bulleshah report

मसूरी में बाबा बुल्ले शाह मजार पर तोड़फोड़: ग्राउंड रिपोर्ट – अवैध निर्माण का विवाद और स्थानीय आक्रोश

Summary
तीस साल पहले स्कूल की जमीन पर बनी थी मजार, अब मुसलमान बता रहे सौ साल पुरानी बुल्ले शाह दरगाह। स्थानीय निवासी ने बताई पूरी कहानी, कहा: “हिंदू बाबा के नाम पर शुरू की गई थी दरगाह, धीरे-धीरे मुस्लिमों ने जमाया कब्जा”

देवभूमि उत्तराखंड की पर्यटन नगरी मसूरी के बाला हिसार इलाके में एक गंभीर घटना सामने आई है, जिसने धार्मिक सौहार्द पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वाइनबर्ग-एलेन स्कूल की निजी जमीन पर बनी बाबा बुल्ले शाह की मजार को कुछ लोगों ने क्षति पहुंचाई। हथौड़े और सब्बल लेकर आए असामाजिक तत्वों ने मजार परिसर में तोड़फोड़ की।

घटना की सूचना मिलते ही बाबा बुल्ले शाह समिति और स्थानीय लोग मौके पर पहुंचे। मजार की हालत देखकर लोगों में भारी आक्रोश है। समिति का कहना है कि यह सिर्फ तोड़फोड़ नहीं, बल्कि भाईचारे पर हमला है।

मजार का मामला क्या है?

पिछले रविवार (24 जनवरी 2026) की शाम को मसूरी के टिहरी बाईपास रोड के पास घने जंगल में स्थित इस विवादित मजार पर कुछ हिन्दुओं ने नाराजगी प्रकट की। आक्रोशित भीड़ ने मजार के अंदर घुसकर कुछ तोड़फोड़ की। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला सुर्खियों में आया।

पुलिस ने शिकायत पर तीन नामजद (हरिओम, शिवयून, श्रद्धा) और 25-30 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। आरोप भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और पूजा स्थल को अपवित्र करने से संबंधित हैं। अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है, क्योंकि धाराएं जमानती हैं।

मजार वाइनबर्ग-एलेन स्कूल की निजी जमीन पर बनी बताई जा रही है। स्कूल प्रशासन ने कोई शिकायत नहीं की। और अब ये भी बताया जा रहा है कि स्कूल को इस मजार को हटाए जाने से भी कोई आपत्ति नहीं है

बाबा बुल्ले शाह मजार का इतिहास और सवाल

बाबा बुल्ले शाह एक सूफी शायर थे, जिनकी असली मजार पाकिस्तान के कसूर में है (1700 के आसपास निधन)। मसूरी में यह मजार कैसे बनी? फंडिंग कहां से आती है? बसावट की अनुमति किसने दी?

हम खुद मौके पर पहुंचे तो देखा कि घने जंगलों के बीच यह मजार काफी विस्तृत है – पानी का टैंक, बिजली, कारपेट, सुंदर सीढ़ियां आदि सुविधाएं मौजूद हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह 30-50 साल पुरानी हो सकती है, जबकि कुछ इसे 100 साल पुरानी बताते हैं।

स्कूल करीब 150 साल पुराना है। मजार स्कूल की जमीन पर है, और पहले यह जगह अलग थी। कुछ लोगों के अनुसार, 90 के दशक में सपने में बाबा के दर्शन के बाद मजार बनी। कोई ठोस दस्तावेज नहीं मिला। एमडीडीए से आरटीआई में भी कोई जानकारी नहीं मिली।

स्थानीय लोगों की राय और सांस्कृतिक पहलू

मजार के आसपास रहने वाली एक स्थानीय हिंदू महिला निधि बहुगुणा ने बताया कि मजार समय के साथ फैली। शुरू में थोड़ी जगह दी गई, लेकिन अब विस्तार हो गया।

यहां हिंदू बहुसंख्यक हैं। मजार में भंडारे होते हैं – कढ़ी-चावल, पूरी-आलू आदि। 99% श्रद्धालु हिंदू हैं। कमेटी में हिंदू सदस्य भी हैं, जो लक्ष्मी-नारायण मंदिर आदि में भी सक्रिय हैं। कई लोग इसे ‘बाबा’ मानकर मन्नत मांगते थे, बिना यह जाने कि यह मुस्लिम सूफी गायक की मजार है।

हाल की घटना के बाद लोगों में जागरूकता आई है। कुछ का कहना है कि यह ‘कल्चरल रिवाइवल’ है, जबकि अन्य इसे सांप्रदायिक सद्भाव पर हमला मानते हैं।

उत्तराखंड में अवैध मजारों का मुद्दा

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अवैध मजारों पर कार्रवाई की है – 11,000 एकड़ जमीन मुक्त कराई और 500+ मजारें समतल की गईं। लोग जल, जंगल, जमीन की रक्षा और सख्त भूमि कानून की मांग कर रहे हैं।

मसूरी जैसे हिल स्टेशनों में मजारें ‘फ्रेंचाइजी मॉडल’ की तरह फैल रही हैं – सड़क किनारे, स्कूल-अस्पताल के पास। यह डेमोग्राफिक बदलाव और भूमि अतिक्रमण का सवाल उठाता है।

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