Pakistan Gurudwara

पाकिस्तान को ‘सिख विरासत’ का रहनुमा क्यों दिखा रहा है भारत का वामपंथी मीडिया?

Summary
इतिहास बताता है कि पाकिस्तान ने कई बार धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों का इस्तेमाल अपनी विदेश नीति किया है। 

आजकल ऐसा दिखाया जा रहा है कि पाकिस्तान इन दिनों सभ्यतागत चीजों की तरफ बढ़ रहा है। हालांकि जमीन पर ऐसा कुछ है नहीं लेकिन अपने यहां का लेफ्ट लिबरल मीडिया खबरों के जरिए पाकिस्तान को बड़ा ग्लैमराइज कर रहा है कि वो अब सिख विरासतों को संजोने और उनके जीर्णोद्धार का काम कर रहा है। 

द वायर की ये खबर आप देखिए। लाहौर में 79 साल बाद खुला पातशाही छेंवी गुरुद्वारा। लाहौर-कसूर रोड पर मौजूद इस गुरुद्वारे का संबंध सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी से है। 

इस गुरुद्वारे का निर्माण 1923 में हुआ था। तब ये काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ था। यहां पर लंगर की व्यवस्था होती थी, उस वक्त यहां पर एक बड़ा सरोवर भी था और श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था भी थी।

अब पार्टिशन के बाद जो अन्य गुरुद्वारों या मंदिरों के साथ हुआ उसी दर्द से ये गुरुद्वारा भी गुजरा। बंटवारे की हिंसा में ये गुरुद्वारा बुरी तरह प्रभावित हुआ। सिख समुदाय के लोग भी पाकिस्तान से भारत आ गए और गुरुद्वारा वीरान हो गया। इसके सरोवर को मिट्टी से भर दिया गया। जमीन पर कब्जा कर लिया गया और गुरुद्वारे के भीतर एक पीर की मजार तक बना दी गई… ये सब किसने किया होगा? शायद मुझे ये सब बताने की जरूरत नहीं है, आप खुद इतने समझदार हैं ये समझने के लिए कि पाकिस्तान के मुसलमानों ने ये सब कारनामे किए।

लेकिन ये सब छुप जाएगा उस हेंडिग के पीछे कि पाकिस्तान में गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार या 79 साल बाद खुला। दरअसल, इसे पाकिस्तान की छवि सुधार कार्यों में दिखाने की कोशिश की जा रही है और ये ऐसे मौकों पर हो रही है जब इधर पंजाब में असेंबली इलेक्शन होने हैं और जब सतलुज फिल्म पर एक तरह की टशन देखने को मिल रही है कि इस फिल्म ने खालिस्तानी नैरेटिव को एकतरफा दिखाया है और सिक्के के दूसरे पहलू को छुआ तक नहीं है और इवन पाकिस्तान ने जो खालिस्तान आंदोलन को उस वक्त फ्यूल दिया उसकी भी कोई चर्चा इस फिल्म में देखने को नहीं मिलती है। 

हैरानी की बात तो ये है कि पाकिस्तान में सतुलज फिल्म के रिलीज की मांगें उठ रही हैं। फिल्म को बिना देखे ही वो इसकी जमकर तारीफ भी कर रहे हैं और अपनी सरकार से मांग कर रहे हैं कि वो सभी सिनेमाघरों में इस फिल्म को रिलीज करें। ये वही पाकिस्तानी हैं, जो धुरंधर का विरोध कर रहे थे, उसे प्रॉपगेंडा फिल्म बता रहे थे। तब पाकिस्तान में धुरंधर पर आधिकारिक तौर से बैन लगा दिया गया था क्योंकि उसमें पाकिस्तान एक्सपोज हो रहा था और इस फिल्म में चूंकि पाकिस्तान का कहीं कोई निशान नहीं है तो उसे अपने यहां रिलीज करने की मांग कर रहे हैं। 

ऐसे समय में जब पाकिस्तान में 79 साल बाद एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार कर उसे खोला गया और दूसरी ओर सतलुज जैसी फिल्म को वहां से सार्वजनिक समर्थन मिल रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सिर्फ अलग-अलग घटनाएं हैं, या फिर पाकिस्तान सिख पहचान और पंजाब से जुड़े मुद्दों को अपनी सॉफ्ट पावर और नैरेटिव बिल्डिंग के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है और इसे भारत का लेफ्ट लिबरल मीडिया ग्लैमराइज कर रहा है। 

जबकि पाकिस्तान का सच तो इससे बिलकुल अलग है। भाई अगर पाकिस्तान को इतनी चिंता होती है या सिख विरासतों को संजोने का उसका सच में मन होता तो वो गुरुद्वारों को क्यों तोड़ता? अभी हाल ही में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 125 साल पुराने एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे का ढहा दिया गया। ये खबर कोई बहुत पुरानी नहीं है पिछले महीने जून की खबर है।

अगर पाकिस्तान वास्तव में सिख विरासत के संरक्षण को लेकर गंभीर है, तो एक सवाल उसके अपने इतिहास से भी जुड़ता है। 1947 के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में मौजूद सैकड़ों छोटे-बड़े ऐतिहासिक गुरुद्वारे धीरे-धीरे लोगों की यादों से ही गायब हो गए। 

आज स्थिति ये है कि अमेरिका में रहने वाले रिसर्चर तरुणजीत सिंह बुटालिया को 1884 और 1947 से पहले पब्लिशड गुरमुखी पुस्तकों की मदद से इन भूले-बिसरे गुरुद्वारों की दोबारा खोज करनी पड़ रही है। इन पुस्तकों में पाकिस्तान में मौजूद करीब 250 ऐतिहासिक सिख स्थलों का उल्लेख मिलता है। इनमें से कई गुरुद्वारे खंडहर बन चुके हैं, कई पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया, कुछ स्कूलों या दूसरी इमारतों में बदल गए और कई पूरी तरह मिट चुके हैं। सिर्फ लाहौर जिले में दर्ज 38 ऐतिहासिक सिख स्थलों में से आज केवल 5 ही गुरुद्वारों के रूप में सक्रिय हैं, जबकि बाकी या तो जर्जर हैं, अतिक्रमण का शिकार हैं या उनका अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है। 

ऐसे में अगर आज पाकिस्तान 79 साल बाद किसी एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे को बड़े स्तर पर खोलता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में दशकों से उपेक्षित पूरी विरासत को पुनर्जीवित करने की शुरुआत है, या फिर कुछ चुनिंदा प्रतीकों के जरिए अपनी एक नई छवि गढ़ने की कोशिश।

पाकिस्तान वो देश है जहां विभाजन के बाद हिंदू और सिख आबादी लगातार घटती गई। यही वो देश है जहां दशकों तक हाजरों मंदिरों और गुरुद्वारों को ध्वस्त कार्ब दिया गया। यही वो देश है जो भारत में लगातार आतंकी हमले करवाता रहा है, खालिस्तानी आतंकियों और जिहादी संगठनों को अपने देश में सुरक्षित पनाह देता रहा है। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे जिहादी गिरोहों के नाम पूरी दुनिया में पाकिस्तान के साथ जुड़ते रहे हैं। 

अब इसी पाकिस्तान की तरफ से लगातार सिख विरासत को लेकर नई-नई पहलें देखने को मिल रही हैं। पहले करतारपुर कॉरिडोर। फिर ननकाना साहिब के विकास की बातें। अब 79 साल बाद गुरुद्वारा पटशाही छठवीं का दोबारा खुलना। क्या यह सिर्फ धार्मिक संरक्षण है? या सिख समुदाय के बीच अपनी छवि बेहतर बनाने की एक सॉफ्ट पावर रणनीति?

यहीं एक और सवाल खड़ा होता है। क्या पाकिस्तान भारत के आंतरिक मामलों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है? 

इतिहास बताता है कि पाकिस्तान ने कई बार धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों का इस्तेमाल अपनी विदेश नीति किया है। 

अब सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान में बचे हुए मुट्ठीभर हिंदू और सिख पूरी तरह सुरक्षित हैं? क्या जबरन धर्मांतरण के मामलों पर स्थिति बदल गई है? क्या उनकी बेटियों का जबरन मुसलमानों द्वारा उठाया जाना रुक गया है? क्या वहां के सभी ऐतिहासिक मंदिर और गुरुद्वारे भी उसी गंभीरता से संरक्षित किए जा रहे हैं?

और सबसे बड़ा सवाल, क्या पाकिस्तान ने आतंकवाद और कट्टरपंथ की अपनी पुरानी आदत को पूरी तरह छोड़ दिया है?

जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक किसी एक गुरुद्वारे के खुलने को पाकिस्तान की नई सोच का प्रमाण मान लेना सबसे बड़ी गलतफहमी होगी।

धार्मिक विरासत का संरक्षण निश्चित रूप से अच्छी बात है। लेकिन किसी भी देश की असली पहचान उसके स्मारकों से नहीं, बल्कि उसके वर्तमान व्यवहार और नीतियों से तय होती है।

पाकिस्तान को अगर सिख सिविलाइजेशन की जरा भी चिंता होती तो वहाँ महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा तीन-तीन बार नहीं टूटती। महाराज रणजीत सिंह जो सिख साम्राज्य के संस्थापक थे, जिनका शासन अफगानिस्तान से लेकर दिल्ली की सीमा तक फैला हुआ था। उस महान शासक की एक कांसे की प्रतिमा लाहौर किले में मौजूद है। 

इस पर अब तक तीन बार हमला हो चुका है। 2019 में जैसे ही जम्मू-कश्मीर से धारा 370 का खात्मा हुआ तो उधर पाकिस्तान में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा तोड़ दी गई। 2021 में तो महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा गायब हो गई और केवल घोड़ा शेष रहा। 

सवाल ये भी है कि पाकिस्तान के सरकारी दफ्तरों में या फिर नेताओं के ऑफिसों में भगत सिंह की कितनी तस्वीरें हैं? पाकिस्तान के मदरसों या स्कूलों के सिलेबस से भगत सिंह क्यों गायब हैं? अगर आप सिख पहचान को ओन करना चाहते हैं तो ये उस पहचान के एक बड़े नायक हैं जो पाकिस्तान में गायब हैं और केवल ये नहीं ऐसे कई आजादी के नायक हैं जिनका जिक्र तक पाकिस्तान में नहीं होता है लेकिन वहां पर जिहादियों की तस्वीरों की भरमार जरूर है। भाई आपने कितनी बार भगत सिंह की जन्मतिथि या पुण्यतिथि को सेलिब्रेट किया है। कभी नहीं तो फिर ये सेलेक्टिव ओनरशिप क्यों है? ये समझना हम सबके लिए बहुत जरूरी है ताकि हम पाकिस्तान और अपने यहां वामपंथी मीडिया के झांसे में ना फंसें। 

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