Ram hindu

इक्ष्वाकु वंश में इतने राजा थे, फिर सिर्फ राम ही भगवान क्यों बने?

Summary
इक्ष्वाकु वंश के अनेक महान राजाओं के बीच आखिर क्यों सिर्फ श्रीराम को भगवान का दर्जा मिला? यह विश्लेषण समृद्धि, धर्म और Fighting Spirit के गहरे संबंध को समझाता है।

कुछ महीने पहले पाकिस्तान के Army Chief ने एक बयान दिया था कि भारत Highway पर दौड़ती हुई Ferrari है, और पाकिस्तान एक Dumper Truck है। इसलिए अगर दोनों टकराएँगे, तो नुकसान भारत को ही होगा।

इस बयान का मज़ाक उड़ाया गया, लेकिन असल में यह हमारे लिए एक चेतावनी थी। इतिहास में जब-जब कोई सभ्य और समृद्ध समाज खड़ा हुआ है, तब-तब उसे असुर और राक्षस प्रवृत्ति के लोगों से खतरा रहा है। असुरों को हमेशा लगता है कि समृद्ध समाजों की Fighting Spirit कमज़ोर हो जाती है। इसलिए किसी भी समृद्ध साम्राज्य के लिए यह ज़रूरी है कि वह आक्रांताओं के इस भ्रम को तोड़े।

यह एक तरह से हमारा पितृ ऋण भी है। हमारे पूर्वजों का हम पर यह ऋण है कि हम धर्म की मज़बूती और उसकी रक्षा के लिए युद्ध करने को भी तैयार रहें।

कलयुग हो, द्वापर युग हो, या फिर त्रेतायुग, हर युग में इतिहास ने हमें यही सिखाया है। जैसे आप इक्ष्वाकु वंश का उदाहरण देखिए। जब भी हम इक्ष्वाकु वंश का नाम लेते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले राजा रामचंद्र की छवि आती है। जबकि इसी वंश में मान्धाता, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, राजा भगीरथ और राजा दशरथ जैसे बड़े राजाओं का जन्म हुआ। श्रीराम के बाद भी पुंडरीक, ध्रुवसंधि, विश्वबाहु और तक्षक जैसे अनेक राजाओं ने इस वंश में जन्म लिया।

लेकिन ऐसा क्या कारण है कि इतने बड़े-बड़े राजाओं के बीच सिर्फ श्रीराम को ही भगवान का दर्जा दिया गया?

इक्ष्वाकु वंश के सभी राजाओं ने भारतवर्ष को समृद्ध, वैभवशाली और विकसित बनाया। Civil Engineering हो, Astronomy हो, Medicine हो, Education हो या Art, उन्होंने अपनी प्रजा के सर्वांगीण विकास पर ध्यान दिया। कोई माँ गंगा को धरती पर ले आया, किसी ने अपना पूरा राजपाट लुट जाने पर शून्य से सृजन किया, तो किसी ने पूरी धरती पर अपना शासन स्थापित किया।

परंतु समय की सुई राम पर क्यों अटक गई?

ऐसा इसलिए क्योंकि राम ने अयोध्या को सिर्फ समृद्धि ही नहीं दी, बल्कि उस Civilization को बचाया भी और उसे भयमुक्त भी किया। असुरों के मन में एक भ्रम हुआ करता था कि ये लोग तो समृद्धि और विकास करने वाले लोग हैं, इनके अंदर Fighting Spirit नहीं है। राम ने असुरों के इस भ्रम को तोड़ा।

दरअसल, हमारे यहाँ कभी राक्षसों या असुरों से किसी को समस्या नहीं रही। सुर और असुर, दोनों ही प्रजातियाँ यहाँ साथ-साथ विकसित होती रही हैं। यदि सुरों के पास अयोध्या थी, तो असुरों के पास भी लंका थी। अगर हमारे यहाँ राक्षसों से जन्मजात बैर होता, तो राजा बलि और विभीषण सात चिरंजीवियों में शामिल नहीं होते।

हमारे पूर्वजों को असुरों और राक्षसों की वृति से कोई समस्या नहीं थी। समस्या थी तो राक्षसों की प्रवृत्ति से। जब राक्षसों ने सामान्य जनों को नुकसान पहुँचाया, तब शांति की स्थापना के लिए जहाँ आवश्यक हुआ, वहाँ राम ने भी युद्ध किया।

विकास एक सतत प्रक्रिया है। वह प्रक्रिया चलती रहेगी। लेकिन जो धर्म और शांति की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध होता है, इतिहास अंततः उसी को याद रखता है। और यह वर्तमान तथा भविष्य, दोनों का दायित्व है कि वे उस इतिहास से सीखें।

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