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वीर सावरकर: क्रांतिकारी, साहित्यकार और समाज सुधारक – भारत रत्न के योग्य क्यों?

Summary
1857 की क्रांति को ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ के रूप में स्थापित करने से लेकर हिंदू समाज में छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष तक, सावरकर का जीवन राष्ट्र के लिए निरंतर बलिदान की गाथा है। यह लेख इसी प्रश्न की गहन पड़ताल करता है कि आखिर क्यों वीर सावरकर भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ के सबसे प्रबल और उपयुक्त दावेदार हैं।

2 जून 1963 की घटना है। भारत के राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कार्यालय में भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का एक पत्र भेजा गया। उस पत्र में यह लिखा था, कि Dear President, आपने मुझे पत्र भेजा था, कि आप एक व्यक्ति को भारत रत्न देने जा रहे हैं। मेरी यह अनुशंसा है कि आप उस व्यक्ति को भारत रत्न न दें, क्योंकि वह व्यक्ति भले ही अपने जीवन में अच्छे काम किए हों, लेकिन वह व्यक्ति एक कंट्रोवर्शियल फिगर है।

राष्ट्रपति राधाकृष्णन जिस व्यक्ति को भारत रत्न देना चाह रहे थे और नेहरू उस व्यक्ति को कंट्रोवर्शियल फिगर कहकर भारत रत्न देने से रोक रहे थे, उस व्यक्ति का नाम था विनायक दामोदर सावरकर। यदि मैं आपसे पूछूँ, कि इतिहास क्या है? तो अकादमिक स्तर पर आप यही जवाब देंगे कि इतिहास अतीत की घटनाओं का संकलन है। लेकिन वैचारिक स्तर पर देखें तो इतिहास एक भट्टी है।

वह भट्टी, जिसमें मनुष्य की मिट्टी पकती है। कुछ लोग होते हैं, जो स्वयं को इस भट्टी में झोंक देते हैं, तपते हैं, जलते हैं, और एक दीप्तिमान प्रतिमा की तरह निकलते हैं। किसी भी राष्ट्र का यह कर्तव्य है कि वह अपने इतिहास की भट्टी में तप करने के लिए उन दीप्तिमान प्रतिमाओं को पहचाने और उन्हें यथोचित सम्मान दें। भारत भूमि रत्नगर्भा है। इस धरती ने हमें कई रत्न दिए हैं। उनमें से एक रत्न विनायक दामोदर सावरकर हैं। जब आधुनिक भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न देने की बात की जाती है, तो एक पूरा इकोसिस्टम इसके विरोध में खड़ा हो जाता है।

इस लेख में हम यही जानने का प्रयास करेंगे कि सावरकर कौन थे और क्यों भारत रत्न के लिए वह एक योग्य उम्मीदवार हैं?कोई भी व्यक्ति सावरकर के विचारों से सहमति या असहमति रख सकता है। किंतु इस बात में रंच मात्र भी संदेह नहीं है कि सावरकर एक स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जो प्रयास किए, उन प्रयासों का यदि आप निष्पक्ष भी आकलन करें तो आपको पता चल जाएगा कि सावरकर भारत रत्न के लिए क्यों उपयुक्त हैं।

भारत रत्न के बारे में हम सभी जानते हैं कि यह एक पुरस्कार है जो प्रधानमंत्री की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा किसी भारतीय या विदेशी नागरिक को प्रदान किया जाता है। और इसके लिए योग्यता यह है कि यदि किसी व्यक्ति ने कला, साहित्य, विज्ञान और समाजसेवा जैसे क्षेत्रों में असाधारण सेवा प्रदान की हो, तो उसे भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। साहित्य, कला, विज्ञान और समाज सेवा, इन चारों क्षेत्रों में से यदि आप विज्ञान को हटा दें, और साहित्य, कला तथा समाज सेवा के आधार पर ही सावरकर के कार्यों का आकलन करें, तो आपको पता चलेगा कि सिर्फ किसी एक योग्यता पर नहीं, बल्कि तीनों ही योग्यताओं पर सावरकर को भारत रत्न दिया जा सकता है।

सबसे पहले हम कला और साहित्य की बात करते हैं। आमतौर पर सावरकर को एक साहित्यकार के रूप में नहीं देखा जाता। उन्होंने 1857 की क्रांति को देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताते हुए एक पुस्तक लिखी, जिनके ओजस्वी शब्दों से भगत सिंह समेत अनेक क्रांतिकारी प्रभावित हुए।इस पुस्तक के महत्व के बारे में यों समझ लें कि जो महत्व रूसो की Social Contract का फ्रेंच क्रांति में है, जो महत्व ‘दास कैपिटल’ का Communist revolution में है, जो महत्व ‘कॉमन सेंस’ पुस्तक का अमेरिकन क्रांति में है, वही महत्व इस पुस्तक का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में है।

यह वह पुस्तक थी, मूलतः मराठी में लिखी हुई, “अठारह सौ सत्तावन का स्वातंत्र्य समर” जो बहुत जल्द अंग्रेजी में, The Indian War of Independence of 1857 के रूप में अनुवादित हो गई। यह पहली पुस्तक थी जिसे प्रकाशित होने से पहले बैन कर दिया गया।

पुस्तक के तीन संस्करण विदेशों में छपे। पहला हॉलैंड में। दूसरा मैडम भीकाजी कामा द्वारा पेरिस में और तीसरा गदर पार्टी और लाला हरदयाल जी द्वारा अमेरिका में। चौथा संस्करण भारत में सरदार भगत सिंह ने गुप्त रूप से छपवाया। उस दौर में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के जितने भी क्रांतिकारियों के यहाँ छापे पड़े, सब जगह यह पुस्तक बरामद हुई। रासबिहारी बोस और सुभाषचंद्र बोस ने इसका एक संस्करण जापान में छपवाया।

इसी पुस्तक ने झाँसी की रानी की वीरता के बारे में जो बताया, उसका इतना प्रभाव हुआ था कि लोग अपनी कन्या का नाम लक्ष्मीबाई रखने लगे थे। उस दौर की किसी भी पुस्तक को इतना प्रेम नहीं मिला। साहित्य के क्षेत्र में यह सावरकर का ही योगदान था कि हम 1857 की क्रांति को सिर्फ एक सिपाही विद्रोह न मानकर देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम मानते हैं।

सावरकर ने छह स्वर्णिम युग जैसी कृतियों की रचना की, जिसने भारतीय इतिहास को स्वदेशी दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित किया। मेजिनी पर लिखी उनकी पुस्तक, जो भारत के बाहर लिखी गई पहली मराठी पुस्तक मानी जाती है, वह उनके वैश्विक बौद्धिक दृष्टिकोण को दर्शाती है। संन्यासी खड्ग, मला काय त्याचे और मलाबार में हिंदुओं का नरसंहार (मोपला मुसलमानों द्वारा) जैसी उनकी रचनाएँ अमर हो गईं।

इसके अतिरिक्त, आज के समय में हमारे सामने कई ऐसे अंग्रेजी शब्द हैं, जिनका हिंदी अनुवाद हम नहीं कर पाते हैं। साहित्य की सांस्कृतिक धरोहर होने के बावजूद एक तथ्य यह भी है कि ब्रिटिश उपनिवेश के परिणामस्वरूप हमें कई शब्द या तो अंग्रेजी भाषा में मिले या फिर फ्रेंच भाषा से, जिनके हिंदी शब्द हमारे पास उपलब्ध नहीं थे। यहाँ पर सावरकर ने एक और भूमिका निभाई।

प्रसिद्ध मराठी साहित्यकार पी. एल. देशपांडे के सेलुलर जेल प्रवास पर लिखते हुए प्रेम वैद्य ने तो यहाँ तक लिखा है, कि पी. एल. देशपांडे सावरकर को कई हिंदी शब्दों का भी जनक मानते थे। ये प्रेम वैद्य वही हैं जिन्होंने पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई है।

प्रेम वैद्य के अनुसार, सावरकर भले ही मूल रूप से हिंदी भाषी नहीं थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने टीवी के लिए ‘दूरदर्शन’, रेडियो के लिए ‘आकाशवाणी’, एडवरटाइजमेंट के लिए ‘विज्ञापन’, तारीख के लिए ‘दिनांक’, वीकली के लिए ‘साप्ताहिक’, मेयर के लिए ‘महापौर’, म्युनिसिपेलिटी के लिए ‘नगरपालिका’, तथा शहीद के लिए ‘हुतात्मा’ जैसे शब्द दिए। कुछ स्रोतों से यह भी जानकारी मिलती है कि पत्रकारिता में Editor के लिए ‘संपादक’ शब्द भी सावरकर ने ही दिया था। आज यदि सावरकर जीवित होते, तो शायद हमें सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर नहीं बोलना पड़ता, इसके बदले में भी वह कोई ना कोई हिंदी शब्द हमें दे देते।

जब वीर सावरकर के साहित्य की बात हो रही है, तो भला उनकी एक कृति को कैसे छोड़ा जा सकता है। सावरकर ने Hindutva: Who is a Hindu? नामक एक रचना की। उसमें उन्होंने हिंदुत्व और हिंदू का अर्थ बताया।सावरकर के लिए ‘हिंदुत्व’ और Hinduism को एक नहीं मानते थे। यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज के समय में अक्सर इन दोनों को एक ही समझ लिया जाता है।

सावरकर हिंदुत्व को एक सांस्कृतिक-राष्ट्रीय पहचान के रूप में परिभाषित करते हैं। उनके अनुसार, हिंदुत्व वह तत्व है जो हिंदुओं को एक रक्त-समुदाय (जाति) और एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में जोड़ता है। वह हिंदुत्व को हिंदू धर्म की ढाल मानते थे। आज के दौर में जब राहुल गांधी द्वारा हिंदूइज्म और हिंदुत्व के बीच अलग-अलग परिभाषाएं घुसाने की कोशिश की जाती है, उस दौर में यह पढ़ना भी बेहद जरूरी है कि जिस व्यक्ति ने हिंदुत्व को राजनीतिक पटल पर लाकर खड़ा किया, उस व्यक्ति के हिंदुत्व को लेकर क्या विचार थे?

सावरकर ने भारत के साहित्य को न सिर्फ राजनीतिक बल्कि बौद्धिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत समृद्ध किया। कैसे विचार दिए जो न सिर्फ उस समय बल्कि आज के जमाने में भी उतने ही प्रासंगिक हैं।देश के गिने-चुने साहित्यकारों ने ही साहित्य को इस तरह से समृद्ध किया होगा, जिस तरह सावरकर ने किया। केवल साहित्य और कला के क्षेत्र में ही उनके द्वारा किए गए कार्यों की यदि समीक्षा की जाए तो, वो महानतम लेखकों की पंक्ति में सबसे आगे खड़े मिलेंगे। सिर्फ साहित्य और कला के क्षेत्र में ही उनके योगदानों के लिए उन्हें भारत रत्न दिया जा सकता है।

कला-साहित्य के क्षेत्र के अलावा, आइए हम समाज सेवा क्षेत्र में सावरकर के किए गए कार्यों का आकलन करते हैं।भारतीय इतिहास में समाज-सुधार को प्रायः संतों-सन्यासियों तथा कुछ विशेष जातिगत नेताओं से जोड़कर देखा जाता है। समाज सुधार जैसे गंभीर विषय पर सावरकर का तो नाम भी नहीं लिया जाता, जबकि यह एक गंभीर ऐतिहासिक त्रुटि है। विनायक दामोदर सावरकर न केवल क्रांतिकारी थे, बल्कि वे आधुनिक भारत के सबसे साहसी और व्यावहारिक समाज-सुधारकों में भी शामिल थे।

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और मोहनदास करमचंद्र गांधी से भी पहले भारत समाज के कुछ तबकों में मौजूद छुआछूत के विरुद्ध सावरकर ने आवाज उठाई थी। सावरकर ने रत्नागिरि में पतित पावन मंदिर और पाटणकरोष्ट्र सभा की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य जातीय भेदभाव को मिटाना था। उन्होंने विशेष रूप से “अस्पृश्यता” के विरुद्ध अभियान चलाया। 1929 में ही उन्होंने रत्नागिरि के पंचायतन मन्दिर में सभी हिंदुओं, चाहे वे किसी भी जाति के हों, के प्रवेश के लिए सत्याग्रह किया। उन्होंने सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की, जहाँ सभी जातियों के लोग एक साथ बैठकर पूजा-अर्चना करते थे।

सावरकर ने नियमित रूप से पानी-पाटी आयोजन यानी सामुदायिक भोज का आयोजन किया, जहाँ सभी जातियों के लोग एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते थे। आप सोचिए, यह कितना क्रांतिकारी कदम रहा होगा।उन्होंने विधवा-पुनर्विवाह का समर्थन किया, स्त्रियों की शिक्षा पर जोर दिया, वो भी उस दौर में जब यह सारी चीजें असामान्य थीं। सावरकर के इन सामाजिक कार्यों का उद्देश्य हिंदू समाज को मजबूत और एकजुट करना था, ताकि हिंदू समाज, ब्रिटिश शासन और अन्य मजहबी समुदायों के सामने एक सशक्त इकाई के रूप में खड़ा हो सके।

भारत के किसी भी सामाजिक सुधारक ने इतनी दृढ़ता से समाज सुधार पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं किया जितना सावरकर ने किया। अब तक मैंने आपको जो तर्क दिए वह इस आधार पर दिए कि सावरकर के कार्य क्यों उन्हें भारत रत्न के हकदार बनाते हैं। अब कुछ ध्यान इस तथ्य पर भी देना जरूरी है कि भारत रत्न किन-किन को मिल चुका है, और वह लोग सावरकर के मुकाबले कहाँ ठहरते हैं। पहले तो मैं यह फैक्ट एक बार फिर से आपको दोहरा दूँ, कि भारत रत्न प्रधानमंत्री की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है।

इस देश में कैसे प्रधानमंत्री भी हुए जिन्होंने खुद को ही भारत रत्न के लिए अनुशंसित कर दिया। और मैं बिल्कुल नहीं बताऊंगा, कि उनका नाम पंडित जवाहरलाल नेहरू था। आप खुद सोचिए नेहरू ने, कला, साहित्य, विज्ञान, और समाज सेवा इनमें से किस क्षेत्र में उत्कृष्ट के आधार पर खुद को भारत रत्न दिया? नेहरू, सावरकर के मुकाबले ना तो अच्छे साहित्यकार थे और ना ही समाज सेवक।

यदि सिर्फ प्रधानमंत्री होने के कारण उनका भारत रत्न दिया गया, तो इस हिसाब से तो भारत के हर प्रधानमंत्री को भारत रत्न मिलना चाहिए। बहरहाल यहां मैं नेहरू और सावरकर की तुलना नहीं करना चाहता। वैचारिक रूप से सावरकर नेहरू के समक्ष सदैव उतने ही ऊंचे नजर आएंगे, जितना शिवालिक के समक्ष महान हिमालय नजर आता है।

नेहरू की ही परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने भी खुद को भारत रत्न के लिए अनुशंसित किया। प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए, “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है,” जैसे गैर जिम्मेदाराना बयान देने वाले राजीव गांधी को भी भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बोफोर्स जैसे घोटालों में उनके योगदान को तो भूल ही जाएँ।

भोपाल गैस त्रासदी का समर्थन करने वाली, करोड़ों रुपए की हेरा फेरी तथा जबरन धर्म परिवर्तन करने वाली मदर टेरेसा तक को भारत रत्न से सम्मानित किया गया।एक तरफ ये लोग हैं, दूसरी तरफ सावरकर हैं। भारत के एकमात्र ऐसे स्वतंत्रता सेनानी, जिनको एक ही जीवन में दो बार काला पानी की सजा दी गई थी। जो ब्रिटिश सरकार के लिए भारत के दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों से कहीं ज्यादा खतरनाक थे। कोल्हू से तेल निकालने का काम जो बैल किया करते थे, सेलुलर जेल में जिस सावरकर से वह काम करवाया गया था। जिन्हें जेल में एक गंदे छोटे कमरे में रखा गया, वहाँ भी शौच के लिए सिर्फ एक मिट्टी का कटोरा दिया जाता था।

ऐसी नारकीय यातना उस व्यक्ति ने 10 साल पोर्ट ब्लेयर में सही थी। किसके लिए सही होगी उन्होंने यह यातना? इस राष्ट्र के लिए, और हमारे लिए उन्होंने सब कुछ सहा। तो हमारा कर्तव्य क्या बनता है? अब वह समय आ गया है कि राष्ट्र, अपने उस अमर बलिदानी को उसके सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत करके, अपना ऐतिहासिक ऋण चुकाए।

आज देश के अलग-अलग क्षेत्र से अलग-अलग बुद्धिजीवियों के द्वारा वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग उठ रही है। और इस तरह के स्वर सिर्फ आज ही नहीं उठ रहे, बल्कि वर्षों से इस देश के बुद्धिजीवियों ने सावरकर को भारत रत्न देने की माँगें उठाई हैं। जब देश ने विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए अनेक हस्तियों को यह सम्मान दिया है, तो भारतीय इतिहास के इस ध्रुवतारे को यह गौरव प्रदान क्यों नहीं किया जा सकता। देश को, हमारी सरकारों को इस दिशा में सोचने की जरूरत है।

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