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‘ममता बनर्जी’ का सोफा खिसका तो निकली गंदगी: जानिए क्या है बंगाल का कट-मनी, सिंडिकेट राज और मीडिया का मौन

Summary
पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद बदले राजनीतिक माहौल ने कई बड़े खुलासे किए हैं। कट मनी, सिंडिकेट राज, दीमक लगे नोटों से लेकर अवैध घुसपैठियों की वापसी तक, जानिए कैसे बंगाल के इन गंभीर मुद्दों पर देश का मुख्यधारा मीडिया सालों तक मौन रहा।

ममता बनर्जी की सरकार के साथ बंगाल में कुछ ऐसा हुआ जो पुराने घरों में एक नियम होता है। जब तक सोफा अपनी जगह पड़ा रहता है, घर साफ़ दिखता है। लेकिन जिस दिन उसे हटाकर नीचे झाड़ू लगाओ, तब पता चलता है कि सालों की धूल, कचरा, मरे हुए कीड़े और जाने क्या-क्या उसके नीचे दबा पड़ा था।

तो दोस्तों, बंगाल में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। पब्लिक ने इस बार चुनाव में “ममता बनर्जी” नाम का सोफा थोड़ा सा खिसका दिया, और नीचे से जो गंदगी निकल रही है, उसे देखकर लोग हैरान हैं।

पता चल रहा है कि बंगाल में “टोल मनी” का पूरा सिस्टम चलता था, “कट मनी” का पूरा बिजनेस चलता था। टीएमसी (TMC) के कुछ स्थानीय नेताओं का ऐसा खौफ़ था कि सफेद साड़ी भेजकर परिवारों को धमकाया जाता था कि तुम्हारे घर की औरत को विधवा कर देंगे। सोचिए, डेमोक्रेसी में राजनीतिक पार्टी का हाल ऐसा कि सफेद साड़ी भी धमकी का मॉडल बन जाए!

फिर खबरें आ रही हैं कि हॉस्टल्स में जली हुई करेंसी और दीमक लगे नोट मिल रहे हैं। भाई, इतना पैसा! कि गिनने की भी फुर्सत नहीं मिली और नोट सड़ने लगे। और अब जो बांग्लादेशी अवैध घुसपैठिए सालों से पॉलिटिकल शेड में आराम से बैठे थे, उनमें से कई वापस जाने लगे हैं। जैसे ही माहौल बदला, बहुत से लोगों को अचानक याद आ गया कि उनका असली घर बॉर्डर के उस पार है।

और सबसे मज़ेदार बात क्या है? ये सब कोई कल की घटनाएं नहीं हैं। ये सब सालों से बंगाल में चल रहा था। लेकिन बंगाल के सेल्फ-प्रोकलेम्ड मीडिया वॉचडॉग, बड़े-बड़े एडिटोरियल लिखने वाले, डेमोक्रेसी के ठेकेदार और फ्रंट पेज की हेडलाइन से देश को ज्ञान देने वाले अख़बार कहाँ थे? जो न्यूजपेपर्स एक शब्द की हेडलाइन से देश में बहस खड़ी कर देते थे, उन्हें “टोल मनी” नहीं दिखी। उन्हें “कट मनी” नहीं दिखी। उन्हें पॉलिटिकल टेररिज्म नहीं दिखा। उन्हें सड़ते हुए नोट नहीं दिखे। उन्हें अवैध घुसपैठ का सवाल नहीं दिखा।

अरे भाई, कहाँ गए वो लोग जो सुबह उठते ही लोकतंत्र बचाने निकल पड़ते हैं? कहाँ थीं सागरिका घोष? कहाँ थे राजदीप सरदेसाई? कहाँ थे वो सारे पोर्टल्स और यूट्यूबर्स जो दिल्ली में किसी चपरासी के छींकने पर भी तीन दिन का स्पेशल शो चला देते हैं? दिल्ली में कोई वॉट्सऐप फॉरवर्ड भी वायरल हो जाए तो आधा मीडिया “लोकतंत्र ख़तरे में है” का इमरजेंसी अलार्म बजाने लगता है।

लेकिन बंगाल में मस्त कमीशनखोरी चलती रही—कट मनी, सिंडिकेट राज, राजनीतिक हिंसा, धमकियों के किस्से, घुसपैठ के आरोप और चुनावी बवाल चलते रहे, तब सबको अचानक मौन व्रत याद आ जाता है।

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