Ethenol

E20 पेट्रोल की ‘असली’ गणित: आत्मनिर्भरता या आपकी गाड़ी का दुश्मन?

Summary
E20 पेट्रोल को लेकर मचे विवाद के बीच जानिए एथेनॉल ब्लेंडिंग का असली सच। क्या इससे वाकई माइलेज कम होता है? अपनी पुरानी गाड़ी को कैसे बचाएं और क्यों सरकार इस पर इतना ज़ोर दे रही है?

पेट्रोल पंप पर अगली बार जब आप अपनी गाड़ी में ईंधन भरवाएं, तो एक बार नोज़ल के पास लगे उस छोटे-से स्टिकर पर ज़रूर नज़र डालिएगा, जिस पर ‘E20’ लिखा होता है। हो सकता है आपने इसे पहले भी देखा हो, लेकिन कभी ज़्यादा ध्यान न दिया हो। अब वही स्टिकर सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है। कोई कह रहा है कि E20 आने के बाद उसकी गाड़ी का माइलेज पहले जैसा नहीं रहा, तो किसी का दावा है कि इंजन की परफॉर्मेंस पर असर पड़ा है। कुछ लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि सरकार पेट्रोल के नाम पर हमारी गाड़ियों में ‘अल्कोहल’ डलवा रही है।

लेकिन क्या वाकई कहानी इतनी सीधी है? क्या सरकार सिर्फ पर्यावरण और तेल आयात कम करने की कोशिश कर रही है? या फिर सोशल मीडिया पर दिख रही आधी-अधूरी जानकारी ने इस पूरी बहस को ज़्यादा डरावना बना दिया है?

सच ये है कि E20 की कहानी सिर्फ पेट्रोल की नहीं है। ये भारत की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय, ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और करोड़ों वाहन मालिकों के बीच चल रहे एक ऐसे ट्रांजिशन की कहानी है, जिसके फायदे भी हैं, नुकसान भी हैं और भ्रम भी। इसलिए इस लेख में हम किसी एक पक्ष की बात नहीं करेंगे। हम समझेंगे कि E20 आखिर है क्या, इसे इतनी तेज़ी से क्यों लागू किया गया, लोगों की शिकायतों में कितना दम है, इस पूरे विवाद का असली सच क्या है और अंत में अपने-अपने स्तर पर इसका समाधान क्या है।

भाग 1: हम इस मुसीबत में क्यों फँसे हैं?

सबसे पहले ये समझते हैं कि हम एथेनॉल पर इतना ज़ोर क्यों दे रहे हैं। सवाल आता है कि सरकार इसके पीछे इतनी गंभीर क्यों है? जवाब तीन शब्दों में है: आर्थिक सुरक्षा, कृषि शक्ति और पर्यावरण।

भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 85% से 90% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसका मतलब है कि हम अरबों डॉलर हर साल सिर्फ तेल खरीदने के लिए विदेश भेज रहे हैं। जब भी खाड़ी देशों में या वैश्विक स्तर पर कोई जियो-पॉलिटिकल तनाव होता है, तो तेल की कीमतें बढ़ती हैं, जिसका सीधा असर आपकी और हमारी जेब पर पड़ता है और पेट्रोल महंगा हो जाता है।

अब सरकार के पास दो रास्ते थे- या तो हम रातों-रात सबको इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर शिफ्ट कर दें, लेकिन चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की हालत तो हम सभी जानते हैं, या फिर पेट्रोल में ही कुछ ऐसा मिलाएं जो देसी हो, सस्ता हो और प्रदूषण भी कम करे। यहीं से एथेनॉल की एंट्री होती है।

1970 के दशक में तेल संकट की वजह से पेट्रोल पंपों पर घंटों लाइनें लगती थीं। वह डर आज भी हमारे सिस्टम में है। अगर हम बाहर से तेल मंगाना कम कर दें, तो हमारा विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा। अब तक, हमने ₹1.90 लाख करोड़ से ज़्यादा की विदेशी मुद्रा बचा ली है। लोग पूछते हैं कि इससे किसको फायदा हुआ? जवाब है, उस किसान को, जिसका गन्ना और मक्का पहले मंडियों में सड़ जाता था। उसे एथेनॉल की सप्लाई चेन से अब तक ₹1.18 लाख करोड़ का सीधा फायदा मिला है।

इसे एक किसान की कहानी से समझते हैं। एक किसान का उगाया हुआ गन्ना या मक्का फैक्ट्री जाता है, वहाँ से वह एथेनॉल बनता है जो आपकी गाड़ी में डलता है। विदेशी तेल की मांग कम होती है, रुपया देश के भीतर ही रहता है और उसी पैसे से किसान अपना पालन-पोषण करता है। यह एक इकोनॉमिक साइकल है।

भाग 2: एथेनॉल क्या है और यह ‘जादू’ कैसे करता है?

एथेनॉल कोई केमिकल लैब की नई खोज नहीं है। यह गन्ने, मक्के या पराली से बनता है। अब आप पूछेंगे कि इससे फायदा क्या है?

सबसे पहला फायदा है कार्बन उत्सर्जन में कमी। पेरिस समझौते के तहत भारत ने वादा किया है कि हम 2030 तक अपनी GDP की कार्बन तीव्रता को 45% कम करेंगे। एथेनॉल एक ‘ऑक्सीजनेटेड’ ईंधन है, जिसमें 34.7% ऑक्सीजन होता है। जब पेट्रोल के साथ इसे मिलाया जाता है, तो फ्यूल बेहतर तरीके से जलता है। ऐसे प्रयासों से पिछले 12 वर्षों में लगभग 99 लाख मीट्रिक टन CO2 उत्सर्जन कम हुआ है। हमने दुनिया से वादा किया है कि हम ग्लोबल वार्मिंग को 1.5°C से नीचे रखेंगे। इथेनॉल के जलने से जो CO2 और पार्टिकुलेट उत्सर्जन होता है, वह शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले काफी कम है। मतलब- कम धुआं, कम प्रदूषण।

भाग 3: साइंस का खेल; इंजन के अंदर क्या होता है?

अब बात करते हैं उस ‘फ्रस्ट्रेशन’ की जो आप महसूस करते हैं। यहीं से असली विवाद शुरू होता है। लोग कहते हैं कि माइलेज कम हो गया है और हकीकत में वे गलत नहीं हैं। माइलेज का गिरना सच है। भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाना कोई नई बात नहीं है। UPA सरकार के समय भी E10 प्रोग्राम शुरू हुआ था, लेकिन तब इसे आज की तरह अनिवार्य नहीं किया गया था। तब पेट्रोल पंपों पर शुद्ध पेट्रोल भी आराम से मिलता था, जिससे 2011 से पहले की पुरानी गाड़ियों के मालिकों को दिक्कत नहीं होती थी।

2011 के बाद भारत में जो भी गाड़ियाँ बिकीं, वे ज़्यादातर E10 यानी 10% एथेनॉल के हिसाब से बनी थीं। दिक्कत ये है कि अब सरकार ने E20 को लगभग हर जगह लागू कर दिया है और बिना मिलावट वाला पेट्रोल मिलना लगभग बंद हो गया है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि E20 को झेलने वाली गाड़ियाँ अप्रैल 2023 के बाद यानी BS6 Phase 2 के साथ आनी शुरू हुईं। अगर आपकी गाड़ी 2011 के बाद और अप्रैल 2023 से पहले की है, तो वह E10 के लिए तो तैयार थी, लेकिन E20 के झटके सहने के लिए नहीं बनी थी। यही वजह है कि आज सबसे ज़्यादा परेशानी पुरानी गाड़ियों के मालिकों को हो रही है।

जहाँ तक माइलेज की बात है, तो दो बातें जाननी ज़रूरी हैं:

  1. ऊर्जा घनत्व (Energy Density) का सच: सैद्धांतिक रूप से, पेट्रोल की ऊर्जा क्षमता एथेनॉल से ज़्यादा होती है। E20 (80% पेट्रोल + 20% एथेनॉल) में ऊर्जा करीब 6% कम होती है। इसलिए आपकी गाड़ी को एक निश्चित दूरी तय करने के लिए थोड़ा ज़्यादा ईंधन चाहिए होगा। यह भौतिक विज्ञान का सत्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता।
  2. ऑक्टेन रेटिंग (Octane Rating): यहाँ एक फायदा भी है। एथेनॉल का ऑक्टेन नंबर 108.5 के करीब होता है, जबकि पेट्रोल का 87-93 के बीच। ऑक्टेन रेटिंग का मतलब है ‘एंटी-नॉकिंग’ क्षमता। यह इंजन के अंदर आने वाली ‘टिक-टिक’ की आवाज़ को रोकता है। Volkswagen और Skoda के TSI इंजन, Hyundai की N Line सीरीज़ या Honda के कुछ Turbocharged इंजन इस उच्च ऑक्टेन ईंधन की विशेषताओं का बेहतर उपयोग कर सकते हैं।

भाग 4: फेज़ सेपरेशन (Phase Separation) – वो ‘असली विलेन’

एथेनॉल बहुत ज़्यादा ‘हाइग्रोस्कोपिक’ होता है, यानी यह हवा से नमी को बहुत जल्दी सोख लेता है। अगर आपकी गाड़ी का पेट्रोल टैंक बहुत दिनों तक खाली या कम ईंधन के साथ खड़ा रहता है, तो एथेनॉल वातावरण से पानी सोखने लगता है। जब पानी की मात्रा एक सीमा से ज़्यादा हो जाती है, तो एथेनॉल पेट्रोल से अलग होकर टैंक के नीचे बैठ जाता है। इसे ही ‘फेज़ सेपरेशन’ कहते हैं।

इसका परिणाम ये होता है कि आपकी गाड़ी स्टार्ट नहीं होगी, क्योंकि फ्यूल पंप नीचे से पानी और एथेनॉल का एसिडिक घोल खींच लेगा। यह अम्लीय घोल आपकी फ्यूल लाइनों, इंजेक्टर्स और इंजन के वाल्वों को अंदर से सड़ा सकता है। पुरानी गाड़ियों में फिल्टर ब्लॉकेज की समस्या इसी कारण ज़्यादा आती है, क्योंकि एथेनॉल पुरानी गंदगी और नमी को घोल देता है।

क्या हमें ‘परफेक्ट’ समाधान के चक्कर में ‘बेहतर’ को छोड़ देना चाहिए? एथेनॉल एक ‘ब्रिज फ्यूल’ है। जब तक हर घर में इलेक्ट्रिक गाड़ी नहीं आ जाती और ग्रिड पूरी तरह ग्रीन नहीं हो जाता, एथेनॉल देश के लिए सबसे सस्ता और तुरंत लागू होने वाला विकल्प है।

भाग 5: ग्लोबल केस स्टडी – ब्राजील और अमेरिका

क्या हम इस प्रयोग में अकेले हैं? बिल्कुल नहीं। ब्राजील ने 1970 के तेल संकट के बाद ‘प्रोलकूल’ (Pró-Álcool) प्रोग्राम शुरू किया था। आज उनके पास E27 ईंधन है और 90% गाड़ियाँ ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ (Flex-fuel) हैं। वे 50 साल से एथेनॉल का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपनी ऑटोमोबाइल तकनीक को बदला है।

अमेरिका में मक्के से बने एथेनॉल का बड़े पैमाने पर E10 और E15 के रूप में उपयोग होता है। भारत को भी सिर्फ मिश्रण बढ़ाने के साथ-साथ अपनी गाड़ियों की मटेरियल टेक्नोलॉजी को अपडेट करने की ज़रूरत है।

भाग 6: आप अपनी गाड़ी को कैसे बचाएं?

शायद आप सोच रहे होंगे कि क्या मेरी गाड़ी कबाड़ हो जाएगी? बिल्कुल नहीं। बस आपको अपनी आदतों में थोड़ा सुधार करना होगा:

  • टैंक फुल रखें: जितना कम पेट्रोल, उतनी ज़्यादा नमी। जितना ज़्यादा ईंधन टैंक में रहेगा, हवा के लिए उतनी कम जगह होगी।
  • फ्यूल स्टेबलाइजर्स का इस्तेमाल: अगर गाड़ी हफ़्तों खड़ी रहती है, तो बाज़ार में मिलने वाले फ्यूल स्टेबलाइजर्स का उपयोग करें।
  • फिल्टर का ख्याल रखें: हर सर्विस पर फ्यूल फिल्टर बदलें।
  • रबर होसेस: अगर गाड़ी 2023 से पहले की है, तो मैकेनिक से पूछें कि क्या इसमें विटॉन (Viton) या टेफ्लॉन (Teflon) आधारित पाइप लगे हैं।

सरकार को भी पेट्रोल पंपों पर E0 या E10 का विकल्प देने पर विचार करना चाहिए, ताकि पुरानी गाड़ियों वाले लोग सुरक्षित रह सकें।

भाग 7: नीतिगत सुधार – सरकार को क्या करना चाहिए?

अंत में, हम केवल उपभोक्ताओं को ही दोषी नहीं ठहरा सकते। सरकार को अपनी नीतियों में लचीलापन लाना होगा:

  1. ईंधन का विकल्प (E0 विकल्प): पुरानी गाड़ियाँ चलाने वालों के लिए E0 पेट्रोल उपलब्ध होना चाहिए।
  2. वारंटी सुरक्षा: कंपनियों को स्पष्ट करना चाहिए कि E20 इस्तेमाल करने पर वारंटी रद्द नहीं होगी।
  3. 2G एथेनॉल पर ज़ोर: गन्ने के अलावा कचरे और पराली से बनने वाले 2G एथेनॉल को बढ़ावा देना चाहिए ताकि जल संसाधनों पर दबाव कम हो।

E20 आत्मनिर्भरता का एक ऐसा सपना है जिसे पूरा करना हमारी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ज़रूरी है। हम एक ऐसे ट्रांजिशन फेज़ में हैं जहाँ चुनौतियाँ आएंगी। लेकिन अगर हम जागरूकता के साथ अपनी गाड़ी का रखरखाव करें और सरकार से सही बुनियादी ढाँचे की मांग करें, तो यह ‘ब्रिज फ्यूल’ वाकई में देश की तकदीर बदल सकता है।

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