भाषा के विषय पर नेहरू के छोड़े गए प्रश्नों का PM मोदी द्वारा उत्तर

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जिन भाषाओं को छोटा समझ कर इंदिरा गाँधी ने 'एक्स्ट्रा कैटेगरी' में डाला था, उन भाषाओं के संरक्षण के लिए मोदी सरकार SPPEL योजना लेकर आई है। काशी-तमिल संगम जैसे कार्यक्रम ये दिखा रहे हैं कि उत्तर और दक्षिण के बीच दूरी सिर्फ नक्शे में है, इनकी आत्मा एक ही है। 

माँ हमें जन्म देती है, मातृभूमि हमें पहचान देती है, और मातृभाषा, हमारी संस्कृति को स्वर देती है। भारत में तो वैसे भी “कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी” की कहावत है। यह सूक्ति बताती है कि भारत केवल एक भूगोल नहीं है, वह एक बहुभाषिक, बहुसांस्कृतिक और बहुरंगी चेतना है।

भारत में भाषा कोई यंत्र नहीं है, कोई उपकरण नहीं ह, वह एक जीवित सत्ता है। उसमें स्मृतियाँ बसती हैं, इतिहास धड़कता है, और भविष्य की नींव रखी जाती है। जब कोई बच्चा पहली बार “माँ” कहता है, वह केवल शब्द नहीं बोलता, वह उस मातृभाषा की पूरी परंपरा से जुड़ता है।

माँ और मातृभूमि से तो व्यक्ति हमेशा जुडा रहता है, लेकिन मातृभाषा को भारत में अक्सर राजनितिक चश्मे से देखा गया। भारत की आज़ादी के बाद हमारे सामने एक मौक़ा था, जब हम अपनी भाषाओं को गर्व से गले लगा सकते थे। लेकिन अफ़सोस… हमने अपनी भाषाओं को बोझ समझ लिया। नेहरू के नेतृत्व में सरकार भाषा को समाधान की जगह समस्या मानने लगी।

1951 की जनगणना में नेहरू ने पंजाबी और हिंदी से संबंधित भाषा के प्रश्न को ही दरकिनार कर दिया। उन्होंने प्रश्नों से बचने को नीति बना ली। पंजाब, और delhi में भाषायी पहचान के लिए जो लहर उठी, उसे अनदेखा किया गया। भाषाई अस्मिता की उस अनदेखी ने धीरे-धीरे पंजाब में ख़ालिस्तानी आतंकवाद के रूप में अलगाववाद को जन्म दिया।  

एक तरफ़ नेहरू ने सवाल टाल दिए। तो इंदिरा ने उन भाषाओं को “extra” category में डाल दिया गया, जिन भाषाओं को 10,000 से कम लोग बोलते थे। इससे धीरे-धीरे भारत की अनेक भाषाओं का लोप होने लगा। 

भाषा का लोप केवल शब्दों का लोप नहीं होता, वह एक पूरी संस्कृति की चुप्पी होती है। जब कोई मातृभाषा धीरे-धीरे उपयोग से बाहर हो जाती है, तो वह केवल बोलने वालों की संख्या नहीं खोती, वह उस क्षेत्र के अनुभवों, ज्ञान, और बौद्धिक आत्मा को भी खो देती है।

लेकिन फिर आया 2014 का दौर।

प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा — भारत को उसकी भाषाओं से जोड़ने की जरूरत है, काटने की नहीं।

मोदी सरकार के पिछले 11 वर्षों में 11 भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिल चुका है। 

आज JEE-NEET जैसी परीक्षाएं 13 भाषाओं में हो रही हैं, इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई मातृभाषाओं में भी संभव है। “अनुवादिनी”, “अस्मिता”, और “DIKSHA” जैसे प्रयास छात्रों के लिए 133 भाषाओं में शिक्षा को सुलभ बना रहे हैं। जिन भाषाओं को छोटा समझ कर इंदिरा गाँधी ने ‘एक्स्ट्रा कैटेगरी’ में डाला था, उन भाषाओं के संरक्षण के लिए मोदी सरकार SPPEL योजना लेकर आई है। काशी-तमिल संगम जैसे कार्यक्रम ये दिखा रहे हैं कि उत्तर और दक्षिण के बीच दूरी सिर्फ नक्शे में है, इनकी आत्मा एक ही है। 

प्रधानमंत्री मोदी ने भाषाओं को वोट का नहीं, सम्मान का माध्यम बनाया। भाषाओं को बाज़ार नहीं, संस्कार माना। मोदी ने यह समझा कि भाषाएँ बचेंगी तभी तो भारत बोलेगा। और जब भारत बोलेगा तो उसकी गूँज पूरी दुनिया में सुनाई देगी। नेहरू ने भाषा पर जो सवाल छोड़े थे — मोदी ने उन सवालों के जवाब दिए हैं।

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