आप कल्पना करिए कि आप अपने मंदिर के पास वर्षों से चली आ रही है एक परंपरा के तहत दीप जलाना चाहते हैं। लेकिन आपको कुछ मुसलमानों के द्वारा दीप जलाने से इसलिए रोक दीप जाता है क्योंकि आप जहाँ पर दीप जलाएंगे उससे 500 मीटर की दूरी पर एक मस्जिद है, और आपके दीप जलाने से 500 मीटर दूर खड़ी इस मस्जिद के मुसलमानों की भावनाएं आहत हो जाएँगी।
चूंकि आप हिंदू और अब्दुलों की तरह स्ट्रीट वीटो में विश्वास नहीं रखते, इसलिए आप इस मामले को लेकर कोर्ट में जाते हैं। यहाँ भी लंबी सुनवाई के बाद आप जीत जाते हैं और कोर्ट आपको यह अनुमति देता है कि आप जाकर उस मंदिर के पास दीप जला सकते हैं और अपने आराध्य की पूजा अर्चना कर सकते हैं।
अब आप खुश होते हैं कि चलो अब तो कोर्ट का ऑर्डर भी आ गया, अब तो मंदिर के पास दीप जलाने से कोई रोक भी नहीं सकता।
लेकिन जब आप दीप जलाने जाते हैं, तो मुसलमानों की एक भीड फिर से एक बार आकर आपको दीप जलाने से रोकती है और कोर्ट के ऑर्डर के बावजूद पुलिस प्रशासन और वहां की सरकार आपके साथ नहीं बल्कि मुसलमानों के साथ खड़ी होती है।
अब तक मैं आपको जो चीजे हाइपोथेटिक्ल रूप में बता रहा हूँ, ठीक वही इस समय तमिलनाडु के हिंदुओं के साथ हो रहा है। तमिलनाडु में पिछले कुछ दिनों से तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी परमनाया जाने वाला कार्तिगई दीपम त्यौहार चर्चा में है, इसके वीडियो वायरल हो रहे हैं… यहाँ अपने धार्मिक अनुष्ठान करने पहुँचें हिंदुओं को DMK और वामपंथी ट्रोल्स गुंडा बदमाश बताया जा रहा है।
लेकिन मैं आपको हिंदुओं की पीड़ा और DMK सरकार के उन पर अत्याचार के बारे में बताऊँ, उससे पहले पूरा मामला आपको समझाता हूँ!
दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश में कार्तिक महीने की पूर्णिमा को कीर्ति गई दीपम त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन हर घर में और हर मंदिर में मिट्टी के दीए जलाए जाते हैं। यह जो पूरा त्यौहार है, यह भगवान शिव और उनके पुत्र कार्तिकेय यानि भगवान मुरूगन को समर्पित है।
जैसा कि मैंने अभी बताया कि इस त्यौहार में घरों के अलावा मंदिरों में भी दीप जलाया जाता है। तमिलनाडु के मदुरै जिले में एक पहाड़ी है, तिरुपरनकुंद्रम की पहाड़ी। यह पहाड़ी दिखने में ही शिवलिंग जैसी है। इसलिए इस पूरी पहाड़ी को सनातनियों में बड़ा ही पवित्र माना जाता है। कुछ लोग इस पहाड़ी को स्कन्द मलाई कहते हैं, तो वहीं कुछ लोग इसे तिरुपरनकुंद्रम हिल्स कहते हैं।
इसी पहाड़ी पर भगवान मुरुगन का एक मंदिर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि उसी स्थान पर जहाँ भगवान मुरुगन और इंद्र की पुत्री देवसेना का विवाह हुआ था। लेकिन जैसे रामलला के जन्मस्थान के पास ‘नुकीले पत्थर’ उग आए थे, वैसे ही यहाँ भी बीच पहाड़ी पर दाहिनी ओर एक दरगाह है। मुस्लिम इस दरगाह को सिकंदर दरगाह के नाम से पुकारते हैं। मुसलमानों के द्वारा यह दावा किया जाता है कि यह दरगाह 12वीं शताब्दी के एक सुल्तान सैयद सिकंदर बधुशा का है।
दरअसल ये आदमी सऊदी अरब के एक शहर जेद्दाह का गवर्नर था, जो भारत में खासकर तमिलनाडु के क्षेत्र में इस्लाम फैलाने के उद्देश्य से आक्रांता सैयद इब्राहिम शाहिद के साथ आया था। बाद में वह मद्रास पर राज करने लगा, और पूरे मद्रास रीजन में इस्लाम फैलाने के उद्देश्य से उसने अनेक हिंदू मंदिरों को तोड़ा। बाद में विजयनगर साम्राज्य के राजाओं के साथ सिकंदर बादुशा का युद्ध हुआ और उसमें विजयनगर के राजाओं ने सिकंदर वध का वध कर दीप। और फिर मदुरई के उस क्षेत्र में हिन्दू नियंत्रण पुनर्स्थापित हुआ।
मुस्लिम ऐसा बोलते हैं, कि जिस सिकंदर बादुशा को विजयनगर के राजाओं ने युद्ध में मार दिया था। उसी सिकंदर बादुशा की दरगाह स्कंदमलाई पर स्थित है। और इसी दावे के आधार पर मुसलमान उस पूरी पहाड़ी को अपना बताते हैं।
हालांकि इसमें एक मोड़ यह है कि तमिलनाडु सरकार के पर्यटन मंत्रालय की ऑफिशल वेबसाइट के अनुसार सिकंदर बादुशा की दरगाह तिरुपरनकुंद्रम पर नहीं बल्कि Goripalayam में है, जो पहाड़ी से कई किलोमीटर दूर है।
यह वही मेंटालिटी है कि कहीं जमीन घेरकर कोई दरगाह बना दो, बाद में उस पूरी जमीन पर कब्जा कर लो। इसी मेंटालिटी के तहत मुस्लिम पूरी तिरुपरनकुंद्रम की पहाड़ी को अपना बताने लगे। और यह विवाद भी बहुत पुराना है। अंग्रेजों के समय से ही यह विवाद चल रहा था।
मामला बढ़ा तो कोर्ट में गया, अंग्रेजों के जमाने में जो प्रिवी काउंसिल हुआ करती थी, उसने भी हिंदुओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए यह कहा था, कि दरगाह जितने एरिया में है वह एरिया सिर्फ मुसलमानों का है, बाकी पूरी पहाड़ी हिंदुओं की है। हालांकि प्रिवी काउंसिल का यह निर्णय लागू नहीं किया जा सका। और आजादी के बाद भी लंबे समय तक हिंदुओं को अपने ही आराध्य के मंदिर को अपनी ही जमीन सिद्ध करवाने के लिए कोर्ट के दरवाजे पर खड़ा रहना पड़ा। मुस्लिमों ने शिवलिंग जैसी दिखने वाली इस पवित्र पहाड़ी पर मांस काटकर भी खाया। हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए न जाने क्या क्या किया।
बहरहाल अक्तूबर 2025 में मद्रास हाई कोर्ट ने अंतिम रूप से यह स्थापित हो गया कि यह पूरी पहाड़ी को हिंदुओं की ही है। हाईकोर्ट ने यहाँ ना इसे सिकंदर मलाई का नाम दिया जाएगा और ना यहाँ बकरा मुर्गा काटा जाएगा!
यहाँ तक कि मुसलमानों को यहाँ नमाज पढ़ने पर भी कई तरह की शर्तें कोर्ट ने लगाई। साथ ही ASI को इस मामले में सर्वे करने को भी बोला!
तो जब कोर्ट से भी फैसला आ गया… पहाड़ी भी मिल गई और ऊपर से वह पहाड़ी भी शिवलिंग जैसी आकृति की है तो इतनी पवित्र जगह पर हिंदू दीप जलाएँगे ही, जाहिर सी बात है इससे किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए।
लेकिन समस्या हुई। हिंदुओं के अस्तित्व मात्र से जिस मजहबी विचारधारा को समस्या है वह भला हिंदुओं के दीप जलाने को कैसे बर्दाश्त कर सकती है।
मुस्लिमों ने इस बात पर विवाद खड़ा किया कि यदि पहाड़ी के दीपस्तम्भ पर दीप जलाया जाएगा तो पहाड़ी पर स्थित दरगाह और मुसलमानों के अधिकार प्रभावित होंगे।
अब यह बिल्कुल समझ से परे है कि यदि कहीं पर कोई दीप जल रहा है तो उसे 100 मीटर 200 मीटर दूर स्थित दरगाह को कैसे नुकसान पहुंच सकता है? लेकिन इस तरह की समझ की बातें आप और मेरे जैसे हिंदू कर सकते हैं। जो लोग गजवा ए हिंद के विचार के साथ काम कर रहे हैं, वह लोग तो आज भी इस पहाड़ी को मुसलमानों की जमीन मानते हैं। कोर्ट का आर्डर उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।
बहरहाल, दीप जलाने का मुद्दा जब बढ़ा, तो हिंदू पक्ष अपनी ही पहाड़ी पर दीप जलाने के लिए फिर से कोर्ट पहुँचा। क्योंकि आपको तो पता है कि हम भीड़तंत्र वाले लोग नहीं हैं!
मुझे तो यह कहते हुए भी अजीब लग रहा है, कि अपनी ही पहाड़ी पर दीप जलाने के लिए हिंदुओं को कोर्ट जाना पड़ रहा है। लेकिन देश में हिंदुओं की नियति ही यही है।
जब मद्रास हाई कोर्ट में मामला पहुंचा तो मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला हिंदुओं के पक्ष में सुनाया। कोर्ट ने यह कहा तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर जो दीप स्तम्भ है, उस पर कार्तिगई दीपम जलाने से पास की दरगाह या मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड़ेगा।
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने निर्णय देने से पहले खुद तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी का निरीक्षण भी किया, और पाया कि दरगाह की ओर जाने वाला रास्ता अलग है और दीपस्थंभ की ओर जाने वाला अलग हैं। इसलिए न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने खुद Judgement में कहा है कि इस Situation में तो दीप जलाने से मुस्लिमों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कहा कि हिंदुओं को दीप जलाने दिया जाय और प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी इस आदेश का पालन करवाएँ। यहाँ तक कि तमिलनाडु पुलिस की कार्यशैली जानते हुए याचिका कर्ता को CISF सिक्युरिटी तक देने का आदेश कोर्ट ने दिया।
लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी तो देश की व्यवस्था में विश्वास करने से रहे ! तो उन्होंने दावा किया कि वर्षों से यह दीप मंदिर के एक हिस्से में जलाया जाता रहा है अब हिंदू पक्ष उसे हिस्से के साथ-साथ इस पहाड़ी की चोटी पर जहां दीप स्तंभ स्थित है वहां पर भी दीप जलाना चाहता है।
पहली बात तो यह कि मुस्लिम पक्ष का यह दावा गलत है कि दीप स्तंभ पर दीप अब तक नहीं जलाया जाता रहा है। दीप स्तम्भ पर भी वर्षों से दीप जलाया जा रहा है और दूसरी बात यह कि जब पूरी पहाड़ी हिंदुओं की संपत्ति है तो उसे पहाड़ी के किस हिस्से में दीप जलाया जाएगा, यह निर्धारित करने का अधिकार हिंदुओं का है या किसी और का?
लेकिन कहानी यहां पर खत्म नहीं हुई। जब हिंदू यहाँ दीप जलाने पहुँचे तो मुस्लिम तुष्टिकरण के कीचड़ में आकंठ डूबी हुई तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने कोर्ट के इस आदेश का पालन नहीं करवाया।
हाई कोर्ट द्वारा साफ़-साफ़ आदेश दिए जाने के बावजूद हिंदू अपनी ही पहाड़ी पर अपने ही त्यौहार के समय दीप नहीं जला पाए क्योंकि तमिलनाडु के डीएमके सरकार ने हिंदुओं को ऐसा करने से रोका।
तमिलनाडु का हिंदू समाज, जो हजारों वर्षों से अग्नि को साक्षी मानकर अपने अस्तित्व का उत्सव मनाते आया है। जो एक दिए के रूप में उस परंपरा की लौ जलाते आया है, जिसने इस्लामी आक्रांताओं की निर्दयताओं के बावजूद भी हार मानने से इनकार किया था। इतना कुछ सहने के बाद भी परंपरा को जीवित रखा गया जिस दिए कि लोग पूछने नहीं दी गई वह दीप इस आजाद भारत में तमिलनाडु के डीएमके सरकार के संरक्षण में बुझ रहा है।
तमिलनाडु प्रशासन द्वारा, पहाड़ी के आसपास के क्षेत्रों में धारा 144 लगा दी गई है। तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव में मुश्किल से चार महीने बचे हैं और मुस्लिमों के वोट पाने के लिए आतुर DMK सरकार, कोर्ट के order के बावजूद हिंदुओं की आस्था और परम्परा को बेरहमी से तोड़ रही है।
प्रश्न यह है, कि हिंदू समाज आख़िर कब तक चुप रहेगा।
आज तमिलनाडु के हिंदुओं के साथ जो हो रहा है, वह किसी एक जिले या एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह हिंदुओं के भविष्य की वही पटकथा है, जो धीरे-धीरे पूरे भारत में दोहराई जाएगी।
भविष्य में ऐसे ही हिंदू समाज अपने मंदिर के बाहर दीप जलाने की अनुमति भी किसी और से मांगेगा। यदि आपको प्रशासन से अनुमति मिल जाएगी यदि आपको कोर्ट से अनुमति मिल जाएगी तब भी आप दीप नहीं जला पाएंगे।
आज दीप नहीं जलने दीप जा रहा, कल घंटी बजाने पर प्रश्न उठेगा, परसों आपके तिलक लगाने पर, और एक दिन आपके अस्तित्व को ही सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दीप जाएगा।
सब कुछ एक साथ नहीं छीना जाता। सब कुछ धीरे-धीरे जाता है। ठीक उसी तरह जैसे पैरों तले रेत खिसकती है। अफ़सोस यही है कि हिंदू समाज के लिए यह रेत खिसक रही है, और हम देखते रह जाने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रहे।





