यूएस ने भले ही बोला हो कि वह इंडियन रिफाइनरीज को अब रशियन क्रूड परचेज करने की परमिशन दे रहा है, लेकिन आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि मनुष्य वही विश्वास करना चाहता है जो वह पसंद करता है? यानी सच वह नहीं है जो सामने है, सच वह है जो आप देखना चाहते हैं।
बचपन में हम सबने वह कहावत सुनी है कि ‘कौआ कान ले गया’। एक समझदार इंसान सबसे पहले अपना कान चेक करता है, लेकिन कुछ लोग बिना सोचे-समझे कौवे के पीछे भागने लगते हैं। आजकल भारतीय राजनीति में मुख्य विपक्षी दल, यानी कांग्रेस की स्थिति कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है। पूरा मुद्दा ईरान-इजरायल तनाव, रूस के तेल और अमेरिका की सो-कॉल्ड ‘परमिशन’ के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
तो सबसे पहली बात, यूएस ने भले ही यह कहा हो कि वह इंडियन रिफाइनरीज को अब रशियन क्रूड परचेज करने की परमिशन दे रहा है, लेकिन असली बात तो यह है कि हमने कभी रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद ही नहीं किया था। फरवरी 2022 के बाद से लगातार हमारे क्रूड परचेज में रूस का एक सिग्निफिकेंट हिस्सा रहा है।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट कहती है कि मई 2022 के बाद से भारत का कम से कम 20% कच्चा तेल हर महीने रूस से ही आया है। जुलाई 2024 में तो यह आंकड़ा लगभग 45% के स्तर पर पहुंच गया था। यानी हम विदेशों से जितना भी कच्चा तेल आयात करते हैं, उसका करीब आधा हिस्सा अकेले रूस से आ रहा था।
अमेरिका का तो यह भी दावा था कि जनवरी 2026 में हमने अपनी परचेज बंद कर दी है, लेकिन यही ग्राफ दिखाता है कि हमने 20% से ज्यादा तेल तब भी रूस से खरीदा था और फरवरी में तो यह नंबर और ज्यादा बढ़ गया। रिपोर्ट्स बताती हैं कि फरवरी 2026 में यह आंकड़ा 30% के आसपास पहुंच गया और इस महीने भी रूस ही भारत का टॉप सप्लायर बना रहा।
ऐसे में न तो यह साबित होता है कि हमने कभी रशियन क्रूड खरीदना बंद किया था और न ही यह कि हम यूएस के कहने पर इसे वापस खरीद रहे हैं। इसलिए कांग्रेस को थोड़ा डेटा भी कभी-कभार देखना चाहिए और यह समझना चाहिए कि आउटरेज करने के लिए भी बातों में कुछ सब्सटेंस रखना बेहद जरूरी होता है।
अब आते हैं दूसरे पॉइंट पर, यानी अमेरिका का वह नया नोटिफिकेशन जिसमें कहा गया है कि ईरान क्राइसिस के बाद भारत, रूस से वह कच्चा तेल खरीद सकता है जो 5 मार्च से पहले रशियन पोर्ट्स से निकल चुका है। अब यहाँ पर भी अमेरिका जबरन दादा बनने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका इसे परमिट करे या न करे, भारत ने तो ईरान क्राइसिस शुरू होते ही रूस का कच्चा तेल खरीदना शुरू कर दिया था। इनफैक्ट, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के बंद होते ही रूस ने 9.5 मिलियन बैरल कच्चा तेल भारत को डायवर्ट करने का सिग्नल दे दिया था। यह बात 4 मार्च को ही पूरी तरह साफ हो गई थी; अमेरिका तो इस पूरे गणित में काफी बाद में कूदा है, इसलिए इसके लिए दूसरा कोई जिम्मेदार नहीं है।
इस तेल को लाने वाले टैंकर्स पहले से ही समुद्र में मौजूद थे। और हाँ, हमने यह तेल खरीदने के लिए यूएस की परमिशन का इंतजार थोड़े ही किया, हमने तो इसे पहले ही खरीदना शुरू कर दिया था। 5 मार्च को ही लगभग 1.7 मिलियन बैरल कच्चे तेल से लदे रशियन टैंकर्स या तो हमारे पोर्ट्स पर खड़े थे या फिर रास्ते में थे।
रिपोर्ट्स ने बताया है कि इंडियन रिफाइनरीज ने अब तक 20 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चा रशियन तेल खरीद भी लिया है और ट्रेडर्स से बातचीत चल रही है कि इसकी सप्लाई मार्च-अप्रैल के महीनों में और ज्यादा बढ़ाई जाए। इनफैक्ट, भारत यह कच्चा रशियन तेल अब प्रीमियम प्राइसेज पर खरीद रहा है।
भारत इंटरनेशनल प्राइसेज से 5 डॉलर ऊपर का रेट देकर रूस का क्रूड ऑयल खरीद रहा है। यह सारी बात सरकार के किसी प्रवक्ता ने नहीं, बल्कि इंटरनेशनल मीडिया एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में बकायदा दिखाई है।
ऐसे में न तो यह दावा कहीं फिट बैठता है कि हमने अमेरिका के कहने से रूस से तेल खरीदना बंद किया था और न ही यह कि अब हम उनकी ‘परमिशन’ मिलने के बाद कच्चा तेल खरीद रहे हैं।
भारत ने हमेशा इस रुख को एकदम क्लियर रखा है कि वह किसी भी देश से कच्चा तेल और गैस केवल और केवल अपने नेशनल इंटरेस्ट्स को ध्यान में रखते हुए ही खरीदेगा। इसमें किसी के कुछ कहने, परमिट करने या न करने का तो सवाल ही नहीं उठता। हमारी यही लाइन तब भी पूरी तरह अडिग रही थी जब अमेरिका हमारे एक्सपोर्ट्स पर 50% का टैरिफ लगा रहा था।
अब सवाल यह आता है कि अमेरिका इस बात का ऐलान इतना चिल्ला-चिल्लाकर क्यों कर रहा है? दरअसल, ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन का क्रेडिट लेने का यह पुराना चस्का रहा है; चाहे ऑपरेशन सिंदूर में सीजफायर पर चिल्लाना हो या फिर अब यह रूसी तेल खरीद का मामला हो। असल में अमेरिका इसके जरिए अपनी ‘MAGA’ समर्थक पब्लिक को यह दिखाता है कि उनका प्रशासन कितना मजबूत है।
इसके बाद बात आती है कांग्रेस की। उन्हें यह समझना होगा कि पॉलिटिकल नैरेटिव्स हमेशा डेटा और फैक्ट्स से वैलिडेट होते हैं, न कि सिर्फ कैची ट्विटर पोस्ट्स से। आज उन्होंने ‘Compromised’ टर्म को पकड़ा है, कल कास्ट सेंसस, परसों ‘चौकीदार चोर है’ का स्लोगन और उससे पहले राफेल कॉन्ट्रोवर्सी; लेकिन ये सारे नैरेटिव बहुत शॉर्ट-टर्म एक्सपायरी डेट वाले साबित होते हैं। देश की जनता को मोदी सरकार पर पूरा भरोसा है, जिसने यूक्रेन-रूस कॉन्फ्लिक्ट के दौरान भी देश में तेल की कोई कमी नहीं होने दी।
अब इस ईरान क्राइसिस में भी देश की सप्लाई पूरी तरह एंश्योर्ड रहेगी। इसलिए बेहतर यही होगा कि विपक्ष बेसलेस आउटरेज पर फोकस करने के बजाय ‘Constructive Criticism’ पर ध्यान दे। आखिरकार, पॉलिटिक्स में इंटेलेक्चुअल डेप्थ से ही लॉन्ग-टर्म क्रेडिबिलिटी बनती है।





