आम तौर पर जब भी मुस्लिमों के सामाजिक मुद्दों या फिर इस्लामी कट्टरपंथ को लेकर कोई फ़िल्म भारत में बनती है तो लिबरल उसे प्रोपेगेंडा कह कर नकार देते हैं। हाल ही में शाह बानो के विख्यात मामले पर आई फ़िल्म हक़ के साथ भी ऐसा ही हुआ। लेकिन उसे मिली अंतरराष्ट्रीय ख्याति ने लिबरलों को करारा जवाब दे दिया है।

ये रैंकिंग्स देख रहे हैं आप, यामी गौतम और इमरान हाशमी की हक मूवी पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश और यहाँ तक की नाइजीरिया-कतर-सऊदी अरब और बहरीन-मालदीव जैसे मुस्लिम कंट्रीज में नेटफ़्लिक्स पर टॉप पर चल रही है। बांग्लादेश-पाकिस्तान और मालदीव में तो ये नंबर वन पर है।

लेकिन 1980 के दशक के शाहबानो केस पर बनी मूवी हक से भला दुनिया भर की मुसलमान ऑडियंस कैसे कनेक्ट कर रही है। दरअसल, ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही देश अलग हों लेकिन सब कहीं मुसलमान औरतों का दर्द एक जैसा है। जैसे इंडिया में शाह बानो के पति ने दूसरा निकाह करके उसे अपने घर से निकाल दिया और कोई खर्चा नहीं दिया, ऐसा बांग्लादेश-पाकिस्तान में भी है।
और ध्यान देने वाली बात है कि जिस भी देश में ये मूवी ट्रेंड कर रही है, हर उस देश में मुसलमान मर्दों को चार निकाह करने की आजादी है। चाहे पाकिस्तान हो बांग्लादेश या फिर सऊदी-बहरीन। नाइजीरिया में तो इस मूवी ने तहलका मचाया हुआ है। इन देशों की महिलाएँ यामी गौतम यानी शाह बाणों के कैरेक्टर से अपनी पीड़ा को कनेक्ट कर पा रही हैं। और इसने मुसलमानों की उस सामाजिक बुराई को उजागर किया है जिस पर हमारे लिबरल बात नहीं करते।
और मजे की बात देखिए जरा जहाँ इस मूवी को दुनिया भर में व्यूअरशिप मिल रही है और तारीफ़ हो रही है तो हमारे ही देश में इसके ख़िलाफ़ ओपिनियन लिखे जा रहे थे और इसे प्रोपेगेंडा मूवी बताया जा रहा था। लेकिन सच छुपेगा कहाँ?
नहीं इंडिया में! तो पाकिस्तान में… कहीं ना कहीं से तो निकलेगा।




