“डेवलपमेंट प्रोजेक्ट ही नए और आज़ाद भारत के मंदिर/चारधाम और तीर्थ हैं,” आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ये बयान तमाम कम्युनिस्ट और नेहरू-छाप इंटेलेक्चुअल्स की ज़ुबान पर रहता है .. सोचिए जो नेहरू सेना के आधुनिकीकरण के बजाय विकास को प्राथमिकता देने की बात कहते थे, शायद वो आज ज़िंदा होते तो ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को आज का मॉडर्न सोमनाथ मंदिर नाम देते, जिसके अराउंड भारत की मरीं इकॉनमी चलती थी। लेकिन आज नेहरू के नाम को भुनाने वाले नेहरू-गांधी परिवार के लोग ख़ुद नेहरू के उसी डेवलपमेंट मॉडल के ख़िलाफ़ खड़े हैं ।
Gateway to the Future – The ₹72,000 Crore Strategic Blueprint
मैं बात कर रहा हूँ दी ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की, जिसे लोग 72,000 करोड़ रुपए से 92,000 करोड़ रुपए का इंफ्रास्ट्रक्चर नाम दे रहे हैं। जो कि आने वाले समय में भारत के लिए वो Gateway बनेगा, जिससे हमारी इकॉनमी और स्ट्रेटेजी, बाक़ी दुनिया से संवाद स्थापित करेगी।
आख़िर क्यों एक स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट के खिलाफ अचानक से पर्यावरण और ह्यूमन राइट्स की दलीलें एक ढाल की तरह खड़ी कर दी जाती हैं? आखिर क्यों भारत यहाँ अपनी ताकत को कई गुना बढ़ा रहा है? क्यों चीन इस 800 किलोमीटर लंबी द्वीप श्रृंखला से खौफ खाता है?
आज हम इस Hybrid Warfare का विश्लेषण भी करेंगे और समझेंगे कि आखिर ‘मलक्का’ की चाबी के लिए छिड़ा ये असली खेल क्या है।
21वीं सदी की जियो पॉलिटिक्स में हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) दुनिया का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है। और इस बिसात पर ग्रेट निकोबार भारत का वो ‘अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर’ (Unsinkable Aircraft Carrier) है, जो कभी डूब नहीं सकता ।
अक्सर आपने खबरों में Strait of Hormuz का नाम सुना होगा, जहाँ से खाड़ी देशों का तेल निकलता है। लेकिन लेटेस्ट स्ट्रेटेजिक डेटा कुछ और ही कहता है। 2025 की पहले छ महीनों का डेटा देखने से पता चलता है कि होर्मुज से डेली 20.9 मिलियन बैरल तेल गुजरता है, जबकि Strait of Malacca से 23.2 मिलियन बैरल…मलक्का आज दुनिया की सबसे बड़ी एनर्जी लाइफ़ लाइन बन चुका है। आप इसकी ज्योग्राफिकल पोजिशन स्क्रीन पर देख सकते हैं।।
चीन का 80% oil इंपोर्ट और उसका heavy industrial export इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है..
The Malacca Dilemma – Choking China’s Energy Lifeline
चीनी रणनीतिकारों के लिए ये उनका सबसे बड़ा Malacca Dilemma है। उन्हें डर है कि ईरान और अमेरिका के युद्ध जैसी किसी स्थिति में भारत इस रास्ते को ब्लॉक कर सकता है।
निकोबार प्रोजेक्ट चीन की इसी दुविधा को हकीकत में बदलने की तैयारी है। और निकोबार केवल मलक्का को ब्लॉक करने के लिए भी नहीं, बल्कि इन्फ्रास्ट्रक्चरल डोमिनेंस के लिहाज से भी जरूरी है, ताकि चीन का कोई भी अल्टरनेटिव रूट (जैसे म्यांमार का कोको आइलैंड) भी भारत की निगरानी से बाहर न रहे।
लेकिन सवाल ये है कि अगर ये इतना इंपोर्टेंट है तो आज क्यों कुछ लोग एक्टिविज्म के नाम पर ग्रेट निकोबार आइलैंड के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर प्रोटेस्ट कर रहे हैं। देखिए ग्रेट निकोबार आइलैंड स्ट्रेटजिकली लोकेटेड है और इंडियन ओशन में चाइनीज इन्फ्लुएंस को काउंटर करने के लिए हमारे पास मोस्ट इंपॉर्टेंट एसेट है क्योंकि ग्रेट निकोबार आइलैंड ग्रेट चैनल के हेड पर लोकेटेड है जो चीन की ज्योग्राफिकल वीकनेस मलक्का स्ट्रीट की इंडियन ओशन में ओपनिंग है..
इस वजह से यहां से इस स्ट्रीट को चोक किया जा सकता है.. लेकिन यह स्टेप जो हमें 20 से 30 साल पहले लेना चाहिए था इसके अगेंस्ट कुछ ग्रुप्स आज एनवायरमेंटल कंसर्न्स और यहां के लोकल ट्राइब्स के नाम पर प्रोटेस्ट कर रहे हैं और इस प्रोजेक्ट को डिले करने में लगे हैं। ये भी भूल गए कि इंडिया में कोई भी प्रोजेक्ट 4 स्टेज एनवायरमेंट क्लीयरेंस और वहां के लोकल्स की रिहैबिलिटेशन के बाद ही इंप्लीमेंट किया जाता है..
Necklace of Diamonds – Neutralizing the String of Pearls
तो क्या राष्ट्र सुरक्षा से बढ़कर कछुआ? चीन ने भारत को घेरने के लिए बरसों से समुद्र में ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) यानी मोतियों की माला बिछाई है। पाकिस्तान का ग्वादर हो या श्रीलंका का हंबनटोटा, मकसद साफ था – भारत की समुद्री घेराबंदी।
लेकिन भारत अब मूकदर्शक नहीं है। भारत ने जवाबी रणनीति तैयार की है, Necklace of Diamonds । सिंगापुर के चांगी बेस से लेकर इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट तक, भारत ने अपने हीरों का हार बिछा दिया है। और इस हार का सबसे चमकदार और केंद्रीय हीरा (Centerpiece) है, ग्रेट निकोबार ।
यहाँ बनने वाला ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरफोर्स एन्क्लेव और ग्रीनफील्ड सिटी चीन के घेराबंदी के जाल को बेरहमी से काटते हैं। ये भारत की ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ रणनीति का सबसे धारदार और रणनीतिक हथियार है।
Green Colonialism – The Weaponization of ESG
जब कोई देश सैन्य रूप से मजबूत होने लगता है, तो दुश्मन देश सीधे युद्ध नहीं लड़ते। वे लड़ते हैं ‘हाइब्रिड युद्ध’। इस युद्ध में बंदूकें नहीं, बल्कि नैरेटिव , इन्फॉर्मेशन, डिसइंफ़ॉर्मेशन और मेन्यूपुलेशन हथियार होते हैं।
जैसे जब सोवियत रूस ने पहला आदमी अंतरिक्ष में भेजा तो ये अमेरिका के लिए बड़ा PR डिजास्टर साबित हुआ, तो अमेरिका ने सोवियत डोमिनेंस की इस लकीर को छोटा करने के लिए मून लैंडिंग मिशन बनाया। इस बीच कहीं अमेरिका ने USSR में चीजों की अवैलिबिलिटी ना होने पर जोक्स क्रिएट किए, तो कहीं सोवियत ने अमेरिका के कैपिटलिज्म पर… बेसिकली आज कुछ वैसा ही हम हमारे आसपास देख रहे हैं।
आज हम देख रहे हैं – ESG का शस्त्रीकरण (Weaponization of ESG)। ESG का मतलब है Environment (पर्यावरण), Social (सामाजिक) और Governance (शासन)। विरोधी ताकतें इन तीन शब्दों का इस्तेमाल भारत की स्ट्रेटेजिक डोमिनेंस को रोकने के लिए एक ‘वीटो पावर’ की तरह कर रही हैं।
वेस्टर्न कंत्रीज, जो औद्योगिक क्रांति के दौरान अपने नेचुरल रिसोर्सेज का हर तरह से दोहन कर चुके हैं, अब एक ‘ट्रांसनेशनल ग्लोबल वोक नेटवर्क’ (Transnational Global Woke Network) के माध्यम से ‘ग्रीन कॉलोनियलिज्म’ (Green Colonialism) या ‘हरित उपनिवेशवाद’ को बढ़ावा दे रहे हैं। ये नेटवर्क चाहता है कि भारत जैसे विकासशील देश अपने संसाधनों को ‘जैविक संग्रहालय’ (Biological Museums) बनाकर छोड़ दें, ताकि ग्लोबल पावर बैलेंस (Power Balance) हमेशा चीन और पश्चिम के पक्ष में रहे।
logic दिया जा रहा है कि लेदरबैक कछुओं (Leatherback Turtles) का घर उजड़ जाएगा या यहाँ के जंगल खत्म हो जाएंगे। भारत सरकार ने इसके लिए 150 वर्ग किलोमीटर से अधिक का ‘ऑफसेट प्लांटेशन’ और कछुओं के लिए अलग से संरक्षण योजना बनाई है।
लेकिन समस्या देखिए, जो लोग ग्रेट निकोबार में एक पेड़ कटने पर विलाप कर रहे हैं, वही लोग चीन द्वारा दक्षिण चीन सागर में पूरे-पूरे कोरल रीफ (Coral Reefs) को कंक्रीट के टापू में बदल देने पर साइलेंट रहते हैं। तो क्या क्लाइमेट चेंज का खतरा सिर्फ भारत के विकास प्रोजेक्ट्स से ही पैदा होता है?
दुनिया में कोई भी रणनीतिक विकास बिना किसी इकोलॉजिकल इफ़ेक्ट के संभव नहीं है, अमेरिका से लेकर चीन तक सबने यह कीमत चुकाई है। सवाल यह है कि क्या हम कछुओं को बचाने के लिए देश की समुद्री सीमा को असुरक्षित छोड़ सकते हैं?
The Sabotage Playbook – From Sterlite to Great Nicobar
निकोबार प्रोजेक्ट का विरोध कोई नई बात नहीं है। यह उसी Playbook की कार्बन कॉपी है जिसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ पहले भी किया जा चुका है।
याद कीजिए स्टरलाइट कॉपर (Sterlite Copper)। ‘प्रदूषण’ के नाम पर नैरेटिव गढ़ा गया, प्रदर्शन हुए और प्लांट बंद हो गया। नतीजा? भारत, जो कभी शुद्ध तांबे का एक बड़ा Exporter था, रातों-रात तांबे का भारी Importer बन गया। इसका सीधा आर्थिक और रणनीतिक लाभ चीन को हुआ। स्टरलाइट बंद होने के बाद प्रदूषण कितना कम हुआ, यह तो शोध का विषय है, लेकिन एक सच यह है कि भारत को तांबा आयात करने के लिए हर साल 14,000 करोड़ रुपए से ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। क्या निकोबार को रोककर हम अपनी सुरक्षा के लिए भी ऐसे ही किसी और देश पर निर्भर होना चाहते हैं?
यही कहानी कुडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट और पॉस्को (POSCO) स्टील प्रोजेक्ट में दोहराई गई। कुडनकुलम में जब भारत अपनी लांग run में एनर्जी सिक्योरोटी इंस्योर करने के लिए तमिलनाडु में रूस की मदद से न्यूक्लियर प्लांट लगा रहा था, तब इसी विदेशी NGO नेटवर्क ने ही स्थानीय मछुआरों के बीच Radiation और पर्यावरण का फर्जी डर पैदा करके भारी विरोध प्रदर्शनों को भड़काया था.. आज यही काम राहुल गांधी जनजाति और कछुओं के नाम पर कर रहे हैं.. यानी अब वही प्लेबुक निकोबार में खोली गई है।
यहाँ ‘इकोसाइड’ (Ecocide) और ‘जेनोसाइड’ (Genocide) जैसे भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि भारत को सुपरपावर बनने से रोका जा सके। Sustainable Development जरूरी है, लेकिन वह संप्रभु सुरक्षा की कीमत पर नहीं होना चाहिए..
The Foreign Funding Trail – IB Reports & Hybrid Warfare
सवाल ये है कि आखिर इन प्रोटेस्ट और एक्टिविज्म के पीछे पैसा और दिमाग किसका है? भारतीय इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की 2014 की रिपोर्ट ने इस पर्दे को पूरी तरह उठा दिया था । रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से Greenpeace, Amnesty, Cordaid और Action Aid जैसे संगठनों का नाम लिया गया है, जो विदेशी सरकारों के हितों के लिए काम कर रहे हैं ।
ये संगठन भारत के स्थानीय नेटवर्क जैसे PUCL और नर्मदा बचाओ आंदोलन के माध्यम से काम करते हैं। भारत सरकार ने इस हाइब्रिड युद्ध के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए ग्रीनपीस सहित कई संगठनों के विदेशी फंडिंग (FCRA) लाइसेंस रद्द कर दिए हैं। आजकल ही ED ने ‘क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क’ से जुड़े कार्यकर्ताओं पर भी कानूनी कार्रवाई की है, क्योंकि वे विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल करके भारत की ऊर्जा और सुरक्षा परियोजनाओं को बाधित कर रहे थे।
ये एनजीओ ‘क्लाइमेट चेंज’ की दलील को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इनका असली मकसद भारत की GDP को हर साल 2% से 3% का नुकसान पहुँचाना है
Political Misadventures – Ideological Pacts & Strategic Roadblocks
अब बात करते हैं राजनीति की। निकोबार प्रोजेक्ट को मिस-एडवेंचर कहना राहुल गांधी के लिए कोई नई बात नहीं है। उनके राजनीतिक करियर में एक पैटर्न है- वेदांता नियमगिरि हो या पॉस्को स्टील, राहुल गांधी हमेशा विकास परियोजनाओं के विरोध में खड़े नज़र आते हैं । भारत में एक ऐसा वैचारिक ढांचा विकसित हो गया है जो हर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को संदेह की नजर से देखता है। और इसीलिए मैंने आपको इस वीडियो की शुरुआत में ही नेहरू जी का मंत्र याद दिलाया था.. जिसके ख़िलाफ़ राहुल गांधी आज खड़े नजर आ रहे हैं.
यहाँ ये भूलना मुश्किल है कि 2008 में कांग्रेस पार्टी और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच एक MoU साइन हुआ था । आज जब निकोबार प्रोजेक्ट चीन की ‘मलक्का दुविधा’ को बढ़ा रहा है, तब राहुल गांधी का ये विरोध कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या यह एक्टिविज्म केवल REEL-बाज़ी है, या इसके पीछे कोई गहरा वैचारिक और रणनीतिक गठजोड़ है?
जब कोई भारत जैसा संप्रभु राष्ट्र अपनी सामरिक और आर्थिक क्षमताओं में इतनी बड़ी ताक़त जोड़ता है, तो उसके वैश्विक प्रतिद्वंद्वी सीधे सैन्य संघर्ष का जोखिम नहीं उठाते। इसके बजाय, वे Asymmetric Warfare या Hybrid Warfare का सहारा लेते हैं। ग्रेट निकोबार परियोजना के मामले में, इस हाइब्रिड युद्ध का प्राथमिक हथियार पर्यावरणवाद – Environmentalism और सामाजिक/ जनजातीय सक्रियता – Social Activism बन गया है ।
जैसे-जैसे यह स्ट्रेटेजिक स्कीम जमीन पर उतरने लगी, अंतरराष्ट्रीय NGOs, सो कॉल्ड मानवाधिकार रक्षकों और विदेशी मीडिया घरानों ने इसके खिलाफ एक ऑर्गेनाइज्ड और मालती लेयर कैंपेन छेड़ दिया । इस रणनीति का पहला सिरा पर्यावरण पर हमला करता है और दूसरा सिरा सामाजिक अधिकारों पर। इसका असली मकसद भारत जैसी डेवलपिंग कंट्रीज के बुनियादी ढांचे के विकास को बाधित करना है।
इसे ही स्ट्रेटेजिक भाषा में ECG (Environment, Social, and Governance) का वेपनाइजेशन कहा जाता है ।
इस विचारधारा के तहत, विदेशी ताकतें और प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र स्थानीय एनजीओ को फंडिंग करते हैं ताकि वे मुकदमों, stay orders और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के ज़रिए प्रोजेक्ट्स में देरी कर सकें। इन विदेशी ताकतों का उद्देश्य आदिवासियों को आधुनिक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की मुख्यधारा में लाना नहीं है, बल्कि वे चाहते हैं कि आदिवासी पश्चिमी दर्शकों के लिए जैविक संग्रहालयों (biological museums) के रूप में आदिम अवस्था में ही रहें ।
Mission 2047 – India’s Answer to Maldives & Thailand
अब उन लोगों की बात, जो हर बात में मालदीव और थाईलैंड का ही नाम लेते हैं। भारत सरकार ने ‘अमृत काल विजन 2047’ ने यहाँ के लिए एक विस्तृत ‘ड्राफ्ट मास्टर प्लान 2047’ तैयार किया है।
इस मास्टर प्लान में Tourism को इस द्वीप की ग्रोथ के लिए backbone और प्राइमरी economic driver बताया है… नीति आयोग का मास्टर प्लान साफ कहता है कि जो अरबों डॉलर की भारतीय पूंजी हर साल विदेशी समुद्र तटों पर बह जाती है, उसे अब देश के भीतर ही रोकना होगा।
लक्षद्वीप के मिनिकॉय, सुहेली और कदमत द्वीपों की तर्ज पर अब अंडमान और ग्रेट निकोबार के लैगून में भी दुनिया के बेहतरीन Water Villas तैयार होंगे। यह लग्जरी के साथ साथ उस इको टूरिज्म का जवाब है जो भारत की आर्थिक रीढ़ को मजबूत करेगा। हम दुनिया को दिखाएंगे कि प्रकृति का संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर का पर्यटन एक साथ कैसे चल सकते हैं।
The Ream & Coco Threat – China’s Maritime Pincer
और जब भारत में निकोबार प्रोजेक्ट को रोका जा रहा है, तब चीन क्या कर रहा है? चीन ने कंबोडिया में रीम नेवल बेस (Ream Naval Base) का विस्तार लगभग पूरा कर लिया है । कंबोडिया के हवाई और समुद्री क्षेत्र को ट्रैक करने के लिए चीनी रडार और एक नया रडोम (Radome) स्थापित किया गया है
सैटेलाइट तस्वीरें बताती हैं कि यहाँ का घाट 650 मीटर लंबा है, जहाँ चीन के विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर भी खड़े हो सकते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात, चीन ने यहाँ पानी की गहराई को 2-3 मीटर से बढ़ाकर 8-11 मीटर कर दिया है, ताकि भारी युद्धपोत आसानी से आ सकें.. इस इलाके में अपना दबदबा साबित करने के लिए चीन ने इसके आसपास के अमेरिकी फंडिंग से बने इंफ्रा को नष्ट भी कर दिया है..
कंबोडिया के तानाशाह प्रधानमंत्री हुन सेन (Hun Sen) के नेतृत्व वाली सरकार को जब मानवाधिकारों के हनन और अलोकतांत्रिक चुनावों के कारण अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा, तो चीन ने इस राजनीतिक अलगाव का भरपूर फायदा उठाया। बीजिंग ने कंबोडिया की नौसेना के आधुनिकीकरण के नाम पर रीम नेवल बेस को Fund किया और इसको फिर से बनाया।
साल 2019 में हुए एक सीक्रेट MOU के तहत, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) को इस नौसैनिक अड्डे पर कम से कम 30 वर्षों के लिए exclusive access दे दिया गया है। उधर म्यांमार के कोको द्वीप (Coco Islands) पर चीन जासूसी उपकरण लगा चुका है। ये वही कोको द्वीप है जिसे नेहरू ने म्यांमार को सौंप दिया था.. आज ये एक समुद्री शिकंजा (Maritime Pincer) है, चीन हमें दोनों तरफ से घेर रहा है। अगर आज हम निकोबार में अपना बेस मजबूत नहीं करते, तो भविष्य में भारत को ‘होर्मुज जैसी स्थिति’ का सामना करना पड़ेगा, जहाँ हमारी ऊर्जा सुरक्षा पूरी तरह चीन के रहमो-करम पर होगी।
National Security vs. Reels – Choosing Sovereignty Over Activism
हमें एक राष्ट्र के तौर पर ये समझना होगा कि निकोबार में रिसॉर्ट्स बनें या न बनें, लेकिन वहां एक ‘नेवल बेस’ और ‘ट्रांसशिपमेंट पोर्ट’ होना भारत की संप्रभुता के लिए बेहद जरूरी है।
राहुल गांधी का एक्टिविज्म और रीलबाज़ी सुनने में अच्छीलग सकती है, लेकिन इसकी कीमत देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था चुकाती है। क्या हम एक ऐसा भारत चाहते हैं जो ‘जैविक संग्रहालय’ बनकर रह जाए, या वो भारत जो मलक्का की चाबी अपने हाथ में रखे जिसके दम पर समुद्र में हमारी ताक़त से पड़ोसी देश भी डरें? राहुल गांधी किस्म के एक्टिविज्म की कीमत अगर देश की गरीबी और गुलामी है, तो ऐसा एक्टिविज्म ही असल में सबसे बड़ा ‘मिस-एडवेंचर’ है।
डेवलपमेंट और सिक्योरिटी के बिना कोई राष्ट्र स्वाभिमानी नहीं रह सकता। हमें यह तय करना होगा कि हमारे लिए क्या जरूरी है, सोशल मीडिया की ‘रीलबाज़ी’ और ‘एक्टिविज्म’, या फिर हमारी आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा?




