डिलिमिटेशन (परिसीमन) के बारे में बात करने से पहले एक कहानी सुनिए। बचपन में मैंने अपनी स्कूल की किताब में आचार्य विनोबा भावे की जीवनी पढ़ी थी। उसमें आचार्य भावे कहते हैं कि संसाधनों को ऐसे बांटा जाना चाहिए कि उससे समाज संतुलित रहे। इसके लिए उन्होंने एक सटीक उदाहरण भी दिया था।
आचार्य विनोबा भावे कहते हैं कि अगर एक घर में 4 रोटियां हैं और खाने वाले दो लोग हैं, तो सामान्य गणित कहता है कि दोनों में 2-2 रोटियां बांटी जानी चाहिए। लेकिन अगर इन दोनों में से एक बच्चा 2 साल का है और दूसरा युवा 20 साल का, तो इस सामान्य गणित के फॉर्मूले से एक भूखा मरेगा जबकि दूसरा अतिसार (Overeating) का शिकार हो जाएगा।
कुछ ऐसी ही कहानी आज के समय में देश की संसद में चल रही है। देश की संसद में इस वक्त ‘Women Reservation Bill’ (महिला आरक्षण विधेयक) और उससे भी ज्यादा नए डिलिमिटेशन (परिसीमन) पर बहस छिड़ी हुई है। Central Government (केंद्र सरकार) लोकसभा की सीटें बढ़ाने के पक्ष में है, जबकि DMK जैसी पार्टियां इस पर काली पट्टी बांधकर और काले कपड़े पहनकर विरोध जता रही हैं। बुनियादी तौर पर उनका कहना है कि नए परिसीमन से दक्षिण भारत के राज्यों (Southern States) के साथ बड़ा अन्याय हो जाएगा।
आखिर कितनी सीटें बढ़ रही हैं, किसका शेयर घट रहा है, नुकसान दक्षिण के राज्यों का है या उत्तर के राज्यों का? और जो North India (उत्तर भारत) इस पूरी कहानी में विलेन की तरह पेश किया जा रहा है, असल में विनोबा भावे के सिद्धांत के अनुसार वह खुद कैसे भूखा मर रहा है, आगे इस पर एक-एक करके विस्तार से बात करेंगे। सबसे पहले समझते हैं कि असल में होने क्या वाला है।
लोकसभा में स्पष्ट किया जा चुका है कि नए परिसीमन में न तो Census (जनगणना) को उस तरह आधार बनाया जाएगा और न ही कोई दूसरा विवादित फैक्टर लिया जाएगा। सीधे तौर पर कहा गया है कि हर राज्य की लोकसभा सीटें लगभग 50% बढ़ने जा रही हैं। अभी लोकसभा में सीटों की संख्या 543 है और परिसीमन के बाद यह नया नंबर 816 हो जाएगा।
यानी बुनियादी तौर पर संसद में राज्यों का वही Proportion (अनुपात) मेंटेन किया जाएगा जो आज मौजूद है। इसके तहत अभी दक्षिण के राज्यों की लोकसभा में 23.76% सीटें हैं, जो इस नए फॉर्मूले के बाद 23.87% हो जाएंगी। सीटों की संख्या के लिहाज से जो सीटें अभी 129 हैं, परिसीमन के बाद वे बढ़कर 195 हो जाएंगी। किस राज्य की कितनी सीटें होंगी, इसे भी पूरी तरह साफ किया गया है।
जैसे तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59, कर्नाटक की 28 से बढ़कर 42, आंध्र प्रदेश की 25 से बढ़कर 38 और केरल की सीटें 20 से बढ़कर 30 हो जाएंगी। इसका मतलब है कि सीटों का नंबर जरूर बदलेगा, लेकिन उनका आपस में अनुपात जस का तस रहेगा। दक्षिण की ही तरह उत्तर भारत के राज्यों की सीटें भी इसी अनुपात में बढ़ेंगी।
इसके तहत यूपी की सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी, जबकि बिहार की सीटें भी इसी तरह बढ़ेंगी और कमोबेश यही फॉर्मूला सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होगा। यानी जितना फायदा उत्तर भारत को हो रहा है, वैसा ही हाल दक्षिण भारत का भी है। यह तो हो गई नंबर क्रंचिंग (आंकड़ों का गणित)। अब आते हैं उस सवाल पर कि क्या वाकई किसी का नुकसान हो रहा है, और असल में वह नुकसान किसका हो रहा है?
अब तक हर बार यही नैरेटिव चलाया जाता रहा है कि दक्षिण भारत से उसके लोगों का हक छीना जा रहा है, और इस बार भी इसी नैरेटिव को आगे पुश किया गया है। लेकिन अब इसकी असली सच्चाई सुनिए। अगर एक अलग नजरिए से देखा जाए, तो नुकसान तो उत्तर भारत के उन राज्यों का हो रहा है जहाँ Population (जनसंख्या) ज्यादा है।
उन राज्यों पर तो एक तरह से दोहरी चोट पड़ रही है। सबसे पहले यह समझिए कि वहाँ के MPs (सांसदों) पर काम का एक्स्ट्रा भार पड़ेगा। यह कैसे होगा, इसे समझाती हूँ। जब 1973 में आखिरी बार परिसीमन हुआ था, तब इसके तहत देश में हर सांसद पर लगभग 10.5 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व था। उस समय जहाँ केरल की हर एक सीट पर औसतन 10.67 लाख की आबादी थी, तो वहीं यूपी की एक सीट पर औसत आबादी 10.48 लाख थी।
इसका मतलब यह हुआ कि चाहे केरल के लोग हों या यूपी के, दोनों के वोट की वैल्यू बिल्कुल बराबर थी। तब हर साढ़े दस लाख लोगों पर एक सांसद चुना जा रहा था। लेकिन 1976 में जब इस परिसीमन पर फ्रीज (रोक) लगा दिया गया, तब से जमीनी स्थिति लगातार बदलती चली गई।
2011 के Census के अनुसार, आज जहाँ यूपी के हर एक सांसद को लगभग 25 लाख लोगों की आबादी को सर्व करना पड़ता है, वहीं केरल के लिए यह नंबर 16.7 लाख के आसपास ही है।
यानी उत्तर भारत के सांसदों को एक तो चुनाव जीतने के लिए कहीं ज्यादा वोट इकट्ठे करने होते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ सांसद बनने के बाद उन्हें बहुत बड़ी आबादी के लिए काम करना पड़ता है। इसके अलावा दूसरा गंभीर मामला Resources (संसाधनों) के वितरण का भी है। उदाहरण के लिए, केरल के एक सांसद और यूपी के एक सांसद, दोनों को मिलने वाला पार्लियामेंट्री फंड (सांसद निधि) बराबर ही होता है।
लेकिन केरल के सांसद को वह फंड कम लोगों के बीच बांटना होता है, जबकि यूपी के सांसद को वही संसाधन एक बहुत बड़ी आबादी में खपाने पड़ते हैं। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि वह सांसद अपनी पूरी जनता को प्रॉपर सर्व नहीं कर पाता।
ऐसा नहीं है कि केरल की आबादी बिल्कुल नहीं बढ़ी है; नंबर केरल के लिए भी बढ़ा है लेकिन उनके सांसदों के लिए चीजें तुलनात्मक रूप से थोड़ी आसान रहती हैं। यहाँ समस्या सिर्फ रिसोर्स की ही नहीं है, बल्कि Representation (प्रतिनिधित्व) की भी है। जहाँ केरल में 16 लाख लोग मिलकर अपना एक सांसद चुनते हैं, वहीं यूपी में 25 लाख लोग मिलकर एक सांसद चुनते हैं।
यानी उत्तर भारत के 25 लाख लोगों को संसद में ‘एक’ आवाज मिल रही है, जबकि केरल में 16 लाख लोगों को ही ‘एक’ आवाज मिल जा रही है। इससे केरल का प्रतिनिधित्व संसद में ज्यादा मजबूती और प्रभावी ढंग से हो पाता है, जबकि यूपी के आम लोगों का प्रतिनिधित्व उस अनुपात में कमजोर रह जाता है।
दूसरा बड़ा मुद्दा सीटों की संख्या के नुकसान का है। अगर साल 2011 के Census के विशुद्ध फॉर्मूले के अकॉर्डिंग परिसीमन किया जाता, तो उत्तर भारत की सीटें बढ़कर 140 से ऊपर हो जातीं और बिहार को भी लगभग 73 सीटें मिलतीं। लेकिन सरकार के इस नए 50% वाले यूनिफॉर्म फॉर्मूले की वजह से उन्हें क्रमशः 120 और 60 सीटें ही मिल पा रही हैं। यानी असल में देखा जाए तो उत्तर भारत के राज्य ही अपनी आबादी के अनुपात में नुकसान झेल रहे हैं।
इसके विपरीत, अगर विशुद्ध आबादी का फॉर्मूला लगता तो तमिलनाडु को केवल 51 सीटें मिलतीं, लेकिन इस नए सिस्टम से उन्हें 59 सीटें मिल रही हैं। यानी उन्हें तो सीधे तौर पर फायदा ही हो रहा है। तो इसका सीधा मतलब क्या निकलता है? इसका सीधा मतलब यह है कि उत्तर भारत के राज्य अपनी आबादी के हक को छोड़कर भी पूरी तरह शांत हैं। वे इस बात के लिए न तो काले कपड़े पहन रहे हैं कि पापुलेशन रेशियो में उनकी सीटें घट रही हैं, और न ही वे यह शिकायत कर रहे हैं कि यहाँ के आम वोटर के वोट की वैल्यू कम हो रही है। उन्होंने देश के संतुलन के लिए इसे चुपचाप एक्सेप्ट कर लिया है।
केंद्र सरकार जो प्रयास कर रही है, उसमें हर एक पॉइंट पर दक्षिण के राज्यों की चिंताओं को गहराई से समझा गया है और उनके साथ किसी भी तरह का अन्याय नहीं होने दिया गया है। इसके साथ ही, महिला आरक्षण लागू होने के बाद किसी भी मौजूदा पुरुष सांसद का प्रतिनिधित्व अचानक कम न हो जाए, इसके लिए सीटों का टोटल नंबर ही सीधे बढ़ा दिया गया है।
बुनियादी तौर पर हर एक फ्रिक्शन पॉइंट को सरकार ने स्मूथ करने की कोशिश की है ताकि महिलाओं को उनका हक यानी आरक्षण भी मिले, उन्हें पार्लियामेंट में आने का पूरा मौका मिले, दक्षिण के राज्यों की राजनीतिक चिंताएं भी दूर हों और उत्तर भारत को भी कोई बड़ी समस्या न आए। लेकिन इसके बावजूद चाहे DMK हो, कांग्रेस हो या फिर केरल की कम्युनिस्ट पार्टियां, सभी इस परिसीमन फॉर्मूले के पीछे हाथ धोकर पड़ी हैं और एड़ी-चोटी का जोर लगाकर इसका विरोध कर रही हैं। वे इसे संसद में पास तक नहीं होने देना चाहतीं, जबकि उनकी सभी व्यावहारिक चिंताएं पहले ही रिजॉल्व की जा चुकी हैं।
मजे की बात यह है कि ये विपक्षी दल इस यूनिफॉर्म 50% इंक्रीज फॉर्मूले के भी खिलाफ हैं और आबादी के बेस पर सीटें बढ़ाने का तो वे पहले से ही विरोध करते आए हैं। अब इस मौजूदा संतुलित फॉर्मूले के विरोध में उनके पास कोई सॉलिड लॉजिक बचा नहीं है। और जब आबादी के आधार पर सीटें बढ़ाने की बात की जाती है, तो वे दलील देते हैं कि ‘हमने तो पापुलेशन कंट्रोल किया है, तो आखिर हमें इसकी सजा क्यों दी जा रही है?’
इस पूरी स्थिति को देखकर तो यही लगता है कि ये पार्टियां असल में परिसीमन को नहीं रोकना चाहतीं, बल्कि उनका असली निशाना ‘Women Reservation’ (महिला आरक्षण) को रोकना है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोकसभा की एक-तिहाई सीटों पर महिला आरक्षण लागू होने का रास्ता इसी नए परिसीमन की चाबी से खुलता है। अब आज के दौर में महिला वोटर देश के भीतर इतनी बड़ी साइलेंट फोर्स बन चुकी है कि ये दल खुलकर महिला आरक्षण का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं, इसलिए इसे रोकने के लिए परिसीमन जैसे दूसरे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
लोकसभा में इस परिसीमन से जुड़े प्रावधानों को पारित करने के लिए टू-थर्ड मेजॉरिटी (दो-तिहाई बहुमत) की जरूरत होगी। अगर ये विपक्षी पार्टियां मिलकर इसे संसद में फेल करती हैं, तो असल में उनका यह विरोध परिसीमन के खिलाफ नहीं, बल्कि देश की महिलाओं के आरक्षण के खिलाफ माना जाएगा। और नतीजा यह होगा कि जैसे पिछले तीन दशकों से महिला आरक्षण बिल की फाइल अलग-अलग कमेटियों के चक्कर काटती रही है, यह पूरी कहानी एक बार फिर वहीं की वहीं रुक जाएगी।





