल्कि उन कॉरपोरेट फैसलों की भी है जिन्होंने खतरे को जानते हुए यह जोखिम उठाया।

ये बात भारत सरकार भी जानती है, कि हम चाहें या ना चाहें लेकिन फिर भी डायरेक्टली और इन डायरेक्टली इस युद्ध का हिस्सा भारतीय भी बन ही चुके हैं। इसलिए भारतीय नाविकों और कामगारों की सुरक्षा के लिए भी ठोस व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए क्योंकि जहाज़ और कंपनी चाहे किसी की भी हो, हादसे की सबसे बड़ी कीमत अपने लोगों को ही चुकानी है।

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