Indian Railway After 2014

फ्रेट कॉरिडोर्स ने कैसे बदली भारतीय रेलवे की तस्वीर? कैसे घटी लॉजिस्टिक्स लागत?

Summary
NITI आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि एक टन माल को अगर रोड के रास्ते से मूव किया जाए तो उसकी कॉस्ट होगी ₹2.58 पैसे लेकिन यही काम अगर रेल यानी मालगाड़ी से किया जाए तो ये कॉस्ट हो जाती है ₹1.41 पैसे प्रति टन। 

आप में से बहुत सारे लोग ऑनलाइन खरीदारी करते होंगे, ऑनलाइन ख़रीददारी नहीं भी करते होंगे तो लोकल मार्केट से ऐसा सामान तो जरूर ख़रीदते होंगे जो देश के कहीं दूसरे हिस्से से बन के आता होगा? आपने कभी ये सामान ख़रीदते हुए सोचा है कि इसमें मुझे अगर 7%-8% का डिस्काउंट मिल जाए तो कितना बढ़िया रहता। 

कभी ना कभी तो सोचा होगा। और अगर मैं आपको बताऊँ कि ये डिस्काउंट आपको मिल भी रहा है लेकिन बस दिख नहीं रहा। इस डिस्काउंट के लिए किसी को अपनी कॉस्ट नहीं कम करनी पड़ रही और ना ही कोई ऑफर्स लांच करने पड़ रहे हैं। 

ये कैसे हो रहा है और इसमें देश के रेलवे का कितना बड़ा हाथ है, ये मैं आपको जल्द ही बताऊंगा। लेकिन उससे पहले जानिए कि ये कॉस्ट घटी कैसे है और कैसे आपको डिस्काउंट मिल रहा है। तो सबसे पहले इकोनॉमिक्स का एक छोटा सा लेसन लेते हैं। 

क्या होता है लॉजिस्टिक्स? 

सबसे पहले समझिए कि किसी प्रोडक्ट की कॉस्ट कैसे तय होती है। इसके मोटा मोटी चार कॉम्पोनेंट होते हैं। पहला कंपोनेंट होता है उसे बनाने की लागत, इसमें कच्चा माल, लेबर, बिजली और बेसिकली प्रोडक्शन से जुड़ी चीजें शामिल होती हैं। इस प्रोडक्ट की कॉस्ट का दूसरा कॉम्पोनेंट होता है लोजिस्टिक्स। 

यानी कैसे ये प्रोडक्ट फैक्ट्री से आप तक पहुँचता है, उसका भाड़ा। फिर आते हैं सरकार के टैक्सेज और फिर आता है प्रॉफिट यानी मुनाफ़ा। अब इसमें  अगर किसी एक भी कॉम्पोनेंट में बढ़ोतरी हो जाए तो प्रोडक्ट की कीमत बढ़ जाएगी और घट जाए तो कीमतें नीचे आएँगी। 

लेकिन प्रोडक्शन कॉस्ट तो रेयरली ही घटती है, टैक्सेज भी रोज़ कम नहीं होते और कोई भला अपना प्रॉफिट कितने ही दिन छोड़ देगा। यहाँ पर बचता है लोजिस्टिक्स। यानी अगर किसी प्रोडक्ट को 500 किलोमीटर दूर भेजने में कल तक 1000 रुपए लग रहे थे और आज 800 रुपए लगें तो ये प्रोडक्ट आपके लिए थोड़ा सा सस्ता हो जाएगा। 

इकनॉमिक्स का लेसन यहीं पर ख़त्म होता है और हम आते हैं अपने मेन सब्जेक्ट पर। मैंने आपको जिस डिस्काउंट की बात एकदम शुरुआत में बताई थी, वो असल में लोजिस्टिक्स की कॉस्ट है। देश में बीते 10-12 वर्षों में सुधरे इंफ्रा के चलते लोजिस्टिक्स की कोस्ट्स ड्रॉमिटिकली ढंग से कम हुई हैं। 

कई सारी स्टडीज़ ने बताया है कि कुछ वर्षों पहले तक हमारी GDP में लोजिस्टिक्स यानी किसी प्रोडक्ट या सर्विस को प्रोडक्शन से कस्टमर तक मूव करवाने का खर्च टोटल कॉस्ट का 14% था। अगर हम किसी प्रोडक्ट के ही कॉस्ट की बात कर लें तो इस कॉस्ट में उसका ट्रांसपोर्टेशन, उसका गोडाउन में रखने का खर्चा, उसका डॉक्यूमेंटेशन और इन्वेंटरी जैसी चीजें होती हैं। 

लेकिन इसमें सबसे ज्यादा खर्च होता है ट्रांसपोर्टेशन का। DPIIT यानी डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ़ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत के संबंध में टोटल लोजिस्टिक्स कॉस्ट का लगभग 60% हिस्सा होता है ट्रांसपोर्टेशन। आज के समय में भारत की GDP में लोजिस्टिक्स का हिस्सा है लगभग 7.97% का।

कैसे बदला रेलवे इंफ्रा? 

यानी ये कुछ वर्षों में काफ़ी रिड्यूस हुआ है। यहीं से हमारी कहानी का दूसरा पार्ट शुरू होता है, ये तो किसी रिपोर्ट में लिखा हुआ आ गया कि कुछ वर्षों में भारत की लोजिस्टिक्स रैंकिंग सुधरी है, उसकी कॉस्ट घटी है, लेकिन इसके पीछे आख़िर क्या मेहनत हुई है, वो शायद ही अख़बारों की सुर्खियों में जगह पाए। 

मैं आपको इस कहानी से पहले एक छोटा सा फैक्ट और बताता हूँ। NITI आयोग की एक रिपोर्ट कहती है कि एक टन माल को अगर रोड के रास्ते से मूव किया जाए तो उसकी कॉस्ट होगी ₹2.58 पैसे लेकिन यही काम अगर रेल यानी मालगाड़ी से किया जाए तो ये कॉस्ट हो जाती है ₹1.41 पैसे प्रति टन। 

इसका सीधा सा अर्थ ये है कि ट्रेन से मूवमेंट में लगभग आधा पैसा बचता है। तो बेसिक सा लॉजिक ये है कि हमें रेलवे से ज़्यादा से ज़्यादा फ्रेट मूवमेंट करना चाहिए। लेकिन ये बिना रेलवे इंफ्रा में इन्वेस्टमेंट के नहीं होता। और यही वो फैक्ट है जिसने हमारे देश में लोजिस्टिक्स को बदला है। 

सबसे पहले समझिए कि 10 साल में लोजिस्टिक्स मामले में रेलवे ने क्या बदला है, यहाँ मैं आपको हार्ड डेटा बताऊंगा। सबसे पहले समझिये की आज रेलवे साल 2014 के मुक़ाबले लगभग 60% ज्यादा फ्रेट कैरी कर रहा है। जहाँ साल 2013-14 में रेलवे के ज़रिए 1053 मिलियन मीट्रिक टन फ्रेट मूव हुआ था, तो वही साल 2025-26 में ये नंबर था 1670 मिलियन मीट्रिक टन।

यानी 12 वर्षों लगभग 60% की ग्रोथ। और इसी के साथ भारत ने अमेरिका और रूस को रेलवे फ्रेट के मामले में पीछे छोड़ दिया। लेकिन कहानी सिर्फ़ माल ढोने तक ही लिमिटेड नहीं है। आज से दस पंद्रह साल पहले तक अगर आपके मन में मालगाड़ी का चित्र उकेरने को कोई कहता तो वही कोयला लदे हुए नीले वैगन आपके दिमाग़ में आते। 

अभी ये तस्वीर काफ़ी बदली है। रेलवे ने लोजिस्टिक्स को सही करने के लिए सबसे बड़ा कदम जो उठाया है, वह है डेडकेटेड फ्रेट कॉरिडोर्स। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर्स कैसे बने, इनमें कितना पैसा लगा, ये कहाँ से कहाँ तक जाते है, ये सब जानकारी अब काफ़ी पुरानी हो चुकी है, मैं आपको बताता हूँ कि इसका असर क्या है? 

2800 किलोमीटर से ज्यादा लंबे फ्रेट कॉरिडोर्स अब लगभग देश का 13% फ्रेट हैंडल करते हैं। रेलवे का डेटा कहता है कि डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर्स पर लगभग 400 ट्रेन्स रोज़ चलती हैं। और DFC पर चलने वाली फ्रेट ट्रेन्स बाक़ी मालगाड़ियों से एकदम अलग इसलिए भी हैं क्योंकि उनका टाइप और स्पीड दोनों कहीं अलग है।  

DFC पर चलने वाली फ्रेट ट्रेन्स की एवरेज स्पीड भी काफ़ी ज्यादा है। जहाँ एक कन्वेंशनल फ्रेट ट्रेन की स्पीड लगभग 25 से 30 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है, तो वहीं फ्रेट कॉरिडोर पर चलने वाली ट्रेन्स की स्पीड लगभग 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है, इससे फ्रेट जल्दी डिलीवर होता है। 

इन फैक्ट फ्रेट कॉरिडोर्स को कन्वेंशनल रेलवे के मुक़ाबले कहीं ज्यादा एडवांटेज हैं, यहाँ एक फ्रेट ट्रेन लगभग 4000 टन माल लेकर जाकर जाती है और कभी कभी ये नंबर 5000 भी पार हो जाता है। लेकिन कन्वेंशनल इंडियन रेलवे की लाइंस पर चलने वाली फ्रेट ट्रेन्स में ये नंबर 3000 के आसपास रहता है।  

DFC ने कैसे बदला लॉजिस्टिक्स का गेम 

अब इससे ये होता है कि कोई भी फ्रेट जल्दी डिलीवर होता है और इससे उसकी डिलीवरी कॉस्ट घटती है, और मैंने आपको ऊपर समझाया था कि ट्रेन से 1 टन माल मूव करना, रोड से माल मूव करने के मुक़ाबले लगभग आधा कॉस्ट करता है। तो जब किसी कारोबारी का फ्रेट टाइम पर भी डिलीवर होता है, तो वो सड़क छोड़ कर रेलवे पर शिफ्ट होता है। 

और मुझे ये बताने की जरूरत शायद नहीं है कि ये पूरा फ्रेट कॉरिडोर इसी सरकार के कार्यकाल में बना भी है, साल 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी तो फ्रेट कॉरिडोर के नाम पर पूरी ज़मीन तक अधिग्रहित नहीं हो सकी थी। लेकिन अब चाहे ईस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर हो या वेस्टर्न, दोनों शुरू हैं और लगातार माल ढो रहे हैं। 

इन दोनों कॉरिडोर्स ने भारत के लॉजिस्टिक्स के सीन में बड़े बदलाव लाए हैं, और इन्होंने ये राह भी दिखाई है कि आगे का हमारा भविष्य कैसा होने वाला है। लेकिन यहाँ एक बात हमें समझनी जरूरी होगी, डेडिकेटेड रेलवे का जहाँ मॉडर्न फ्रेट फेस है , तो वहीं अभी भी इंडियन रेलवे ख़ुद ही बड़े स्तर पर फ्रेट मूवमेंट करता है। 

इंडियन रेलवे में क्या बदला? 

और यहाँ भी पिछले 10-12 वर्षों में बड़े बदलाव हुए हैं। रेलवे ने अपने भी इंफ्रास्ट्रक्चर पर काफ़ी पैसा खर्च किया है और इससे लॉजिस्टिक्स में बड़ा इंप्रूवमेंट हुआ है। ये मैं आपको सैंडविच स्ट्रेटेजी की तरह समझाता हूँ। जैसे किसी सैंडविच के कई सारे लेयर्स होते हैं, उसी तरह रेलवे में भी फ्रेट मूवमेंट के कई सारे लेयर्स होते हैं। 

सबसे पहला लेयर होता है बेस यानी ट्रैक्स। मेरी और आपकी भाषा में कहें तो पटरियाँ। अगर पटरियाँ अच्छी हालत में नहीं हैं तो रेलगाड़ियाँ चलेंगी कैसे? अगर वो मजबूत नहीं हैं तो उन पर भारी भरकम ट्रैफिक कैसे मूव होगा? कैसे उन पर हाईस्पीड ट्रेन्स चलेंगी? 

डेटा कहता है कि साल 2014 के 54000 किलोमीटर ट्रैक को पूरी तरह रिन्यू कर दिया गया है। जहाँ 2014 तक देश का 60% रेलवे नेटवर्क 110 किलोमीटर प्रति घंटा से ऊपर की रफ़्तार की ट्रेन को नहीं झेल सकता था, तो आज देश का 81% नेटवर्क ऐसा है, जिस पर स्मूथली 130 किलोमीटर प्रति घंटा से ट्रेन्स चलाई जा सकती हैं। 

इन फैक्ट लगभग 23% नेटवर्क ऐसा है, जिस पर ट्रेन्स 130 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से भी तेज चलाई जा सकती हैं। लेकिन आप सोचेंगे कि फ्रेट ट्रेन्स को स्पीड की नहीं बल्कि मजबूती की जरूरत होती है, तो भला स्पीड बढ़ने से किसी फ्रेट ट्रेन को क्या फ़ायदा? 

इसका भी आंसर है मेरे पास! इन ट्रैक्स की सिर्फ़ स्पीड नहीं बधाई गई बल्कि इनमें नए 60 KG वाले, 90 UTS के रेल्स यूज हो रहे हैं। मैं समझ रहा हूँ कि ये बात आपको थोड़ी टेक्निकल जार्गन जैसी लगी होगी। ऐसे समझिए कि इस नई ट्रैक का हर एक मीटर 60 किलोग्राम का है, पहले ये 50 किलोग्राम के आसपास हुआ करता था। 

अब आते हैं 90 UTS पर! UTS का मतलब है यूनिक टेंसाइल स्ट्रेंथ! बेसिकली किसी रेलवे की पटरी का 1 स्क्वायर मिलीमीटर कितना भार झेल सकता है। अब नई रेल ट्रैक्स में 1 स्क्वायर मिलीमीटर लगभग 90 किलो का भार झल सकता है, इससे पहले ये 72 किलोग्राम पर मिलीमीटर स्क्वायर हुआ करता था। 

यानी अब रेल पटरी ज्यादा भार सह सकती है, ज्यादा भार आने पर जल्दी क्रैक नहीं होती, जल्दी वो घिसती नहीं! और इसके चलते फ्रेट ट्रेन्स ज्यादा माल लेकर मूव कर सकती हैं। लेकिन सिर्फ़ एक पटरी को मजबूत करने से काम नहीं चलता! मैसिव ट्रैफिक हैंडल करने के लिए आपको कई सारी पटरियाँ चाहिए होती हैं। 

अब आती है बारी मल्टी ट्रैकिंग की। अगर आपने पटरी मजबूत भी कर दी लेकिन पूरे रूट पर सिर्फ एक ही ट्रैक है तो आपका ट्रैफिक ही नहीं बढ़ पाएगा। इसीलिए हमेशा आपको मल्टीट्रैकिंग की जरूरत होगी। 

रेलवे ने साल 2014 से लेकर अब तक लगभग 15000 से लेकर 18000 किलोमीटर तक के ट्रैक्स डबल या मल्टी ट्रैक कर दिए हैं। इसका फायदा ये है कि अब आप उतनी ही दूरी में दोगुनी ट्रेंस चला सकते हो। ट्रेंस पैरलली एक दूसरे को क्रॉस कर सकती हैं, उन्हें किसी स्टेशन पर रुकने की जरूरत नहीं होती। – 

रेलवे का सैंडविच ओवरहॉल

मैने आपको दो लेयर्स बताए। अब आती है बारी बीच वाली यानी सबसे मेन लेयर की। ये लेयर है रोलिंग स्टॉक्स यानी डिब्बे और इंजन। ये डिब्बे और इंजन ही हैं जो मेन काम करते हैं और उन्हें बिना इंप्रूव किए कुछ नहीं होने वाला। 

इस फ्रंट पर अगर बात की जाए, तो साल 2014 से अब तक 2 लाख से ज्यादा नए मालगाड़ी वाले डिब्बे प्रोक्योर किए गए हैं। सिर्फ डिब्बे ही नहीं बल्कि WAG 12B और WAG D9 जैसे सुपर मॉडर्न और पावरफुल लोकोमोटिव्स भी रेलवे ने इंट्रोड्यूस किए हैं। ऐसे लगभग 2000 लोकोमोटिव्स ऑर्डर किए गए हैं, इनमें से लगभग 1000 अभी सर्विस में हैं। 

इनमें से एक साइमंस इंजीनियरिंग ने बनाया है तो दूसरे को अल्स्टॉम ने। यही नहीं बल्कि भारत ने खुद भी WAG 9 ट्विन जैसे इंजन डेवलप किए हैं, हे सारे लोकोमोटिव्स ज्यादा फ्रेट तेज स्पीड से ले जा सकते हैं। और सिर्फ़ लोकोमोटिव्स ही नहीं बल्कि वैगंस को भी अपग्रेड किया गया है। 

एक रिपोर्ट कहती है कि जहाँ 2004-14 के बीच हर साल 13,262 वैगन्स का उत्पादन हर साल होता था, तो अब यही नंबर 15875 हो चुका है। और साल 2024-25 में तो देश में 41000 से वैगन्स बने। 

यानी रेलवे को लगातार नए वैगन्स मिल रहे हैं और ये वैगंस हाई कैरियिंग कैपेसिटी के साथ भी आते हैं। यानी पहले जहाँ एक मालगाड़ी के डिब्बे में 60 टन तक माल लोड होता था, तो अब ये नंबर 80 टन हो चुका है। तो कुल मिलाकर पहले जितनी बड़ी ही मालगाड़ी अब ज्यादा फ्रेट लेकर जाती है। 

और इसके अलावा NMG रेक्स हों या स्पेशल कार्गो रेक्स! रेलवे ने अपना पूरा ढाँचा बंडल दिया है। साल 2014 में जब मोदी सरकार आई थी तो रेलवे ज्यादातर कोयला, सीमेंट, अनाज और फर्टिलाइजर जैसे लो रिस्क सामान ढोता था। आज रेलवे से कार्स भी ट्रांसपोर्ट हो रही हैं, आज रेलवे का फेस डबल स्टैक कंटेनर हैं। 

और मैंने आपको रेलवे के फ्रेट मूवमेंट को समझने के लिए सैंडविच का उदाहरण दिया था। मैंने आपको इस रेलवे के दो लेयर्स बताए। अब मैं आपको सबसे ऊपरी लेयर बताता हूँ और ये लेयर है ऑपरेशन। आप पटरियाँ अच्छी कर लीजिए, नए लोकोमोटिव्स बना लीजिए, नए वैगन्स बना लीजिए, लेकिन जब तक आपके ऑपरेशंस ठीक नहीं होंगे तब तक कुछ नहीं सुधरेगा। 

कैसे बदला रेलवे का फेस

रेलवे ने अपने ऑपरेशंस भी काफ़ी एफिशिएंट बनाए हैं। जैसे पहले अगर किसी कारोबारी को अपना माल रेलवे से भेजना हो तो उसे पूरी मालगाड़ी बुक करनी पड़ती, भले उसे जरूरत उसमें से सिर्फ़ 20 डिब्बों भर की हो। थोड़ी बहुत इसमें रिलैक्सेशन जो थी भी तो एकदम बिजनेस फ्रेंडली नहीं थी।

जैसे आपको एक सर्टेन डिस्टैंस तक ही मिनी रेल बुक करने दी जाएगी, आपको कितनी जगह माल उतारना है, इस पर भी बंदिशें रहेंगी। लेकिन अब ये भी बदला जा चुका है, कोई कारोबारी छोटी मालगाड़ी बुक करके कितनी भी दूर भेज सकता है और यही नहीं बल्कि उसमें से कौन सा माल कहाँ उतरना है ये भी डिसाइड कर सकता है। 

ऑपरेशंस मजबूत करने का बड़ा पार्ट होता है डिसीजन मेकिंग, पहले रेलवे में क्या कितना कैसे होगा, इस पर पूरी तरह दिल्ली में बैठे अधिकारी निर्णय लेते थे। लेकिन अब जोनल लेवल पर ही रेलवे का भाड़ा क्या होगा, ये अधिकारी तय कर सकते हैं और मार्केट से कम्पीट करने के लिए 30% तक का डिस्काउंट भी दे सकते हैं। 

बेसिकली इन सबसे रेलवे ने ऑपरेशनल एफिशिएंसी मजबूत की है और साथ ही गतिवाहन, किसान रेल जैसी स्पेसिफिक सेवाएँ चलाई हैं, जो किसी एक खास कमोडिटी को टाइम बाउंड मैनर में उनकी डेस्टिनेशन तक पहुँचाती हैं। रेलवे की ये बिजनेस फ्रेंडली एप्रोच उसे लोजिस्टिक्स फ्रेंडली बना रही है। 

और यहाँ पर ये जिक्र करना ग़लत नहीं होगा कि पहले जिस रेलवे को सिर्फ़ एक सरकारी पुरानी संस्था की तरह देखा जता था आज उसे एक ऑपरेशनल एफ़िएशिएंसी के साथ रन करने वाली एंटिटी की तरह देखा जा रहा है और इस ट्रांसफॉर्मेशन के पीछे मोदी सरकार और विशेष कर वर्तमान रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का भी बड़ा हाथ है। 

इस पूरे बदलाव का नतीजा ये है कि  रेलवे अब कहीं ज्यादा फ्रेट कैरी करती है और तेजी से करती है, इससे होता ये है कि लॉजिस्टिक्स की कॉस्ट घटती है और जो सामान पहले हम तक महँगा पहुँचता था, अब वो तेजी से पहुँचता है और उसको मूव करने में कम कॉस्ट आती है और मैंने आपको जो इनविजबल डिस्काउंट की बात शुरू में बताई थी, वो इनेबल हो पाता है। 

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