why-indians-live-in-scarcity-mindset-license-raj-socialism-history

क्यों लाइन तोड़ते हैं हम? जानिए क्यों हर Crisis में Panic करते हैं भारतीय? 

Summary
कोरोना में ग़ायब हुए ऑक्सीजन सिलेंडर ये सब scarcity mindset में आता है। छोड़िए, वो नहीं याद होगा अब सिलेंडर के फर्जी गोदामों पर पड़ते छापे तो पता होंगे, पेट्रोल पंप पर ड्रम-टेंट के बर्तन, जनरेटर और बोतल, पीपा लेकर पहुँचते लोग तो देखे ही होंगे! 

आपको नमक के ख़त्म होने पर उड़ती अफवाहें याद हैं, या फिर कोरोना में ग़ायब हुए ऑक्सीजन सिलेंडर। ये सब ‘Scarcity Mindset’ में आता है। छोड़िए, वो नहीं याद होगा। अब सिलेंडर के फर्जी गोदामों पर पड़ते छापे तो पता होंगे। पेट्रोल पंप पर ड्रम, टेंट के बर्तन, जनरेटर, बोतल और पीपा लेकर पहुँचते लोग तो देखे ही होंगे!

ये भी देखा होगा कि एक दिन सबने इतना तेल ख़रीद लिया कि अगले दिन पेट्रोल पंप सूने हो गए। ये भी देखा होगा कि जिस पंप पर गाड़ियों की लाइनें लगी थीं, वहाँ दूसरे दिन कर्मचारी खाली बैठे रहे। आख़िर हम ऐसे क्यों हैं? क्यों हम किसी भी बात को सुनकर सब कुछ अपने घर में भरने चल देते हैं?

क्यों हम पंप पर घर का कटोरी-चम्मच लेकर पहुँच जाते हैं? क्यों हम मेट्रो में सीटें होते हुए भी एक-दूसरे को धक्का देते हुए घुसते हैं, लाइन तोड़ देते हैं? क्यों आख़िर हम Safe नौकरी तलाशते हैं, Business Risk नहीं लेते? क्या हम Indians सही में इतने बुरे हैं या फिर लालची हैं? आख़िर दानियों के देश में ऐसी स्थिति क्यों आई? क्या है ये Mindset?

तो सबसे पहले एक लाइन सुनिए। हम बुरे लोग नहीं हैं। हमारी परिस्थितियों ने हमें ऐसा बना दिया है। हमारी परिस्थितियाँ हमें Selfish बना चुकी हैं और हम Crisis के समय अपने से आगे कुछ सोच ही नहीं पाते। सामान्य समय में भी हम Safe होकर चलना चाहते हैं।

आपके मन में सवाल होगा कि आख़िर ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ हैं, जो हमें Selfish बनाती हैं। ऐसा क्या Trauma है, जो हमें लाइनें तोड़ने पर मजबूर करता है। ये जानने के लिए मैं आपको आज से लगभग 4 दशक पीछे ले चलती हूँ।

Year, 1983।

अप्रैल महीने में Maruti Suzuki ने अपनी पहली गाड़ी 800 के लिए Booking Open की।

14th December 1983 को पहली गाड़ी की Delivery हुई। लेकिन आपको पता है, इस बीच कितनी गाड़ियों की बुकिंग हो चुकी थी? लगभग 40,000… Yes!

आज से 4 दशक पहले, आज के मुक़ाबले लगभग 1/20 की Economy वाले भारत में 8 महीने में 40 हज़ार गाड़ियों की बुकिंग हो चुकी थी।

आपके मन में फिर एक सवाल आया होगा कि मैं इस ‘Scarcity Mindset’ के बीच Maruti 800 की Booking क्यों समझा रही हूँ? बताती हूँ। जिस समय Maruti को 40 हज़ार Booking मिली थीं, उस समय पूरे देश में Ambassador, Fiat Padmini और बाकी गाड़ियों की Total Manufacturing Capacity ही 20 हज़ार Units थी।

गाड़ियाँ Black में बिकती थीं। यानी आप जितने की Ambassador आज ख़रीदते, उससे महँगी उसे एक महीने बाद बेच सकते थे। क्योंकि चीजें थीं ही नहीं! लोग गाड़ियाँ ख़रीदने को तैयार थे, लेकिन गाड़ियाँ नहीं थीं। और जब कोई चीज जरूरत से कम होती है तो क्या होता है? तो होती है उसकी कालाबाजारी। तो होती है उसकी जमाखोरी।

अब जिसके पास एक कार आ जाती, वो या तो उसे बेचता ही नहीं, या उसके लिए Premium लेता। अगर किसी का जुगाड़ लग जाता तो एक की जगह दो गाड़ियाँ ख़रीदता और मुनाफ़ा कमाता। यानी लोग या तो चीजें पाते नहीं और जब मिलतीं तो उनकी जमाखोरी सोचने लगते।

इससे भी बड़ा उदाहरण हमारा Bajaj है। Bajaj Chetak Scooter इस देश का शायद सबसे ज्यादा Nostalgia वाला Brand होगा। Formal कपड़ों में Bajaj Chetak चला रहा पुरुष, साड़ी पहने पीछे बैठी महिला और Scooter के हैंडल और सीट के बीच खड़ा बालक भारतीय Middle Class की पहचान हुआ करता था।

लेकिन आपको पता है कि 1972 में Launch हुए इस Chetak पर 10 साल की Waiting थी! यानी मैं अगर अपनी जवानी के दिनों में Scooter Book करता, तो शायद अपनी शादी के 2-4 साल बाद Scooter पाता।

और ये बात किसी वायरल WhatsApp Message या Facebook Post से नहीं बता रहा हूँ। बल्कि ये दशकों से Automobile Sector पर लिखने वाली पत्रिका ‘Autocar’ को दिए एक Interview में Bajaj Auto के संस्थापक Rahul Bajaj ने स्वयं कही थी।

भारतीयों का ‘Scarcity Mindset’

और Scooter-Car तो फिर भी बड़ी चीजें हैं। इस देश में चीनी, सीमेंट, खाद जैसी छोटी-छोटी चीजों के लिए DM के दफ़्तर से अनुमति लेनी पड़ती थी।

अगर आपके घर में विवाह है तो आपको दो माह पहले से DM के दफ़्तर के चक्कर काटने पड़ते और तब जाकर आपको चीनी यानी शक्कर का License मिलता, जिसे आप सरकारी गल्ले की दुकान से लेते। और आपको पता है कि इस दुकान से ये चीनी ली जाती, उसे क्या कहते थे? उसका नाम था ‘कंट्रोल की दुकान’।

लेकिन कमी क्यों थी? क्यों Scooter कम थे? क्यों गाड़ियाँ नहीं थीं? क्यों चीनी और सीमेंट Control में थे? और क्यों उस कमी की हालत में देश था? क्यों Scooter इतने नहीं बनते थे कि सभी उसे तुरंत यानी Off the Shelf ख़रीद पाएँ? क्यों चीनी किराने की दुकान पर इफ़रात में Available नहीं थी? क्यों सीमेंट के ट्रक हर Building Material की दुकान के बाहर नहीं थे?

इसका एक Answer है — ‘License Raj’।

आजादी के बाद इस देश की सरकारों ने जो System अपनाया, उसे Mixed Economy कहते हैं। इसमें Closed Economy यानी State Controlled Economy और Free Market Economy यानी Capitalism, दोनों के गुण होते हैं। लेकिन हमारे देश में थोड़ा Different Approach ली गई।

देश में पंडित नेहरू के सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों के बाद 1951 में ‘Industries Development and Regulation Act’ आया। Basically, यहीं से जन्म हुआ ‘License Raj’ का। इस कानून के चलते अब भारत में हर Industry को सरकार Regulate करने लगी।

मतलब कौन-सी Company कितना माल बनाएगी, कितना माल बेचेगी, कितना Price रखेगी — इन सबका कोटा सरकार तय करने लगी। लेकिन मामला License तक Limited रहता तो भी गनीमत थी। 1956 में इसका Pro Max Version भी नेहरू सरकार ले आई।

1956 की Industrial Policy में नेहरू सरकार ने हथियार बनाने से लेकर Shipbuilding और Atomic Energy से लेकर Steel जैसी Industries को सरकारी खाते में डाल दिया। 1956 की इस Policy के चलते अब Private Sector इन Industries में कदम भी नहीं रख सकता था।

ज्यादातर Core Industries, यानी जिनके माल की जरूरत दूसरे Goods बनाने के लिए होती है, उन्हें सरकार Control करने लगी और उनका Production सीमित कर दिया गया। इसके साथ ही कुछ ही Companies को सामान बनाने की Permit दी गई। जैसे Bajaj Scooters का ही उदाहरण ले लीजिए।

1979 में संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने ख़ुद कहा कि देश में Scooters की सालाना Demand लगभग 2.25 लाख है और ये 1982 तक 3 लाख पार कर जाएगी। इसी जवाब में सरकार ने कहा कि हाँ, Bajaj के Scooters की Demand काफ़ी ज्यादा है।

और फिर उसी ने ये बताया कि Bajaj को 80 हज़ार Scooter और Three Wheeler बनाने का Permit दिया गया है। तो आप सोचिए कि सरकार को Demand भी पता थी, उसे Permit का नंबर भी पता था, ये भी पता था कि Demand आगे बढ़ेगी… लेकिन तब भी उसने License वाला हिसाब-किताब नहीं हटाया और नंबर Regulate करती रही।

मतलब हमारे यहाँ चीजों की भयानक कमी थी और सरकार अपना Control किसी भी चीज़ से छोड़ना नहीं चाहती थी। कहने को तो तब भी कोई भी आदमी अपनी Factory लगा सकता था और कोई भी आदमी Market में Enter कर सकता था। लेकिन ये बात सिर्फ़ सैद्धांतिक थी।

असल में दिल्ली के Lutyens Zone के गलियारों में जिनकी पहुँच थी, उन्हें ही License और Permit मिलते थे। 1991 के Reforms से पहले अगर कोई आदमी अपनी Factory Set Up करना चाहता था, तो उसे लगभग 80 अलग-अलग Agencies के Approval लेने पड़ते थे। यानी आप अगर एक कलम भी बनाना चाहते तो आपको दर्जनों Agencies के चक्कर काटने पड़ते।

मतलब सरकार एक तो जिनके पास License थे, उनके Production को सीमित करके रखती थी। वहीं दूसरी तरफ़ नए Businessman के लिए Market में Enter करना ही Red Tape के सहारे मुश्किल कर दिया गया था। और इसका परिणाम ये हुआ कि देश के लोगों को जरूरत की चीजें नहीं मिलीं।

जब चीजें नहीं मिलीं तो उसका Crisis हुआ। जब Crisis हुआ तो इन चीजों की कालाबाजारी हुई। एक समानांतर Market Create हो गया। जैसा आज हम Cylinders के संबंध में देख रहे हैं। दूसरा, जब कालाबाजारी हुई और कमी रही, तो लोगों में सदैव Panic के विचार रहने लगे।

मतलब हर समय आदमी को हर नए Scooter, हर नई गाड़ी, अगले सीमेंट की बोरी, अगली चीनी की बोरी और हर चीज़ की चिंता सताने लगी। उसे पता होता था कि लाइन तोड़कर अगर वो चीज हथिया नहीं लेगा तो वंचित रह जाएगा। उसे पता था कि अगर उसे मौक़ा मिलेगा तो इस आपदा का अवसर उठाकर वो जरूरत से ज्यादा इकट्ठा करेगा।

कई लोगों ने इस कमी को Market में Convert किया और उसी तरह जमाखोरी करने लगे, जैसे आज हम Diesel-Petrol के मामले में देख रहे हैं।

कांग्रेस का ‘License Raj’

जब Permit Raj के चक्कर में देश में सरकारें सबको रोजगार नहीं दे पाईं, तो ये भी हुआ कि लोग सरकारी नौकरी को सबसे Safe Option मानने लगे।

और एक उदाहरण देता हूँ। मुंबई में जैसे City Expand हुई, वैसे-वैसे Railway का Local Network नहीं Expand हो पाया। इसकी वजह से लोग ट्रेनों में लटककर Travel करने लगे। सरकार ने दशकों तक मुंबई को कोई Alternate Network नहीं दिया और इस लटककर जाने और पटरियों पर मौत को ‘Spirit of Mumbai’ का नाम दे दिया गया।

यानी लोगों ने जितनी समस्याएँ देखीं, उसे स्वीकार किया और दौड़कर ट्रेन पकड़ना और गेट पर लटकना जीवन मान लिया। और जब Metro आई, तो उसे भी उन्होंने उसी तरह Treat किया। यानी धक्का देकर घुसना, जबकि यहाँ ना सीटों की कमी है और ना ये Network Railway के Local जैसा है।

मतलब उस 1950-90 तक के समाजवादी राज ने ऐसी तस्वीर हमारे दिमाग़ में छोड़ी कि हम डर-डरकर जीने लगे। हमें हमेशा लगा कि सब कुछ कम है। कैसे जल्दी मैं पहले कुछ हथिया लूँ, कैसे मैं लाइन तोड़कर आगे पहुँच जाऊँ, कैसे मैं सब कुछ इकट्ठा कर लूँ! और वो Thinking आज तक है।

और कांग्रेस की क्या बात करनी! कांग्रेस को जिन अंग्रेज़ों ने खड़ा किया, उन्होंने भी भारतीयों को कम नहीं सताया। उनके समय में इतने अकाल पड़े और इतनी मौतें हुईं कि लोग खाने के नाम से खौफ़ खाने लगे। कभी जिन भारतीय किसानों के घर अन्न से भरे रहते थे, उनके दालान सूने रहने लगे थे।

चाहे मौसम खराब हुआ हो, फसल खराब हो गई हो, अंग्रेज़ अपना लगान यानी अनाज की वसूली कर ही लेते थे। सिर्फ़ इतना ही नहीं, जो अन्न भारतीय अपने लिए उगाते थे, उसे British अपनी फ़ौज के लिए इस्तेमाल करते थे।

1943 में जब बंगाल में अकाल पड़ा, तो भारतीयों को अन्न ही नहीं मिला। इस दौरान Supply British Army को जाती रहीं। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, 30 लाख लोग इस अकाल में मारे गए।

अब सोचिए, जिस देश के 30 लाख लोग एक अकाल में मारे जाएँ, वहाँ के लोग आख़िर ‘Scarcity Mindset’ से ग्रसित क्यों नहीं होंगे? क्यों उन्हें अगले दिन के खाने की चिंता नहीं सताएगी?

हमारे देश में वैश्य वर्ग को खूब Target किया गया है कि ये जमाखोरी करके मुनाफ़ा कमाते हैं। ये Target करने वाले वामपंथी रहे हैं। उन्होंने फ़िल्मों में ये Narrative Push किया है। लेकिन सच्चाई ये है कि वामपंथ की दी हुई व्यवस्था ने ही इस देश में चीजों की क़िल्लत करवाई, Permit Raj लाया और इस देश को Scarcity के Mindset में धकेल दिया।

तब आज जब आप लोगों को लाइनें तोड़ते, पेट्रोल पंप पर लड़ाई करते, टेंट वाले बर्तनों में Diesel-Petrol भरते देखें, तो हैरान मत होइएगा। ये भी नहीं सोचिएगा कि आख़िर क्यों ये लोग ऐसा Behave कर रहे हैं। बल्कि ये सोचिएगा कि आज भी वो मानसिकता इस देश में मौजूद है और लोगों के दिमाग़ में घर बना चुकी है, जिसके तहत ये सब हो रहा है।

और वो मानसिकता है ‘Scarcity Mindset’ और ये देन है दशकों के समाजवादी राज की।

Editorial team:
Production team:

More videos with Ritika Chandola as Anchor/Reporter