अखिलेश यादव, चंद्रशेखर आजाद और कांग्रेस पार्टी के कई तथाकथित दलित नेता आज उन अपराधियों के बचाव में उतर आए हैं, जिन पर SC-ST एक्ट का मुकदमा दर्ज है और यहाँ तक कि जिला बदर हैं।
सोशल मीडिया पर जिसे सबसे ज्यादा सहानुभूति दी जा रही है उसका नाम है रवि गौतम और जिन्हें विलेन बताया जा रहा है, उनका नाम है अविनाश पांडेय, जो मेरठ के SSP हैं।
ये वीडियो तो आपने भी अब तक देख लिया होगा लेकिन इसके पीछे की हकीकत क्या है वो मैं आपको बताती हूँ।
ये थप्पड़ बरसाए जाने से पहले का वीडियो है। ये वही रवि गौतम है, जिसने मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम की हत्या के बहाने से, पहले प्रदर्शन शुरू किया और फिर पुलिस वैन में फाँसी का फंदा लटकाकर कानून व्यवस्था बिगाड़ने का काम किया।
मैं यहां पर बहाना शब्द क्यों यूज कर रही हूं इसके लिए आपको थोड़ा पीछे ले चलती हूं। आज से दो महीने पहले मेरठ में बीए में पढ़ने वाली छात्रा ललिता गौतम का शव मिलता है। पुलिस तफ्तीश करती है और हत्यारा लड़की का ब्वॉयफ्रेंड अंकुश निकलता है। पुलिस अंकुश समेत सबूत मिटाने वाले उसके दो साथियों को भी गिरफ्तार कर लेती है। लड़की का परिवार इस कार्रवाई से संतुष्ट होता है और मामला यहीं पर खत्म हो जाता है।
लेकिन वैन में फाँसी का फंदा लगा रहे रवि गौतम और अमरोहा के दिग्विजय भाटी बाद में ललिता के परिवार को भड़काते हैं और पुलिस पर दबाव बनाने को कहते हैं। पुलिस पीड़िता के परिवार की शिकायत पर दोबारा संज्ञान भी लेती है लेकिन यहाँ एक और ही खेल शुरू होता है, समाज में जातिवाद का जहर घोलने का खेल।
इसके लिए रवि गौतम और दिग्विजय भाटी के कहने पर पी ड़ित परिवार और कुछ अन्य लोग सड़क पर उतर आते हैं। प्रदर्शनकारी पूरी सड़क को घेरते हैं पुलिस समझाने की कोशिश करती है लेकिन रवि गौतम जैसा शख्स आत्महत्या का ढोंग करने लगता है।
इसी ढोंग को बेनकाब करने मेरठ SSP अविनाश पांडे मैदान में उतरते हैं। कानून व्यवस्था में बाधा डालने पर कार्रवाई होती है और इसी कार्रवाई को विपक्ष अत्याचार बताकर पेश कर रहा है जबकि सच तो कुछ और ही था जो मैंने आपको बताया।
कुल मिलाकर, पीड़िता के नाम पर कुछ लोगों ने अपनी राजनीति चमकाने, कानून व्यवस्था खराब करने और समाज में अशांति फैलाने की कोशिश की। आप भी जानते हैं कि प्रदर्शन का उद्देश्य अपनी माँगें रखना होता है, न कि लोगों को भड़काकर सड़कें जाम करना और खुदकुशी करने का ढोंग कर पुलिस पर दबाव बनाना। ये सभी पैतरें किसी भी प्रदर्शन को हिंसा में तब्दील कर सकते हैं और पिछले कुछ वर्षों में हमनें ऐसा होते देखा है कभी CAA के नाम पर तो कभी किसान आंदोलन के नाम पर।





