100 साल पुराने नियम से ग़ैर-हिंदू का हरिद्वार-ऋषिकेश में आना होगा बैन?

Summary
अर्धकुंभ 2027 से पहले हरिद्वार में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर प्रतिबंध की मांग। साल 1916 के नियम को बहाल करने की हो रही है बात।

हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थों में से एक हरिद्वार में 2027 में अर्धकुंभ मेला आयोजित होने वाला है। यह धार्मिक महापर्व जनवरी से अप्रैल तक चलेगा और मेला क्षेत्र करीब 120 वर्ग किलोमीटर में फैला होगा, जिसमें 105 घाट शामिल हैं। इसी पवित्र क्षेत्र की रक्षा के लिए अब श्री गंगा सभा ने बड़ा कदम उठाया है – उन्होंने मांग की है कि कुंभ मेला क्षेत्र को गैर-हिंदुओं के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया जाए। गंगा सभा, जो हरिद्वार की प्रसिद्ध गंगा आरती और इन 105 घाटों की देखभाल करती है, चाहती है कि मुस्लिम या ईसाई जैसे गैर-हिंदू इस क्षेत्र में न आएं, ताकि तीर्थ की पवित्रता अक्षुण्ण रहे।

यह मांग कोई नई या अतिवादी नहीं है। उत्तराखंड की धामी सरकार इसे गंभीरता से विचार कर रही है और जल्द ही घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर सख्ती लागू कर सकती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने साफ कहा है कि हरिद्वार-ऋषिकेश को ‘सनातन तीर्थ नगरी’ बनाने पर विचार चल रहा है, और कोई फैसला संवाद व कानूनी दायरे में लिया जाएगा। लेकिन जैसे ही हिंदू समाज ने अपनी धार्मिक पवित्रता की रक्षा के लिए आवाज उठाई, वामपंथी-लिबरल गिरोह का रोना-धोना शुरू हो गया। ये सेकुलरिज्म के ठेकेदार चिल्ला रहे हैं कि यह ‘असंवैधानिक’ है, लेकिन इन्हें इतिहास की बुनियादी जानकारी तक नहीं है।

दरअसल, यह नियम दशकों पुराने हैं। 1916 में भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय ने ब्रिटिश सरकार के साथ एक ऐतिहासिक समझौता किया था। पंडित मदन मोहन मालवीय   गंगा सभा के पहले अध्यक्ष थे.. इस समझौते का मुख्य उद्देश्य गंगा की अविरल धारा और हरिद्वार की आध्यात्मिक पवित्रता को संरक्षित करना था। इसमें स्पष्ट प्रावधान थे: गैर-हिंदुओं को घाटों में प्रवेश वर्जित, हरिद्वार-ऋषिकेश में स्थायी निवास की अनुमति नहीं, केवल काम के लिए दिन में आ सकते हैं और काम खत्म होते ही वापस जाना होगा – रात रुकना तक मना। ये नियम हर-की-पौड़ी सहित नगर पालिका के बायलॉज में आज भी दर्ज हैं। यानी यह कोई नया कानून नहीं, बल्कि पुराने प्रावधानों को बहाल करने की बात है।

आज हरिद्वार की हकीकत यह है कि अनियंत्रित इस्लामी बसावट और जनसांख्यिकीय बदलाव से पवित्र नगरी की शुद्धता खतरे में है। धामी सरकार अब इन्हीं ऐतिहासिक समझौतों को लागू करने पर विचार कर रही है, तो लिबरल गिरोह क्यों बौखलाया हुआ है? क्योंकि सच तो यह है कि हिंदू अपनी आस्था की रक्षा मांग रहा है – और यह मांग पूरी तरह जायज, कानूनी और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित भी है।  

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