अमेरिका भारत टैरिफ वॉर

F-35 से लेकर टैरिफ वॉर तक – ट्रम्प को भारत से कैसे मिली बार-बार शिकस्त

Summary
भारत से डोनाल्ड ट्रम्प को वह क्रेडिट कभी नहीं मिला, जो उनकी ललक थी। न भारत-पाकिस्तान युद्ध रोकने का, न टैरिफ वॉर के सामने झुकने का।

भारत ने कभी भी डोनाल्ड ट्रम्प को वह क्रेडिट नहीं दिया, जिसकी उन्हें सबसे ज़्यादा भूख थी — भारत-पाकिस्तान युद्ध को रोकने का श्रेय! ट्रम्प चाहते थे कि भारत दुनिया के सामने उन्हें शांति दूत घोषित कर दे, और फिर अमेरिकी हथियारों और F-35 की कतार में लग जाए। लेकिन भारत ने न सिर्फ वह क्रेडिट देने से इनकार कर दिया, बल्कि ट्रम्प की धमकियों और टैरिफ वॉर के सामने झुकने से भी साफ़ मना कर दिया।

ट्रम्प को गलतफ़हमी थी कि वसुधैव कुटुंबकम का जाप करने वाला भारत, उन्हें उस कुटुंब का बॉस मान लेगा। लेकिन भारत ने दिखा दिया कि हमारे कुटुंब में ‘बॉस’ नहीं होते, बल्कि आत्मनिर्भर राष्ट्र होते हैं।

भारत ने अपने फ़ैसले अपने हिसाब से लिए — F-35 नहीं चाहिए, रूस से सस्ता तेल चाहिए, हमारे बाज़ार में मांसाहारी गाय का दूध नहीं बिकेगा, और चीन से डील करनी है तो शर्तें हमारी अपनी होंगी। और जब ट्रम्प ने 50% टैरिफ की धौंस दी, तो भारत ने भी बिना हिचके अपने आत्मनिर्भर बाज़ार से इसका जवाब दिया।

ट्रम्प को लगा था कि ट्रेड वॉर से वे भारत जैसे देशों को झुका लेंगे, लेकिन वे खुद ही उस आग में झुलसने लगे। मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का नारा आज मेक अमेरिका PAID अगेन बन चुका है।

आज उनकी खुद की जनता सवाल कर रही है: जब टैरिफ एक ताक़त है, तो इसकी क़ीमत मेरी जेब से क्यों वसूली जा रही है? जब चीन का एक्सपोर्ट बढ़ रहा है, तो ट्रम्प किस मुंह से खुद को ‘ट्रेड जीनियस’ कहते हैं?

आज की सच्चाई यह है कि ट्रम्प अमेरिका के सबसे चर्चित नहीं, बल्कि सबसे बदनाम राष्ट्रपति बन चुके हैं। और वह बौखलाहट अब साफ़ दिखती है। कभी चीन को 90 दिन का अल्टीमेटम देते हैं, कभी रूस से युद्ध रोकने को कहते हैं, कभी भारत को धमकाते हैं — और हर बार उनके हाथ नाकामी ही लगती है।

आपको याद होगा कि यूरोपियन यूनियन तक उनकी धमकियों से डर गई थी। साल 2018 में EU ने टैरिफ वॉर से बचने के लिए अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर ट्रूस साइन कर लिया था, जिसमें वे ट्रम्प की शर्तों पर व्यापार संतुलन की बातें मानने लगे।

लेकिन भारत ने साफ़ कह दिया — हम अपने फ़ैसले अपने दम पर लेंगे, चाहे क़ीमत कुछ भी हो। ट्रम्प को लगता था कि उनकी टैरिफ की गीदड़भभकी से भारत डर जाएगा। लेकिन भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और ट्रम्प भी यह जान लें कि गीदड़भभकियों से शेर नहीं डरते।

आज ट्रम्प के सामने एक और चुनौती खड़ी है जिसका नाम है BRICS। ब्राज़ील, रूस, इंडिया, चीन और साउथ अफ्रीका अब सिर्फ़ एक संगठन नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक विश्व व्यवस्था — न्यू वर्ल्ड ऑर्डर बनते जा रहे हैं। और ट्रम्प को सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इसी बात से है कि अब डॉलर की बादशाहत को चुनौती मिल रही है।

आज ग्लोबल साउथ, जिसमें BRICS समेत अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ASEAN जैसे देश शामिल हैं, उनकी सम्मिलित GDP दुनिया की 44% तक पहुँच चुकी है। जबकि अमेरिका की अपनी GDP, वैश्विक GDP का सिर्फ़ 15.4% है।

यानि दुनिया अब सिर्फ़ अमेरिका की तरफ़ ही नहीं देख रही है। अमेरिका अब “एकमेव ब्रह्म” नहीं, बल्कि एक विकल्प भर है।

और जब ट्रम्प ने यह दावा किया कि उन्होंने भारत का ‘ऑपरेशन सिंदूर’ रुकवाया, तो भारत ने पहले तो उस बकवास को नज़रअंदाज़ किया। लेकिन जब अमेरिका की भाषा भारत के विपक्षी नेता बोलने लगे, तो प्रधानमंत्री ने संसद में साफ़ कह दिया कि — “भारत के मंतव्य के रास्ते में कोई रोड़ा नहीं बन सकता, दुनिया का कोई नेता नहीं।”

डोनाल्ड ट्रम्प आज एक ऐसे राष्ट्रपति हैं, जिनके पास दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन व्यवहार उस लड़के जैसा है जिसे बाप ने मुआवजे पर थार दिला दी हो।

उन्हें अब ट्रम्प टावर छोड़कर कभी ग्रेट डिप्रेशन का इतिहास पढ़ना चाहिए, जब अमेरिकी टैरिफ की मूर्खता ने खुद उनके देश को बेरोज़गारी और भुखमरी के कगार पर ला खड़ा किया था।

अमेरिका को दुनिया को आदेश देने की इतनी आदत हो गई है कि वह भूल गया है, दुनिया अब अमेरिकी डॉलर पर नहीं, बल्कि विकल्पों पर भरोसा करने लगी है।

और हाँ, यह भी याद रखना चाहिए कि वियतनाम से लेकर इराक तक, ‘सुपर बॉस’ बनने की क़ीमत अमेरिका ने पहले भी चुकाई है, और अब शायद फिर से चुकाएगा। लेकिन इस बार दुश्मन और हथियार मिसाइलें नहीं, बल्कि टैरिफ और ट्रेड ब्लॉक्स हैं।

Editorial team:
Production team:

More videos with Anurag Mishra as Anchor/Reporter