मैंने अभी एक-दो दिन पहले खबर देखी कि योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में बिजली की दरें नहीं बढ़ाई हैं। खबर और गहराई से देखी, तो पता चला कि ऐसा लगातार सातवें साल हो रहा है कि यूपी में बिजली की दरें नहीं बढ़ रही हैं। यहीं पर मेरे दिमाग में आया कि इससे पहले तो बिजली की दरें खूब बढ़ाई जाती थीं।
इन फैक्ट, अगर मैं डेटा बताऊं तो अखिलेश यादव की सरकार में, यानी साल 2012 से 2017 के बीच, लगातार बिजली की दरें बढ़ाई जा रही थीं। साल 2013 में ही अखिलेश सरकार ने प्रदेश में बिजली की दरें 35% बढ़ा दी थीं। रूरल एरियाज (ग्रामीण क्षेत्रों) में दरों में सीधे 45% तक का इजाफा किया गया था।
200 यूनिट कंज्यूम करने पर जो बिजली अब तक ₹3.45 पैसे प्रति यूनिट मिलती थी, उसे ₹4 प्रति यूनिट कर दिया गया था। इससे ऊपर के स्लैब में भी दरें बढ़ाई गई थीं। गांवों में तो फिक्स कॉस्ट बढ़ाकर आम लोगों की कमर ही तोड़ दी गई थी। और यह मई-जून के भीषण गर्मी वाले महीने में हुआ था, जब उत्तर प्रदेश में बिजली का उपभोग एकदम पीक पर था।
एक साल बाद, तुरंत अक्टूबर 2014 में फिर से बिजली के दाम बढ़ा दिए गए। अब तक जहाँ 150-200 यूनिट पर ₹4 प्रति यूनिट का रेट अप्लाई होता था, उसे बढ़ाकर ₹4.50 पैसे कर दिया गया। इसके अलावा फिक्स चार्जेज और बाकी रेट्स भी रिवाइज कर दिए गए। यूपी में इंडस्ट्री के लिए भी बिजली की दरें ₹7 से बढ़ाकर ₹7.50 पैसे कर दी गई थीं।
हैरानी की बात यह है कि उस समय उत्तर प्रदेश के गांव सिर्फ 9 घंटे की बिजली पा रहे थे। इतना ही नहीं, जितनी बिजली की डिमांड होती थी, अखिलेश सरकार उसे भी पूरा नहीं करती थी। जिस साल 2014 में उन्होंने रेट्स बढ़ाए थे, उसी साल वे पीक पावर डिमांड की 27% सप्लाई ही नहीं कर पा रहे थे।
कुछ ही महीने के बाद, यानी जून 2015 में फिर से बिजली के रेट्स में 12% तक की बढ़ोतरी कर दी गई। यानी अखिलेश सरकार शायद तब महीने-दर-महीने बिजली महंगी करना चाहती थी। वह भी तब, जब प्रदेश के लोगों को 24 घंटे बिजली भी नसीब नहीं होती थी।
अब आते हैं योगी सरकार पर। साल 2017 और साल 2019 में ही सिर्फ बिजली की दरें बढ़ाई गई थीं और तब से लगातार कंज्यूमर्स को प्रोटेक्ट किया जा रहा है। अब यह सातवां साल है जहाँ दरें यथावत हैं और अब बिजली की रिकॉर्ड पीक डिमांड को भी मीट किया जा रहा है।






