कर्नाटक के धर्मस्थल मामले में SIT जांच तेज, बड़े खुलासों की उम्मीद, हिंदू धर्मस्थल का है इसलिए लिबरल हैं चुप

Summary
कर्नाटक के धर्मस्थल मामले में SIT जांच तेज हो गई है। धर्मस्थल केस से जुड़े तथ्यों और संभावित खुलासों पर राज्यभर में चर्चा।

प्रोपेगेंडा का मकसद होता है किसी स्थापित सच को झूठ साबित करना और किसी झूठ को स्थापित सच बनाने के लिए कहानियाँ गढ़ना। ऐसी ही एक कहानी बहुत दिनों से कर्नाटक में हिंदुओं के ख़िलाफ़ गढ़ने की तैयारी चल रही थी, जो आखिरकार धड़ाम हो गई।

ये कहानी चालू होती है कर्नाटक की एक अदालत से

कर्नाटक की एक अदालत में एक आदमी पेश होता है… उसने अपने चेहरे से लेकर पैर तक ढक रखे हैं, जज-वकील और पेशकार-पुलिस वाले इस सेटअप में वह एक हिन्दू धार्मिक स्थल के बारे में भयावह दावा करता है…

खुद को सफाई कर्मचारी बताने वाला यह शख्स कहता है कि वह दक्षिण कन्नड़ा जिले में मदिरों वाले एक कस्बे में काम करता था। इसके बाद वह सबसे सनसनीखेज दावा करता है, वह कहता है कि धर्मस्थल में 1995 से 2014 के बीच उसने सैकड़ों औरतों और बच्चियों के शव दफनाए हैं।

कोर्ट में खड़ा यह शख्स यह भी दावा करता है कि यह महिलाएँ शारीरिक शोषण के बाद दफनाई गईं थी। खुद का नाम-पहचान छुपाने वाला यह अधेड़ आदमी कहता है कि 17 जगहों पर यह मृत शरीर दफन हैं। उसके इन दावों के बाद कर्नाटक में हलचल मच जाती है।

राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार मंदिर-धर्मस्थल और ऐसे ही हिन्दू आस्था से जुड़े शब्द सुनते ही एक्स्ट्रा एक्टिव हो जाती है। आनन-फानन में एक SIT गठित कर दी जाती है। SIT के पल्ले यह जिम्मेदारी होती है कि वह ये कथित गड़े मुर्दे उखाड़े और इस सीक्रेट शख्स की बातों को सही साबित करे।

न्यूजपेपर-मीडिया चैनल-वेबसाईट इस खबर पर टूट पड़ते हैं… उनकी हेडलाइन, फ्रंट पेज और कवरेज धर्मस्थल-धर्मस्थल-धर्मस्थल चिल्लाती हैं… इस पूरे मामले को ऐसे पेंट किया जाता है कि जैसे कभी चर्च और पादरियों से जुड़ी यौन शोषण की कहानियाँ चला करती थीं।

SIT इसके बाद धर्मस्थल पहुँचती है, खुदाई चालू होती है। कहीं जमीन से 16 फीट तक खुदाई होती है… लेकिन नतीजा सिफ़र। सिवा केचुओं के यहाँ कुछ नहीं मिलता। सफाई कर्मचारी के बताए 17 जगहों पर ना कोई हड्डी मिली, ना शरीर मिला… ना कंकाल।

अपनी बात में फँसता देख यह सफाई कर्मचारी कहीं एक जगह इशारा करता तो कहीं दूसरी जगह हड्डियाँ दिखाने की बात कहता। हफ़्तों तक चली इस खुदाई में ना कहीं कोई कंकाल मिला और ना ही वो पीड़ित सामने आए जिनके घर के लोग यहाँ कथित तौर पर दफ़न हुए।

इस तरह से नकाबपोश के सारे दावे मुँह के बल गिर गए। यहाँ मिलीं भी तो कुछ हड्डियाँ जो एक आदमी की थीं दूसरी जगह बिखरी हुई हड्डियाँ मिली… कहीं साड़ी मिली। लेकिन वैसा कुछ भी नहीं मिला जैसा सनसनीखेज दावा किया गया था।

अब कहानी पलट चुकी है, धर्मस्थल पर हल्ला मचाने वाले शांत हो चुके हैं। धर्मस्थल नाम सुन कर दौड़कर SIT बनाने वाली कर्नाटक की कॉंग्रेस सरकार अब कार्रवाई-एक्शन और राजनीतिकरण की बातें कह रही है।

अब उठते हैं कुछ सवाल — धर्मस्थल को बदनाम क्यों किया गया? जब सबसे पहले उस सफाई कर्मचारी को शव दफनाने के लिए कहा था तो उस वक़्त उसकी मानवता क्यों नहीं जगी?

क्यों 17 साल के बाद लगा कि अब ये बात मुख्यधारा में कहनी चाहिए? जमीन पर हड्डियां क्यों बिखरी हुई थी? क्या कोई प्री-प्लैन योजना बनाई गयी थी? क्या हिन्दू धर्मस्थल को भी उन चर्चों के बराबर खड़ा करने की कोशिश की गई जहाँ बच्चों और नन के रेप जैसी बातें आम हो चुकी थीं।

क्यों कॉन्ग्रेस सरकार ने इन हवा हवाई दावों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है… क्यों उस सफाई कर्मचारी पर अब तक कोई एक्शन नहीं लिया गया है… उन वामपंथियों के पास अब क्या तर्क है…

क्योंकि यही आरोप किसी मजार, मस्जिद या चर्च पर उठाया जाता तो सो कॉल्ड सेक्युलर पत्रकार और एक्टिविस्ट अभी तक झंडा लेकर निकल जाते लेकिन ये मामला है हिन्दू धर्मस्थल का, इसलिए फेवीक्विक की बिक्री कर्नाटक में तेजी से बढ़ गई है।

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