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FCRA 2.0: अब सिर्फ विदेशी फंडिंग नहीं, उससे बनी संपत्तियों पर भी रहेगी सरकार की नजर

Summary
अगर किसी संस्था ने विदेशी फंड से जमीन, भवन या दूसरी संपत्तियां बनाई हैं और बाद में उसका FCRA सर्टिफिकेट खत्म हो जाता है, तो उन संपत्तियों को लेकर अब एक तय कानूनी व्यवस्था होगी

दुनिया के हर एक देश के पास फॉरेन डोनेशन को रेगुलेट करने के लिए कोई ना कोई कानून है, अमेरिका के पास FARA है, ब्रिटेन में FIRS है, ऑस्ट्रेलिया में FITS है, रूस में FAL है और ऐसे ही भारत में भी FCRA है।

यही FCRA इन दिनों चर्चा में है क्योंकि मोदी सरकार इसमें Amendment लाई है। अभी इसे लोकसभा से पास होना है लेकिन इसकी तीन बड़ी बातें क्या हैं वो मैं आपको बताता हूं।

अब तक अगर किसी संस्था का FCRA लाइसेंस किसी कारण रद्द हो जाता था और रिन्यू नहीं होता था तो विदेशी फंड से बनी संपत्तियों का क्या होगा, इस पर कानून पूरी तरह स्पष्ट नहीं था।

नए Amendment Bill में सरकार एक Designated Authority बनाने का प्रस्ताव लेकर आई है कि अगर किसी संस्था ने विदेशी फंड से जमीन, भवन या दूसरी संपत्तियां बनाई हैं और बाद में उसका FCRA सर्टिफिकेट खत्म हो जाता है, तो उन संपत्तियों को लेकर अब एक तय कानूनी व्यवस्था होगी और उनका नियंत्रण या रखरखाव की जिम्मेदारी वो Designated Authority लेगी। हालांकि, ऐसी संपत्ति कोई पूजा स्थल है, तो बिल में कहा गया है कि उसका धार्मिक स्वरूप बनाए रखा जाएगा।

दूसरी बड़ी बात, विदेशी फंड लेने वाली संस्थाओं को ये सुनिश्चित करना होगा कि पैसा उसी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हो जिसके लिए उसे लिया गया है। 

इसका बाइ प्रोडक्ट ये है कि अब विदेशी फंड का इस्तेमाल कन्वर्जन के लिए बिल्कुल भी नहीं किया जा सकेगा। आसान भाषा में समझने के लिए बताऊं तो अगर कोई संस्था धार्मिक शिक्षा, सत्संग,ध्यान या आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के नाम पर फंड लेती है, तो उसे पहले ही अपना स्पष्ट उद्देश्य बताना होगा कि वो इनमें से किस काम के लिए वो पैसा इस्तेमाल करने जा रहे हैं और अपने यहां एंटी कन्वर्जन लॉ तो है ही तो इसलिए उस पैसे को कन्वर्जन में लगाना अब पूरी तरह गैर-कानूनी होगा।

तीसरा, NGOs को अब सरकार को ये साफ-साफ बताना होगा कि विदेशी पैसा असल में किस व्यक्ति या संस्था से आया है और साथ में NGOs को अपने सभी सोशल मीडिया अकाउंट्स, विदेशी कर्मचारियों और फंड के इस्तेमाल की पूरी जानकारी देनी होगी। इसके अलावा, उन्हें ये साबित करना होगा कि विदेशी फंड उसी काम में खर्च हुआ या नहीं, जिसके लिए परमिशन मिली थी।

भारत में ये समस्या रही है कि FCRA के तहत आने वाले विदेशी फंड का इस्तेमाल कई बार किसी और काम के लिए ही किया गया है। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु के Sterlite विरोध प्रदर्शन के दौरान FCRA रजिस्टर्ड NGO The Other Media जांच के दायरे में आया था। इस पर आरोप था कि विदेशी फंड का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शनों और कैंपेनिंग जैसी गतिविधियों में किया गया।

और ये पहली बार नहीं था जब विदेशी फंडिंग को लेकर सवाल उठे। 2012 में कुडनकुलम न्यूक्लियर प्रोजेक्ट विरोध प्रदर्शन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि कुछ विदेशी फंड पाने वाले NGOs देश के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स को प्रभावित कर रहे हैं। 

इसलिए आज जो लोग FCRA में बदलावों का विरोध कर रहे हैं, उन्हें ये याद रखना चाहिए कि विदेशी फंडिंग की निगरानी का मुद्दा सिर्फ आज का नहीं है, बल्कि लंबे समय से सरकारों की चिंता का विषय रहा है।

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