1885 में वैश्विक इतिहास में एक ऐसा इन्वेंशन हुआ, जिसने आने वाले समय की तस्वीर बदल दी। इस खोज का नाम था Internal Combustion Engine
यानी (ICE) – ये इंजन गाड़ियों में लगाया जाने लगा और दुनिया को मिली कार!
इस खोज के लगभग 3 दशक बाद एक और खोज हुई! अमेरिका में फोर्ड मोटर कम्पनी के मालिक हेनरी फोर्ड ने गाड़ियों का प्रोडक्शन assembly line पर शुरू कर दिया।
अब तक अलग-अलग पुर्जा जोड़ कर बनाई जाने वाली गाड़ियों में लगातार एक लाइन पर पुर्जे जुड़ने लगे। इसके चलते एक कार को बनाने में लगने वाला समय 90% कम हो गया। पहले जहाँ एक कार 12 घंटे में तैयार हुआ करती थी.. अब उसमें लगने वाला समय मात्र 1 घंटा 30 मिनट बचा।
यही तकनीक आज भी पूरी दुनिया में ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में इस्तेमाल होती है। हेनरी फोर्ड के इस आविष्कार के लगभग 100 सालों बाद दुनिया में गाड़ियों के मामले में एक और क्रान्ति आई। ये क्रांति थी EV यानी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की।
जहाँ पहली क्रान्ति का फायदा उठाया अमेरिकी और यूरोपियन कम्पनियों ने तो वहीं इस EV क्रान्ति का फायदा चीन ने उठाया। चीन ने इलेक्ट्रिक वेहिकल के रिसर्च और सब्सिडी में 2009 से लेकर 2023 तक 230 बिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश किया।
इसी का परिणाम है कि चीन की BYD जैसी कम्पनियाँ दुनिया का इलेक्ट्रिक व्हीकल मार्केट पर राज कर रही हैं। लेकिन इस राज करने में का एक खतरा भी है। चीन इलेक्ट्रिक वेहिकल्स का ओवर प्रोडक्शन कर रहा है।
ये प्रोड्कशन चीन अपने डोमेस्टिक मार्केट में नहीं खपा पा रहा तो उसकी कम्पनियाँ ग्लोबल बाजारों का दरवाजा खटखटा रही हैं। कम कीमत में ये कम्पनियाँ दुनिया के अलग-अलग बाजारों में इलेक्ट्रिक वेहिकल्स डंप कर रही हैं।
एक के बाद एक मार्केट चीन की कम्पनियों के सामने सरेंडर करते जा रहा हैं। इस मामले में केवल भारत ही ऐसा मार्केट है, जहाँ चीन की दाल नहीं गल रही।
बाक़ी जगहों का क्या हाल है और भारत ने चीन को कैसे रोका, ये मैं बताउंगी कुछ ही देर में।
पहले समझिए कि चीन ने कितना मार्केट कैप्चर किया हुआ है। हाल ही में BBC की एक रिपोर्ट ने बताया है कि चीन की इलेक्ट्रिक वेहिकल मेकर BYD की सेल्स UK में 880% बढ़ गई हैं।
एक रिपोर्ट कहती है कि 2023 में यूरोप में बिकने वाले लगभग 19% इलेक्ट्रिक वेहिकल चीन में बने थे। 2024 तक ये नम्बर 25% तक पहुँच गया। इसके अलावा चीन ने 4 लाख से ज्यादा इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ 2023 में को बेचीं थी। इनमें बड़ा नम्बर इलेक्ट्रिक वेहिकल्स का है।
यूरोप की कम्पनियों के इससे कान खड़े हो गए! ऐसे में चाइना की EV पर अब मोटा टैरिफ लगाया गया है। यूरोप से भी ज्यादा खराब हाल है लैटिन अमेरिका का। BYD ने हाल ही में ब्राजील का 70% इलेक्ट्रिक गाड़ियों का मार्केट कब्जा रखा है।
इसी तरह मेक्सिको में भी चीन के बनाए वेहिकल्स ने मार्केट डोमिनेट की हुई है। 2024 में मेक्सिको में बिकने वाली लगभग 20% गाड़ियाँ चाइना में बनी हुईं थी। एशियन देशों में भी चाइना की ही गाड़ियाँ लगातार बिक रही हैं।
थाईलैंड में 2025 में बिकने वाली 70% इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ चीनी कम्पनियों की थी। यानी चाहे यूरोप हो या अमेरिका या फिर एशिया। हर जगह चीन की कम्पनियाँ कब्जा बनाए हुए हैं। लेकिन उनके लिए भारत का किला नहीं फतह हो रहा।
और भारत का किला इसलिए नहीं फतह हो रहा क्योंकि मोदी सरकार चीन की कम्पनियों को यहाँ नहीं घुसने दे रही। भारत में केवल दो चीनी कम्पनियाँ ही अब तक एंट्री कर पाई हैं। एक का नाम है MG और दूसरी का नाम BYD।
वैसे भी MG मोटर को मोदी सरकार ने भारतीय ही बना दिया। MG ने 2017 में भारतीय बाजार में कदम रखा था और 2019 से गाड़ियाँ बेचना शुरू की। लेकिन 2020 के गलवान झड़प के बाद भारत ने इस चीनी कम्पनी के कान उमेठ दिए।
मार्च 2024 में इस कम्पनी में भारतीय निवेशकों ने 51% यानी मेजोरिटी स्टेक खरीद लिया। इसमें भी 35% स्टेक JSW यानी जिंदल ग्रुप का है। तो ये कम्पनी हो गई देसी। और ये सब ऐसे ही नहीं हुआ, बल्कि इसके लिए थोड़ा सा MG की हैंड ट्विस्टिंग करनी पड़ी। कई बार रिपोर्ट्स में आया कि MG को चीनी पैसा भारत में लगाने की मंजूरी ही नहीं मिली।
MG अब JSW के साथ मिलकर भारत में ही गाड़ियाँ बनाती है। इसी तरह दूसरी कम्पनी BYD को भी भारत में खुला बाजार देने से भारत ने मना कर दिया। BYD 2022 में भारत के पैसेंजर वेहिकल मार्केट में घुसी थी।
लेकिन 2022 से अब तक वह कुल मिलाकर लगभग 10 हजार वाहन ही इतने दिनों में बेच पाई है।
MG भारत में 2% मार्केट शेयर भी कैप्चर नहीं कर पाई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मोदी सरकार चीनी कम्पनियों का दखल अपने बाजार में नहीं चाहती।
अप्रैल 2025 में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने साफ़ कह दिया था कि हम BYD को अपने मार्केट में एक्सेस नहीं करने देंगे। उन्होंने ये भी कहा था कि किसे भारत के बाजार में इन्वेस्ट करने दिया जाएगा, ये हम देख के अलाऊ करेंगे।
भारत ने BYD का जो इन्वेस्टमेंट प्रोपोजल ठुकराया था, वो लगभग ₹8000 करोड़ का था। भारत ने इससे पहले भी चीन की कम्पनियों को अपने यहाँ बाजार पर कब्जा करने और अपना माल डंप करने से रोका है।
भारत ने 2022 में ग्रेट वॉल मोटर्स के भी निवेश प्रस्ताव को इनकार किया था। असल में मोदी सरकार के इस पुश के चलते भारतीय कम्पनियाँ इलेक्ट्रिक वेहिकल बनाने में आत्मनिर्भर हुई हैं।




