Mamata Banerjee and TMC

तृणमूल कांग्रेस में टूट क्यों है दीदी-भैया पार्टियों के लिए रिमाइंडर?

Summary
परिवारवादी राजनीति, आंतरिक लोकतंत्र की कमी और नेतृत्व-केंद्रित दलों की चुनौतियों पर यह विश्लेषण बताता है कि भारतीय राजनीति में संगठन की मजबूती और विचारधारा की स्पष्टता क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है।

सायोनी घोष बेवफा है, युसूफ पठान गद्दार है, ये लोग डर गए हैं, बिक गए हैं। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के जो अब तक तीन फाड़ हुए हैं, एक तरफ, दूसरी तरफ रिताब्रता बनर्जी 60 विधायकों को लेकर खड़े हैं और तीसरी तरफ TMC के सांसदों ने Nationalist Citizens Party of India (NCPI) में खुद को मर्ज कर लिया है। तो दीदी की पार्टी के ये तीन टुकड़े हो गए हैं। 

अब इस पर यही एक सामान्य रिएक्शन दिया जा रहा है लेकिन कोई ये बात क्यों नहीं कह रहा है कि दीदी आप जो डर के बूते अपनी सत्ता चला रही थीं वो आपकी पार्टी के लोग क्या, इस देश के लोगों की ही फितरत में नहीं है।

सत्ता एक समय तक डर से चलाई जा सकती है, लेकिन पार्टी नहीं। जिस पार्टी की पूरी ताकत एक परिवार, एक व्यक्ति और एक दरबार के इर्द-गिर्द खड़ी हो, वहां टूट की शुरुआत बाहर से नहीं, भीतर से होती है। इतिहास गवाह है कि भारत में परिवारवादी दलों की सबसे बड़ी कमजोरी विपक्ष नहीं, उनका अपना ढांचा होता है। जब कार्यकर्ताओं और नेताओं को लगे कि ऊपर जाने का रास्ता बंद है, तो पार्टी एक संगठन नहीं, कार्टेल बन जाती है। और लोकतंत्र में कार्टेल ज्यादा दिन नहीं चलते। 

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का उदाहरण हमारे सामने है, उन्होंने भी इमरजेंसी लगाकर पूरे देश को डराने की कोशिश की लेकिन वो प्रयोग फेल हुआ था तो दीदी पश्चिम बंगाल की जनता आपको कैसे सफल होने दे सकती है?

TMC की कोई अपनी राजनीतिक विचारधारा नहीं है सिवाय मुस्लिम अपीजमेंट के। दीदी, भैया तक ये पार्टी सिमटी हुई है जबकि दूसरी तरफ आपके सामने जो पार्टी खड़ी है, भाजपा। उसकी अपनी एक लेगेसी है, वो राष्ट्रवादी विचारधारा वाली पार्टी है, वो इस देश के लोकतंत्र में सचमुच विश्वास रखती है और उसकी झलक आपको पार्टी के पदों पर भी देखने को मिलती है। कभी उत्तर प्रदेश से आपको राष्ट्रीय अध्यक्ष को मिलता है, तो कभी गुजरात से, कभी हिमाचल से तो कभी बिहार से। 

जबकि दूसरी तरफ इस देश में जहां-जहां परिवारवादी पार्टियां रही हैं, जिन्होंने पावर को केवल एक परिवार, एक व्यक्ति तक सीमित रखा है वो टूटी ही है। अब उसे आप महाराष्ट्र में उद्धव गुट वाली शिवसेना के रूप में देख सकते हैं, इसी राज्य में शरद पवार के गुट वाली NCP के रूप में देख सकते हैं। बिहार में RJD की लड़ाई सड़क तक आ गई है।

तो इससे क्या साबित होता है? इस देश की जनता तक अब इन्फॉर्मेशन की ठीक-ठाक पहुंच है और लोगों ने पिछले 12 सालों में राजनीतिक तौर पर बहुत बदलाव देखा है और अब वो साफ-साफ यह जानना चाहते हैं कि आप हैं कौन? आप क्या करना चाहते हो? आपकी विचारधारा क्या है?

इन सभी पार्टियों को अटल बिहारी वाजपेयी की वो लाइन याद रखनी चाहिए कि ‘इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए’, ये बात इंडियन पॉलिटिकल पार्टीज को खुद पर भी उतनी ही लागू करनी चाहिए, जितनी इस देश पर हो रही है। अगर आपके भीतर ही लोकतंत्र नहीं होगा तो आपके आस-पास के लोग और इस देश की लोकतांत्रिक जनता आपको स्वीकार नहीं करेगी और उसका खामियाजा आपको भुगतना पड़ेगा। उदाहरण हमनें आपको बता दिए।

Editorial team:
Production team:

More videos with Jayesh Matiyal as Anchor/Reporter