Operation Push Back

Operation Push Back: अवैध घुसपैठ से निष्कासन तक का पूरा सच

Summary
जो भारत की सीमा में कुत्सित इरादे के साथ आएगा, उसे ऑपरेशन पुशबैक (Operation Push Back) के तहत ऐसे ही सीमा पार भेजा जाएगा।

जब इंसान ने पहली बार इस धरती पर सभ्यता की शुरुआत की, तो भोजन और कपड़े के अलावा जिस चीज को उसने सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी, वह था आवास, यानी घर। घर इसलिए ताकि मानव सुरक्षित रह पाए। घर इसलिए ताकि कोई और बिना अनुमति के उसके लिए खतरा उत्पन्न ना कर सके।

आप भी जब घर बनाते हैं, तो उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, दीवार। वह दीवार, जो आपकी सुरक्षा का साधन होती है। उस दीवार के अंदर कोई आपके पास सिर्फ दरवाजे से आ सकता है। यदि किसी ने दीवार कूदकर आने की कोशिश की, तो जाहिर सी बात है वह आपका मित्र तो नहीं है। कोई चाहे निर्दोष ही क्यों न हो, लेकिन अगर वह आपकी दीवार फांदकर आपके घर में आता है, तो वह एक आपराधिक कृत्य कर रहा है।

जो बात घर के ऊपर लागू होती है, ठीक वही बात राष्ट्र के ऊपर भी लागू होती है। कोई भी राष्ट्र जब बनता है तो उसके साथ जन्म लेती है सीमाएं। वह सीमाएं जो एक रेखा के रूप में होती है और यह निर्णय करती है कि कौन उस राष्ट्र के अपने लोग हैं और कौन पराए।

हर राष्ट्र के अपने कुछ नियम-कानून होते हैं। यदि उन नियमों के अंतर्गत आप राष्ट्र की सीमा में आते हैं तो राष्ट्र आपका स्वागत करता है। राष्ट्र आपको अतिथि के रूप में देवता मानता है। लेकिन यदि गैर कानूनी तरीके से आप राष्ट्र की सीमा में आते हैं तो आप उस देश के लिए, उस देश के नागरिकों के लिए और वहां की कानून व्यवस्था के लिए खतरा होते हैं। ऐसे में राष्ट्र, वहाँ की सरकार और वहां के नागरिकों का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह गैर कानूनी तरीके से उसकी सीमा के अंदर आने वाले घुसपैठियों को वापस उनके स्थान पर भेजे।

पिछले दिनों भारत ने इसी कर्तव्य का निर्वहन किया। ऑपरेशन पुशबैक के तहत हमारी संस्थाओं ने बांग्लादेश से आए हुए 2000 से अधिक घुसपैठियों को वापस बांग्लादेश की सीमा के पार धकेल दिया। घुसपैठियों को धकेलने की इस प्रक्रिया के कारण ही इस ऑपरेशन का नाम पुश बैक रखा गया।

अब कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने इस घटना का विरोध किया है। कांग्रेस द्वारा इस घटना का विरोध बेहद हास्यास्पद है। क्योंकि ऑपरेशन पुश बैक भाजपा सरकार द्वारा शुरू किया गया ऑपरेशन नहीं है। बल्कि 1992 के आसपास उस समय की कांग्रेस सरकार ने ही ऑपरेशन पुशबैक को शुरू किया था। और तब भी दिल्ली से अनेक घुसपैठियों को चुन-चुन कर बांग्लादेश में भेज दिया गया था।

देश की सुरक्षा के लिए उस समय कांग्रेस ने जो काम किया था, उसे भाजपा ने भी समर्थन दिया था। लेकिन आज जब वही काम मोदी सरकार कर रही है, तब कांग्रेस खुलकर सरकार के विरोध में आ गई है।

बहरहाल कांग्रेस के दोहरे चरित्र पर भला अब और कितनी बात की जाय। उन पर तो बात करना ही बेकार है। लेकिन इस मुद्दे पर बात करना जरूरी है कि घुसपैठिये और शरणार्थी के बीच के महीन अंतर को कैसे समझा जाए।

संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थियों से संबंधित संस्था UNHCR के अनुसार, शरणार्थी वह व्यक्ति होता है, जिसे उत्पीड़न, युद्ध या हिंसा के कारण अपना देश को छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा हो।

हालाँकि भारत ने अभी तक शरणार्थी सम्मेलन और इसके प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किया है। इसका कारण यह है कि भारत अपनी स्वतंत्र नीति के तहत हर मामले का अलग से मूल्यांकन करता है। भारत सबको एक तराजू में नहीं तौलता।

भारत का दृष्टिकोण कहता है कि यदि कोई वास्तविक उत्पीड़न का शिकार है, तो हम उसे मानवता के आधार पर शरण देंगे। और हमने अब तक ऐसा किया भी है।

लेकिन यदि कोई आपराधिक प्रवृति का समुदाय भारत का नुकसान करने के इरादे से, भारत की जनसंख्या संतुलन को बिगाड़ने के उद्देश्य से आता है, तो वह UN की शरणार्थी परिभाषा में नहीं, बल्कि घुसपैठिए की श्रेणी में आता है।

जब भारत की बात की जाती है। तो हमारे धर्म-दर्शन में ‘शरणागत वत्सलता’ हमारा आदर्श रहा है। त्रेता युग में भगवान राम ने पहले सुग्रीव को शरण दी। यहां तक की राक्षसों के कुल से आने वाले विभीषण को भी शरण दी। महाभारत के युद्ध में युधिष्ठिर ने युयुत्सु को शरण दी। हमारी प्राचीन कहानियों में ऐसे अनेक उदाहरण है, जहां शरणागत कबूतर तक की रक्षा करने के लिए राजा शिवि जैसे लोगों ने अपने शरीर से मांस का टुकड़ा तक निकल कर दे दिया।

आधुनिक काल में भी आप देखिये तो भारत ने यहूदियों को शरण दी, पारसियों को शरण दी। यहूदी जब पूरी दुनिया से भगाए गए, पूरी दुनिया में उन्हें मारा गया, तो भारत ने बाहें फैला कर उनका स्वागत किया। पारसी जब ईरान से भगाए गए, तो भारत ने उन्हें संरक्षण दिया।

एक किस्सा तो यह भी है कि उस समय पारसियों से गुजरात के राजा जाधव राणा ने पूछा कि यह एक दूध का ग्लास है, पहले से ही भरा हुआ है। यहाँ इतने कम संसाधन में आप कैसे समन्वय बिठा पाएँगे? इस पर पारसियों ने कहा कि वो इस दूध के ग्लास में शक्कर की तरह घुल जाएँगे।

और पारसी समुदाय उस मिठास को आज तक भारतीय समाज में घोल रहा है।

आजादी के बाद भी 1960 के दशक में तिब्बती शरणार्थी धर्मगुरु दलाई लामा के साथ जब भारत आए, तो भारत ने उन्हें सम्मानपूर्वक स्थान दिया। उन्होंने भारत की अखंडता और मूल्यों का सम्मान किया। दलाई लामा को शरण देने का परिणाम जब चीन के साथ युद्ध के रूप में आया, तो भारत उससे भी पीछे नहीं हटा।

भारत एक ऐसा देश है, जहाँ ‘अतिथि देवो भव’ सिर्फ वाक्य नहीं, बल्कि सभ्यता का संस्कार रहा है। इस धरती ने न जाने कितने शरणार्थियों को अपने आँचल में छांव दी है।

लेकिन हाल में जब भारत सरकार ने रोहिंग्या और बंग्लादेशी घुसपैठियों को जगह देने से इनकार किया और उन्हें ऑपरेशन पुशबैक के तहत वापस भेजा, तो यह प्रश्न फिर से खड़ा हो रहा है कि शरणर्थियों को शरण देने वाला यह राष्ट्र बाकी शरणर्थियों और मुस्लिमों के बीच में इतना अंतर क्यों कर रहा है?

इसके लिए हमें यह समझना होगा कि पहले के शरणार्थी और अब के घुसपैठियों के बीच में तथा उनके बर्ताव में मूलभूत अंतर क्या है? कुछ उदाहरण देखते हैं:

  • जब भारत में पारसी आए, तो पारसियों ने भारत को टाटा दिया, सैम मानेकशॉ दिया
  • जब भारत में यहूदी आए, तो यहूदियों ने भारत को जनरल जैकब दिया।
  • जब भारत में तिब्बती आए, तो तिब्बतियों ने भारत को अपनी सहिष्णु संस्कृति दी।
  • लेकिन जब रोहिंग्या आए, जब बांग्लादेशी घुसे, जब पाकिस्तानी घुसपैठिए आएतो भारत को क्या मिला: धमाके, दंगे, अपराध और भारत को अस्थिर करने की साज़िशें।

पहले के शरणार्थी संस्कृति लेकर आए, लेकिन घुसपैठिये कट्टरता लेकर आते हैं। पहले के शरणार्थी भारत को गले लगाते थे, लेकिन घुसपैठिये भारत की डेमोग्राफी को बदलने आते हैं।

एक बड़ी मज़ेदार बात मैं आपको बताता हूँ। आप सब जानते होंगे कि इजराइल का यहूदी समुदाय आम तौर पर मांसाहारी समुदाय है। लेकिन जब भारत ने यहूदियों को शरण दी, तो भारत का मान रखने के लिए, भारत के लोगों की भावनाओं का सम्मान रखने के लिए यहूदियों ने खुले में जानवर काटने की प्रथा को त्याग दिया। लगभग ऐसी ही चीज़ें पारसियों ने भी की। लगभग ऐसी ही चीज़ें तिब्बतियों ने भी की।

लेकिन भारत में आने वाले बंगलादेशियों ने क्या किया? खुले में गाय तक काटी। क्यों? ताकि भारत के लोगों की भावनाएं आहत की जा सकें। उन्हीं लोगों की, जिन्होंने उनको शरण दिया। ये लोग साँप हैं, ये हर उस व्यक्ति को डसेंगे, जो इन्हें अपने घर में जगह देगा।

रोहिंग्या या बांग्लादेशी मुस्लिम कोई शरणार्थी नहीं हैं। वे एक आक्रामक इस्लामी पहचान के प्रतिनिधि हैं। वे जहां जाते हैं, वहां दंगे होते हैं, अपराध होते हैं, जनसंख्या विस्फोट होता है।

भारत की धर्मनिरपेक्षता का सहारा लेकर, ये लोग भारत को गजवा-ए-हिंद यानी इस्लामी भूमि बनाने का सपना पालते हैं।

बांग्लादेश से आए घुसपैठियों ने असम, बंगाल, झारखंड, दिल्ली और देश के अनेक इलाकों में जो जनसंख्या संतुलन बिगाड़ा है, वो एक सोच-समझी साज़िश नहीं तो फिर और क्या है?

आज जब भारत अपनी संस्कृति के साथ हो रही इस साज़िश को पहचान रहा है, ऑपरेशन पुशबैक चला रहा है, तो इस पर भारत के साथ-साथ दूसरे देशों में भी आउटरेज हो रहा है। मैं गार्डियन का एक लेख पढ़ रहा था। उसने भारत को ऑपरेशन पुशबैक पर जम कर कोसा है।

किसी फिरंगी चाय की दुकान में बैठकर ये लोग तय करते हैं कि आज किसे ‘मानवाधिकार’ के नाम पर कोसा जाए। दुनिया के नक़्शे पर उनकी उंगलियां घूमती हैं, और रुकती हैं भारत पर। फिर ये लोग मानवाधिकार के नाम पर ड्रामा करते हैं।

गार्डियन को इस बात से तकलीफ़ नहीं है कि भारत अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेज रहा है। गार्डियन को तकलीफ इस बात की है कि भारत अब “स्वाभिमान की भाषा” बोलने लगा है। भारत अब खुद अपना फैसला करता है और उस पर सीधे तौर पर अमल करता है।

सदियों तक भारत को “ब्राउन क्लास” मानने वाले पश्चिमी मीडिया को चिंता मुस्लिमों की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि भारत अब “हिंदू चेतना” से संचालित नीति बना रहा है। एक ऐसी चेतना, जिसमें अब कोई अनावश्यक अपराधबोध नहीं है। भारत को ज्ञान देने से ज्यादा गार्डियन को अपने देश में और यूरोप में खत्म हो रही सभ्यता को देखने की जरूरत है।

यूरोप ने भी मध्य पूर्व से आ रही मुस्लिम भीड़ को “मानवता” के नाम पर गले लगाया। यूरोप को यह लग रहा था कि अगर किसी व्यक्ति को शिक्षा, चिकित्सा, आवास और अधिकार दिए जाएँ, तो वह भी सभ्य समाज का हिस्सा बन जाएगा। यही पर यूरोप ने सबसे बड़ी भूल की।

2015 में जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्कल ने शरणर्थियों के मुद्दे पर “वियर शाफन दास” कहा था। यानी we will handle it. जब एंजेला मार्कल ने यह कहा था तो यह मुस्लिम शरणर्थियों के ऊपर जताया गया विश्वास था।

लेकिन हुआ क्या? कुछ ही वर्षों में सड़कों पर जले हुए चर्च, रेप पीड़ित बच्चियाँ, और ईशनिंदा के नाम पर पत्रकारों को मारने वाले घुसपैठिये इस विश्वास की चिता पर प्रश्नचिह्न बनकर खड़े हो गए। पूरे यूरोप में मुस्लिम शरणर्थियों ने सभ्यता का संकट ला दिया।

2015 में एंजेला मार्केल ने मुस्लिम शरणर्थियों के लिए जर्मनी के दरवाजे खोल दिए। 2016 की एक घटना है। जर्मनी के कोलौन शहर में कई जर्मन लड़कियाँ पार्टी कर रही थीं। तभी अचानक से बड़ी संख्या में मुस्लिम शरणार्थी वहाँ पहुँचे और उन लोगों ने लड़कियों का गैंगरेप किया।

पूरी दुनिया इस खबर से हिल गई। लेकिन ये मुस्लिम शरणार्थी जिन देशों से आए थे, वहाँ ये चीज़ें सामान्य हैं। मध्य-पूर्व के कुछ देशों में खुलेआम लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है और इस घिनौने अपराध को खेल की तरह खेला जाता है। इन्होंने तो इससे संस्थागत करने के लिए इसको एक नाम भी दिया है- ‘तहर्रुश गेमिया’। 

तहर्रुश’ एक अरबी शब्द है। इसका अर्थ ‘सामूहिक उत्पीड़न या छेड़छाड़’ होता है। और ‘तहर्रुश गेमिया’ के तहत सार्वजनिक स्थानों पर पुरुषों द्वारा लड़कियों का बलात्कार किया जाना मध्य-पूर्व के कई देशों में सामान्य है।

ये है इनकी संस्कृति। इन लोगों को अगर जर्मनी ने अपने यहाँ जगह दी है, तो फिर ये तो होना ही था। ‘वियर शेफन दास’ कहने वाली एंजेला मार्केल तो घुसपैठियों को बसा कर चली गईं, लेकिन आज पूरा जर्मनी इसका अंजाम भुगत रहा है। और घटनाएँ सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि शरणर्थियों ने पूरे यूरोप में अपना आतंक फैला रखा है।

स्वीडन, जो मानव विकास के आधार पर दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक है, वह आज यूरोप में सबसे अधिक रेप केस दर्ज करने वाला देशों में से एक बन चुका है। और बलात्कारियों का एक बड़ा प्रतिशत हालिया मुस्लिम शरणार्थियों से जुड़ा है।

ब्रिटेन में Rotherham grooming gangs के नाम पर 1500 से अधिक बच्चियों के साथ बलात्कार हुए और ये बलात्कार किये किसने? उन्हीं मुस्लिम शरणर्थियों ने, जिनका स्वागत ब्रिटेन ने खुली बाहों के साथ किया था।

तो यूरोप में आज जो कुछ भी हो रहा है, उसके बीज यूरोप ने खुद ही बोये हैं। क्या गार्डियन यह चाहता है कि भारत भी ऐसे घुसपैठियों को अपने यहाँ शरण दे, और वे लोग बाद में भारत की बहन-बेटियों के साथ ‘तहर्रुश गेमिया’ का खेल खेलें?

भारत ने जिन रोहिंग्याओं को और बंग्लादेशी घुसपैठियों को भारत से बाहर फेंका है, उनके ऊपर तो कई रिपोर्ट्स भी हैं कि ये लोग घोषित रूप से आपराधिक प्रवृति के हैं, ये बंग्लादेश और म्यांमार में अपराध करके भारत आ रहे हैं। ये अपराधी अगर भारत में आएँगे, तो यहाँ अपराध नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे?

आज भारत इनको शरण देगा, कल को इनके बच्चे हमारे ही मुँह पर शायरी फेंक कर मारेंगे – “किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है।”

वैसे भी अनेक बंग्लादेशी घुसपैठिये कई वर्षों से परजीवी की तरह भारत के शरीर पर चिपके हुए हैं। हमारे घावों को लगातार कुरेद रहे हैं।

आज जब सरकार ऑपरेशन पुशबैक के तहत इनको वापस भेज रही है, तो इसके लिए सरकार साधुवाद की पात्र है।

दरअसल भारत के लोगों को यह समझना होगा कि एक बड़ा तंत्र है, जो हमारे देश को बर्बाद करने पर तुला हुआ है। ये लोग अपने एजेंडे को पूरा करने के लिए पूरे देश को हीन भावना से ग्रस्त कर सकते हैं।

ये लोग वैसे तो भारत की संस्कृति से नफ़रत करते हैं, लेकिन जब इनके एजेंडे की बात आती है, तो यही लोग भगवान राम का उदाहरण देने लगते हैं कि राम ने विभीषण जैसे राक्षस कुल के व्यक्ति तक को शरण दी थी, फिर भारत रोहिंग्याओं और बंगलादेशियों को शरण क्यों नहीं दे सकता? यह बात कहते हुए ये लोग यह भूल जाते हैं कि जब भगवान राम ने विभीषण को शरण दी थी, तो यह कहा था:

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥

अर्थात्, जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट और छल-छिद्र नहीं सुहाते।

भारत भी ऐसा ही है। जो पीड़ित व्यक्ति निर्मल मन के साथ, बिना कोई छल-कपट रखे भारत से शरण मांगता है, उसे भारत हमेशा से गले लगाता आया है।

लेकिन जो भारत की सीमा में कुत्सित इरादे के साथ आएगा, उसे ऑपरेशन पुशबैक के तहत ऐसे ही सीमा पार भेजा जाएगा। क्योंकि भारत को अपनी संतानों के भविष्य को सुरक्षित रखने का अधिकार है।

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