तमिलनाडु में थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी को लेकर हिन्दू-मुस्लिम विवाद

Summary
इस शांत तीर्थस्थल पर विवाद तब शुरू हुआ, जब कुछ मुस्लिम पक्षों ने दावा किया कि पहाड़ी पर सिकंदर बधुशा की दरगाह है। सिकंदर बधुशा वही इस्लामी आक्रांता था, जिसने मद्रास क्षेत्र में इस्लाम फैलाने के नाम पर कई मंदिरों को नष्ट किया था।

यह कहानी है तमिलनाडु की थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी की, एक पवित्र स्थल, जिसे शिवलिंग जैसी आकृति और भगवान मुरुगन व देवसेना के विवाह-स्थल के रूप में जाना जाता है। यहाँ भगवान मुरुगन का एक अत्यंत पूजनीय मंदिर भी स्थित है। इस शांत तीर्थस्थल पर विवाद तब शुरू हुआ, जब कुछ मुस्लिम पक्षों ने दावा किया कि पहाड़ी पर सिकंदर बधुशा की दरगाह है। सिकंदर बधुशा वही इस्लामी आक्रांता था, जिसने मद्रास क्षेत्र में इस्लाम फैलाने के नाम पर कई मंदिरों को नष्ट किया था। जबकि तमिलनाडु सरकार की वेबसाइट के अनुसार, उसकी दरगाह कहीं और स्थित है।

इस दावे के आधार पर मुस्लिम समुदाय ने पहाड़ी को अपनी सम्पत्ति बताना शुरू किया। मामला ब्रिटिश काल में अदालत तक गया, जहाँ लंदन की प्रिवी काउंसिल ने स्पष्ट कर दिया कि यह पूरी पहाड़ी हिन्दू सम्पत्ति है। लेकिन फैसला आने के बाद भी, विवाद खत्म नहीं हुआ।

साल 2024 में फिर से विवाद तब भड़का जब मुस्लिम समुदाय ने दरगाह पर जानवर काटकर भोज आयोजित करने की योजना बनाई, वो भी साम्प्रदायिक सौहार्द के नाम पर। हिन्दू समुदाय ने इसका विरोध किया, और मामला कोर्ट पहुँचा।

कोर्ट की बेंच तक बँट गई, एक जज ने कहा यह प्रथा परंपरागत नहीं है और इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती, जबकि दूसरी जज ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता बताया और पहाड़ी पर जानवर काटने की अनुमति दिए जाने की बात कही।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक सवाल खड़ा कर दिया, क्या हिन्दू आस्था को बार-बार ऐसे ही अपवित्र किया जाएगा? क्या पवित्र स्थलों के आस-पास जबरन दरगाहें बनाकर और फिर धार्मिक टकराव की स्क्रिप्ट लिखकर, हिन्दू संस्कृति को कमजोर करने की कोशिश जारी रहेगी?

थिरुपरनकुंद्रम की यह कहानी, आज के भारत में आस्था, राजनीति और पहचान के टकराव की प्रतीक बन चुकी है।

विवाद की पृष्ठभूमि

ऐसा कहा जाता है कि भारत नदियों और पर्वों का देश है। इस बात में सच्चाई भी है। हमारी नदियों ने न जाने कितनी सभ्यताओं को अपनी आंचल की छाँव में पाला है। ठीक उसी तरह इस देश के त्यौहारों ने न जाने कितनी लंबी विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित किया है। लेकिन इन तमाम विचारों के बीच में एक चीज यह भी सत्य है कि भारत मंदिरों का देश भी है।

भारत के मंदिर केवल पत्थरों से बनी हुई इमारतें नहीं हैं, वे मनुष्य की आत्मा और परमात्मा के बीच एक पुल के रूप में कार्य करती हैं। हमारे यहाँ मंदिर वह स्थान है, जहाँ ईश्वर को देखा नहीं, बल्कि महसूस किया जाता है।

भारत का कोई ऐसा कोना नहीं, जहाँ मंदिर न हों। हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर कन्याकुमारी के समुद्र तट तक, थार के मरुस्थल से लेकर मेघालय के वर्षा-वनों तक, हर जगह आपको मंदिर देखने को मिलेंगे।

हमारे यहाँ मंदिर इसलिए पूज्य नहीं है, क्योंकि उसमें कोई पत्थर की मूर्ति स्थापित की गई है, बल्कि हमारे मंदिर इसलिए पूज्य माने जाते हैं, क्योंकि उस पत्थर में हमने प्राण प्रतिष्ठा की है। यहाँ ईश्वर को गढ़ा नहीं जाता, उन्हें आमंत्रित किया जाता है, मंत्रों से, साधना से……आस्था से।

हमारे यहां जब कोई व्यक्ति मंदिर जाता है तो वह कहने को भले ही बाहर जाता है, लेकिन वास्तव में वह अपने अंदर आ रहा होता है।

अगर भारत पूरी दुनिया में सांस्कृतिक दृष्टि से अपना एक विशिष्ट महत्व रखता है तो उसके पीछे हमारे मंदिर जिम्मेदार हैं। इसलिए भारत को सांस्कृतिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाली शक्तियों ने हमेशा से हमारे मंदिरों को निशाना बनाया है।

भारत में जब इस्लामी आक्रमणकारी आए, तो उन्होंने सिर्फ सेनाओं से युद्ध नहीं किया। उन्होंने हमेशा मंदिरों पर आक्रमण किया। उन्हें पता था कि जब तक मंदिर खड़े हैं, तब तक सनातन का ध्वज लहराता रहेगा। जब तक उस मंदिर में घंटियां बज रही हैं, तब तक उसकी आवाज हिंदुओं को जगाती रहेगी। इसलिए पहला वार हमेशा मंदिरों पर हुआ।

 आपको क्या लगता है महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को क्यों तोड़ा? उसे सिर्फ पैसा चाहिए था?

आपको क्या लगता है औरंगज़ेब ने काशी विश्वनाथ की मूर्तियों को तोड़कर उससे सीढ़ियां क्यों बनवाई, औरंगजेब को क्या आर्किटेक्चर का शौक चढ़ा था?

इनलोगों ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि इनको पता था, कि जब तक मंदिर जीवित हैं, तब तक भारत और इसकी संस्कृति जीवित है।

यह सनातन का दुर्भाग्य ही है, कि आज भी उस पर हो रहे हमले रुक नहीं रहे। आज भी इस देश में मंदिरों को निशाना बनाया जा रहा है। और इस बात के तो वैसे लाखों उदाहरण हैं, लेकिन आज मैं आपके सामने एक ऐसा मुद्दा लेकर आया हूँ, जिसे mainstream मीडिया में उतनी जगह नहीं दी गई।

तमिलनाडु के मदुरै जिले में एक पहाड़ी है, थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी। इस पहाड़ी पर एक मंदिर है, जिसकी बात मैं अभी करूँगा, लेकिन पहले आप इस पहाड़ी की आकृति देखिये। यह पहाड़ी दिखने में ही शिवलिंग जैसी है। इसलिए इस पूरी पहाड़ी को बड़ा ही पवित्र माना जाता है। इस पहाड़ी काजिक्र आज से 2300 साल पहले हुए संगम काल के साहित्य में भी आता है। कुछ लोग इस पहाड़ी को स्कन्द मलाई कहते हैं, तो वहीं कुछ लोग इसे थिरुपरनकुंद्रम hill कहते हैं।

इसी पहाड़ी पर भगवान मुरुगन का एक मंदिर है। वैसे तो इस मंदिर की स्थापना 8वीं शताब्दी में पांड्य वंश द्वारा की गई थी। लेकिन मंदिर जहाँ पर स्थापित किया गया, ऐसा माना जाता है कि उसी स्थान पर जहाँ भगवान मुरुगन और इंद्र की पुत्री देवसेना का विवाह हुआ था। शिवलिंग के आकर की पहाड़ी होने के कारण और भगवान मुरुगन का दिव्य स्थान होने के कारण इस पहाड़ी को लेकर हिन्दुओं के मन में बड़ी श्रद्धा है।

लेकिन हिन्दू इस देश में शांति से अपनी श्रद्धा का निर्वाह करते जाए, ऐसा भला कैसे होने दिया जा सकता है?

उस पहाड़ी के ऊपर भी एक दरगाह बना दी गई है, और उस दरगाह के आधार पर पूरी पहाड़ी को ही मुसलमानों के द्वारा claim किया जा रहा है।

मैं ताजा विवाद पर तो आऊंगा ही लेकिन उससे पहले मैं इसकी जड़ों के बारे में आपको बता दूं।

विवाद क्या है?

स्कंदमलाई यानी कि यह जो पहाड़ी है, इसके नीचे एक बड़ा प्रसिद्ध मंदिर है। सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर। इस मंदिर के पास से पहाड़ी के ऊपर एक सीढ़ी जाती है। और वह सीढ़ी जाती है, सीधे भगवान मुरुगन के मंदिर के पास। लेकिन बीच पहाड़ी परदाहिनी ओर एक दरगाह है। ये लोग इस दरगाह को सिकंदर दरगाह के नाम से पुकारते हैं। मुसलमानों के द्वारा यह दावा किया जाता है कि यह दरगाह 12वीं शताब्दी के एक सुल्तान सैयद सिकंदर बधुशा की है।

आपलोग सोच रहे होंगे कि ये सिकंदर बधुशा कौन है, और आखिर इसके साथ मदुराई के मुस्लिमो का क्या रिश्ता है कि वो हिन्दुओं की आस्था तक को चोट पहुँचा रहे हैं?

दरअसल सुल्तान सैयद सिकंदर बधुशा, सऊदी अरब के एक शहर जेद्दा का गवर्नर था, जो भारत में खासकर तमिलनाडु के क्षेत्रमें इस्लाम फैलाने के उद्देश्य से सैयद इब्राहिम शाहिद के साथ आया था। बाद में वह मद्रास पर राज करने लगा और पूरे मद्रास क्षेत्र में इस्लाम फैलाने के उद्देश्य से उसने अनेक हिंदू मंदिरों को तोड़ा।

बाद में विजयनगर साम्राज्य के राजाओं के साथ सिकंदर बादुशा का युद्ध हुआ और उसमें विजयनगर के राजाओं ने सिकंदर वध का वध कर दिया और फिर मदुरई के उस क्षेत्र में हिन्दू अधिकार पुनर्स्थापित हुआ।

जिस सिकंदर बादुशा को विजयनगर के राजाओं ने युद्ध में मार दिया था। मुसलमानों का यह दावा है कि उसी सिकंदर बादुशा की दरगाह स्कंदमलाई पर स्थित है। और इसी दावे के आधार पर मुसलमान उस पूरी स्कंध मलाई को सिकंदर मलाई कहकर पुकारते हैं।

हालांकि इस घटना में एक मोड़ यह भी है कि तमिलनाडु सरकार के पर्यटन मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार सिकंदर बादुशा की दरगाह स्कंदमलाई पर नहीं बल्कि गोरीपलायम में है, जो पहाड़ी से कई किलोमीटर दूर है।

तो अब यहां पर पहला प्रश्न तो यह उठता है कि जिहादी मानसिकता के यह लोग जिस व्यक्ति की दरगाह के नाम पर पूरी पहाड़ी पर अपना दावा कर रहे हैं, उस व्यक्ति की दरगाह तो वहां पर है ही नहीं। तो फिर यह दावा क्यों किया जा रहा है?

और दूसरा प्रश्न यह उठता है कि जिस सिकंदर बधुशा के नाम पर हिंदुओं की एक पवित्र पहाड़ी पर दावा किया जा रहा है वह सिकंदर मधुशा कभी भारत का था ही नहीं। वह तो सऊदी अरब के एक शहर का गवर्नर था, जिसे ज़बरदस्ती भारत पर थोप दिया गया था।

यह तो वह पूरा इतिहास है जो अब तक आपने समझा। अब मैं आपको कनफ्लिक्ट बताता हूं कि असल में भारत की संस्कृति के खिलाफ यह एक तरफ युद्ध कैसे लड़ा जा रहा है।

1917 के आसपास जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था। तो उस समय मुस्लिम समुदाय, दरगाह के पास एक सराय बनाने लगा। जब मुरुगन मंदिर ने इस पर आपत्ति जताई तो यह मामला कोर्ट में गया। 1923 में मद्रास हाई कोर्ट ने मंदिर के पक्ष में अपना फैसला सुनाया। अंग्रेजों के समय में  सुप्रीम कोर्ट लंदन में हुआ करता था, जिसे प्रिवी काउंसिल के नाम से जाना जाता था। केस हारने के बाद मुस्लिम समुदाय इस मामले को लंदन के प्रिवी काउंसिल तक लेकर गया। लेकिन प्रिवी काउंसिल ने भी मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाते हुए पूरी पहाड़ी को हिंदू क्षेत्र घोषित किया। कोर्ट ने यह माना कि मंदिर ही पहाड़ी का मालिक है।

सिर्फ प्रिवी काउंसिल के निर्णय में ही नहीं बल्कि इस निर्णय से भी 50 साल पहले 1881 में तमिलनाडु के भूमि रजिस्ट्रार में पहाड़ी को हिंदुओं की ही संपत्ति माना गया था। यहां तक की भारत सरकार की पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भी पहाड़ी को थीरुपरमकुंड्रम ही कहा है, कहीं पर भी यह जिक्र नहीं है कि इस पहाड़ी का नाम सिकंदर मलाई है।

1931 में जो फैसला आया उसके बाद भी लगातार मुस्लिम समुदाय द्वारा इस फैसले का विरोध किया गया कहीं भी इस फैसले को नहीं माना गया। कई बार so called दरगाह के आसपास के क्षेत्रों को तथा पहाड़ी को नुकसान पहुंचाने का काम किया गया। जैसे-तैसे सब कुछ चल रहा था, क्योंकि हिंदू सहिष्णु होते हैं। हिन्दुओं ने उनसे कोई झगड़ा नहीं किया, केवल कोर्ट, और प्रशासन के माध्यम से ही उस पहाड़ी के विवाद को सुलझाने की कोशिश की।

अब मुस्लिम समुदाय के लिए जब कोर्ट, सरकार और  प्रशासन तीनों जगह से मामला हाथ से निकल गया। और हर तरीके से मुंह की खानी पड़ी तब उन लोगों ने एक नई तकनीक अपनाई।

2024 यानी कि पिछले साल के दिसंबर में मुस्लिम समुदाय ने कई पर्चे बांटे और उन पर्चो में यह लिखा था कि उस पहाड़ी पर यानी दरगाह के पास एक समाबंधी दावत का आयोजन किया जाएगा जिसमें पहाड़ी पर ही जानवर काटे जाएंगे ताकि कम्युनल हार्मनी को बढ़ाया जा सके।

मैं आखरी लाइन एक बार फिर आपके सामने दोहराता हूँ। उस पर्ची में यह लिखा था कि पहाड़ी पर जानवर काटे जाएंगे, ताकि कम्युनल हार्मनी को बढ़ाया जा सके।

कम्युनल हर्मनी बढ़ाने के लिए पहाड़ी को अपवित्र करना जरूरी है? पहाड़ी पर जानवर काटना जरूरी है? वह भी उस पहाड़ी पर जिसे हिंदू शिवलिंग की तरह पूजते हैं। उस पहाड़ी पर, जिसपर भगवान मुरुगन का पवित्र मंदिर है।

मंदिर ने और हिंदुओं ने इस पर्चे का विरोध किया। 25 दिसंबर को मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग जानवरों को लेकर उस पहाड़ी पर जा रहे थे, ताकि उन जानवरों को काटकर वहां पर दावत का आयोजन किया जा सके। उन लोगों को पुलिस ने पहाड़ी पर जाने से रोका।

उसके बाद मुस्लिम समुदाय इस मामले को लेकर कोर्ट में चला गया कि उसे इस दरगाह में जानवर नहीं काटने दिया जा रहा, ये मुस्लिमों के अधिकार का उल्लंघ्न है। और कोर्ट में मुस्लिमो के लिए यह मामला लेकर कौन गया? SDPI, वही एसडीपीआई जो आतंकवादी संगठन PFI का एक पॉलिटिकल विंग है।

और अभी कुछ दिन पहले कोर्ट का फैसला आया। 2 जजो की बेंच ने एक मिश्रित फैसला दिया। एक जज ने हिन्दू पक्ष की बात को सही माना और दूसरे जज ने मुस्लिम पक्ष की बात को सही माना। हालाँकि दोनों जजों ने यह फैसला दिया है कि इस पहाड़ का नाम सिकंदर मलाई नहीं किया जाएगा।

2 जजों में से एक जज न्यायमूर्ति S shrimathy ने ये कहा कि  दरगाह पर मांस काटना कोई पुरानी परंपरा नहीं है। यह कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका संरक्षण किया जाना आवश्यक है। इसलिए न्यायमूर्ति S shrimathy ने यह जजमेंट दिया कि दरगाह पर मांस काटने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

लेकिन दूसरी जज न्यायमूर्ति निशा बानू ने इस घिनौनी प्रथा को धार्मिक स्वतंत्रता कहकर जारी रखने का जजमेंट दे दिया। न्यायमूर्ति निशा बानू ने ये कहा, कि जानवरो की बलि देना तो कोई नई बात नहीं है, इसलिए मुसलमानो को पहाड़ी पर जानवर काटने का अधिकार दे दो।

वाह, क्या जजमेंट है?

अंग्रेजों के समय में जो कोर्ट था, उसने हिन्दुओं की आस्था का सम्मान करते हुए फैसला सुनाया था। लेकिन आज़ाद भारत का जो कोर्ट है, वह यह फैसला दे रहा है कि साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने के लिए मुस्लिमो को जानवर काटने दो।

Ma’am आप न्यायमूर्ति हैं।

क्या आपने जजमेंट देने से पहले एक बार भी यह सोचा, कि वो भक्त जो मुरुगन स्वामी की पूजा करने जाते हैं, वे कैसे उस रास्ते पर जा सकते हैं, जिस रास्ते से जानवरों का खून बह रहा हो?

क्या आपने जजमेंट देने से पहले एक बार भी यह सोचा, कि शिवलिंग के आकार की उस पहाड़ी को हिन्दू कितना पवित्र मानते हैं?

न्यायमूर्ति को शायद पता होगा कि बिहार के कई क्षेत्रों में सुवरिआ मेला लगता है। उस मेले में सुवरों की बलि दी जाती है। माननीय उच्च न्यायालय को यदि साम्प्रदायिक सौहार्द की चिंता है, तो क्या हाई कोर्ट उस दरगाह पर सुवरिया मेले के आयोजन की अनुमति देगा? क्या साम्प्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए सिर्फ हिन्दुओं की आस्था पर ही चोट पहुँचाना जरूरी है?

क्या हिन्दुओं ने यह ठेका उठा रखा है कि अपने मंदिरों में जानवर कटवा कर हिन्दू समाज साम्प्रदायिक सौहार्द सुनिश्चित करे?

क्या न्याय की देवी की आंखों पर अब भी वही पट्टी बंधी हुई है?

बहरहाल, यह मामला तो अब हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस के पास जाएगा। लेकिन इस देश में यह पता नहीं कैसी स्थिति पैदा की जा रही है कि हिन्दुओं के पवित्र स्थान को हर बार अपवित्र किया जा रहा है। हिन्दू आस्था को चोट पहुंचाई जा रही है और सरकार, प्रशासन तथा न्यायालय उसपर मुस्लिमों के कृत्य को अपनी मौन सहमति दे रहा है।

जब ये मामला कोर्ट में चल रहा था। उसी दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के एक सांसद नवास कानी के नेतृत्व में कुछ लोगों ने दरगाह में पका पकाया मीट ले जाकर खाया। उसके बाद से उसे संसद ने ट्विटर पर यह पोस्ट भी किया कि जो की दरगाह के पास जानवरों को काटना माना है जानवरों को खाना बना नहीं है, इसलिए हम लोग कम्युनल हार्मनी को बढ़ाने के लिए वहां पर मांस खा रहे हैं।

जिस पहाड़ी पर एक बूंद खून गिरने को भी हिन्दू समाज पाप की दृष्टि से देखता है, वहाँ बैठकर यह आदमी गोश्त खा रहा है और हिन्दुओं से यह उम्मीद भी की जा रही है कि वह कुछ न बोलें।

क्या किसी समुदाय को यह विशेषाधिकार दे दिया गया है कि वह देश के किसी भी पवित्र स्थल पर कब्जा करे, उसका नाम बदल दे, वहां मांसाहार करे, और अगर कोई हिन्दू इसका विरोध करता है, तो उसे सांप्रदायिक ठहरा दिया जाए?

यह एक रणनीति है।

निष्कर्ष

पहले हिन्दुओं के किसी पवित्र स्थान के पास दरगाह बनाओ।

फिर उस दरगाह के आधार पर उस पूरे क्षेत्र पर अपना दावा ठोक दो।

फिर वहाँ जानवर काटकर, दंगे करके और प्रशासन पर दबाव बनाकर उस क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करवाओ।

और अंत में उस पूरे क्षेत्र को और मंदिर को हिंदुओं के लिए भी बैन करवा दो।

दुर्भाग्यवश, आज वक्फ बोर्ड, पीएफआई जैसे आतंकवादी संगठन और SDPI के अलावा डीएमके और एआईएडीएमके समेतो तमिलनाडु के कुछ राजनीतिक दल भी इस पहाड़ी पर इस्लामी स्वामित्व का झूठा दावा कर रहे हैं।

रही बात जानवर काटने की, तो ऐसा नहीं है कि हिंदुओं में यह परंपरा नहीं है। हमारे यहां भी पशुबलि प्रथा है। शाक्त परंपरा में भगवती या ग्राम देवता को पशुबलि चढ़ाने की परंपरा है। लेकिन वह पशु बलि सिर्फ भगवती या ग्राम देवता को चढ़ाई जाती है, ऐसा नहीं है कि आप बलि के नाम पर भगवान राम को पशुबलि चढ़ा देंगे। हिंदू में अनेक परंपराएं हैं और हर परंपरा, दूसरी परंपरा का सम्मान करती है, उसकी आस्था का सम्मान करती है।

लेकिन आज, इस पहाड़ी पर जो कुछ हो रहा है, वह न केवल हमारी आस्था पर चोट है, बल्कि हमारी संस्कृति के साथ हो रहा अत्याचार भी है।

यह लड़ाई सिर्फ किसी मंदिर की नहीं है। यह लड़ाई भारत की सांस्कृतिक पहचान की है। यह संघर्ष केवल एक शिवलिंग जैसे दिखने वाली पहाड़ी का नहीं है। यह संघर्ष सनातन की अस्मिता का है।

आज वे स्कन्दालाई को अपवित्र कर रहे हैं।

कल वे सबरीमाला की पवित्रता को ललकारेंगे।

फिर वे केदारनाथ को शिकार बनाएँगे।

फिर किसी दिन बद्रीनाथ को भी शिकार बनाएँगे।

ये सिलसिला नहीं रुकेगा। इनका एजेंडा साफ़ है।

आखिर हिंदू समाज कब तक सहिष्णु रहेगा?

आखिर हिन्दू समाज कब तक चुपचाप अपनी श्रद्धा पर आघात होता देखता रहेगा?

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